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अस्तित्व अपरिवर्तित होता है।

प्रभु का जन्म होते ही सृष्टि में आल्हाद हुआ, प्रकृति में स्वयंभू उत्सव होने लगा, जलवायु की चेष्टाएँ प्रसन्न नजर आने लगीं, दिशाएँ उद्योतमय हुईं, पृथ्वी का एक-एक कण उर्जावंत सा हो गया, वृक्षों की अभिव्यक्ति में भी हर्ष उमड़ रहा था। 

 

प्रभु के जन्म से ये सब क्यों हो रहा था?

 

प्रभु के ज्ञान में जन्म समय का यह सारा प्राकृतिक बदलाव ज्ञात था। नरक में भी जो क्षणिक आनंद की लहरें उठी, वह भी प्रभु ने जान ली थी। 

 

लेकिन प्रभु इन सारे परिवर्तन से खुद को पृथक् ही देख रहे थे।  

 

क्योंकि ये सब परिवर्तन पुद्गल में हुए थे, पर में हुए थे, और उनका निमित्त था ‘तीर्थंकर नामकर्म’ और वह भी पर था। उस कर्म के बंधन में निमित्त प्रभु की आत्मा थी, लेकिन बंधन में निमित्त बनने वाली आत्मा को भी प्रभु अपना स्वरूप कहाँ समझते थे?

 

शुभ या अशुभ कोई भी कर्म आखिर में है तो बंधन ही!

 

अगर वो बंधन न होता, तो उसकी निर्जरा करने की कोई आवश्यकता ही नहीं होती। 

 

जो बंधन होता है, उसी की निर्जरा होती है। 

 

अत:

प्रभु, बंधन में निमित्त बनने वाली अपनी अवस्था को भी शुद्ध आत्मा के स्वरूप में स्वीकार नहीं करते, आस्था नहीं रखते। सारे बंधन की योग्यता से मुक्त शुद्ध-आत्मा द्रव्य को ही प्रभु अनुभव से अपना स्वरूप मानते थे। 

 

 

आत्मा की अवस्थाएँ बदलती रहती हैं। 

अस्तित्व अपरिवर्तित होता है। 

 

 

बदलाव में ही जब अपने होने की अनुभूति होती हो, तो बदलाव होते ही रहेंगे, जन्म-मरण की श्रृंखला अनिरुद्ध ही रहेगी, आस्था ही आपका होने का ढंग तय करती है। 

 

जब अपना होना अपरिवर्तित महसूस होने लगता है, तब से परिवर्तन की श्रृंखला सिमटना शुरू हो जाती है, जन्म-मरण की धारा समाप्त होने लगती है। आस्था अपरिवर्तित में हो, तो होने का ढंग भी परिवर्तन शून्य बनता है, जिसे मोक्ष कहते हैं। 

 

प्रभु खुद को परिवर्तन में नहीं, वरन् अपरिवर्तित में अनुभव कर रहे थे,

 

अवस्थाओं में नहीं, किंतु अस्तित्व में महसूस कर रहे थे। 

 

निर्वाण की घटना भले ही 72 वर्ष की आयु में घटी, परंतु प्रभु ने पहले से ही मोक्ष में ढलना शुरू कर दिया था। यह जन्म तो रहे-सहे कर्मों के विशीर्ण होने के लिए ही था। 

 

हे प्रभु!

 

आपका निर्मल दर्शन,

हमें सम्यग् दर्शन की निर्मलता दे!

 

आपकी शुद्ध आस्था को समझकर,

मेरी आस्था भी शुद्ध हो,

 

जहाँ आप अपने आप को महसूस कर रहे हैं,

उससे अतिरिक्त स्थानों में, मैं आपको ढूंढ रहा हूँ। 

 

मुझे ऐसी दृष्टि दीजिए,

जहाँ आप हो मैं वहाँ आपको महसूस कर पाऊँ…

About the Author /

authors@faithbook.in

बाल्यकाल में दीक्षा लेने के पश्चात् ज्ञान-ध्यान की अलख जगाई और वर्तमान में युवावस्था होने पर भी जिनका हृदय अध्यात्म से सराबोर है, ऐसे पू. पंन्यास भगवन्त प्रभु वीर की साधना को मात्र उपसर्ग या परिषह सहन करने की सहिष्णुता में ही नहीं देखते, बल्कि इस साधनाकाल के भीतर गहराई में जाकर हमें भी साधना का स्पर्श करवाएँगे। यह लेखमाला अध्यात्म रसिकों के लिए अमृत भोजन की भूमिका निभाएगी, ऐसी आशा है।

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