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आचारः प्रथमो धर्मो

“आचारः प्रथमो धर्मो, नृणां श्रेयस्करो महान्।

 

इहलोके पराकीर्तिः, परत्र परमं सुखम् ।।”

 

Mostly आजकल अनाचार का ही trend हो गया है। Dressing, eating, earning etc. everywhere अनाचार spread हो गया है। लोगों की मनोवृत्ति बहुत विकृत हो गई है, इस कारण लोगों की Life अनाचारों से भर गई है। चाहे कोई भी व्यक्ति हो, बालक, युवा या वृद्ध, अनाचार के अजगर ने सबको अपनी पकड़ में ले रखा है।

 

एक हास्यास्पद प्रसंग याद आता है, अठारहवीं बार अपराध करते हुए पकड़ा गया एक लड़का अपने पिता के साथ कोर्ट में हाजिर हुआ। जज ने पिता से पूछा, “तुम्हारा बेटा अठारहवीं बार चोरी करते हुए पकड़ा गया है, तुम उसे समझाते क्यों नहीं?”

 

तो पिता ने कहा, “जनाब ! ऐसा है, कि इसे कईं बार समझाया कि चालाकी से चोरी करनी चाहिए, ऐसे बार-बार पकड़े जाना ठीक नहीं है। लेकिन अभी छोटा है, हाथ की सफाई अब तक नहीं आई, एक बार हाथ बैठ गया, फिर आपको तकलीफ नहीं देगा।”

 

आज के लोगों की मानसिकता भी कुछ ऐसी ही है। अनाचार मात्र प्रिय नहीं बना, बल्कि जीवन बन चुका है। अनाचार करूँ या नहीं, ऐसी विडम्बना नहीं रही, बल्कि कर्तव्य बन गया है।

 

आज समाज में, परिवार में और व्यक्तिगत जीवन में बड़े-बड़े अनाचार प्रवेश कर चुके हैं। और छोटे कहलाए जाने वाले अनाचार तो सहज बन चुके हैं।

 

लेकिन एक बात स्पष्ट रूप से जान लीजिए, और समझ लीजिए, कि “अनाचार लोगों के Mind में और Life में Well-set हो गया है, इसीलिए सुख, शान्ति, प्रसन्नता, पवित्रता, परस्पर प्रेमभाव, पारिवारिक स्नेह, परोपकार, वफादारी आदि upset हो चुके हैं।

 

प्रस्तुत सूत्र में सुभाषितकार आचार की महिमा बताते हुए कहते हैं, कि “आचार, मनुष्यमात्र का प्रथम कर्तव्य है।

 

आज के लोग अपनी-अपनी रुचि और समझ के अनुसार मात्र Education, या मात्र Money, या मात्र Relation, या मात्र Family या मात्र Enjoyment etc को ही Importance देते हैं। किन्तु अपने Mind में इतनी बात Set कर लीजिए कि Education का क्षेत्र हो, Business का क्षेत्र हो, Politics का क्षेत्र हो या Social क्षेत्र, Everywhere आचार इस First and Must.

 

आप Well Educated Person हैं, या आप Richest Person हैं, या आप Powerful Person हैं etc, ये सब Second Number की बातें हैं। First Number में आप आचार सम्पन्न होने चाहिए। आचार इक्का है, और Education आदि सब शून्य हैं।

 

आज का Trend भले ही अनाचार का है, किन्तु आज की Requirement तो आचार की है।

 

हमारी आर्य संस्कृति में नीति, प्रमाणिकता, मर्यादा आदि मूल आधारों के साथ अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि उत्तम आचारों की महिमा बताई गई है। आज नीतिभ्रष्टता, मर्यादाभ्रष्टता आदि रूप में आचारभ्रष्टता चारों ओर विपुल मात्रा में बढ़ रही है। ऐसे समय में आचार के प्रति लोकमानस में प्रेम और जागृति उत्पन्न हो इस हेतु से Education System आदि में बहुत बदलाव की जरूरत है।

 

आचार की महिमा को एक उपमा द्वारा समझने का प्रयास करते हैं:

  • आचार = Sunlight, जो Life में Everytime and Everywhere प्रकाश देता रहता है और अनेकों के जीवन को प्रकाशित कर देता है। जैसे सूर्य की उपस्थिति में अन्धकार नहीं सकता, वैसे ही आचार की उपस्थिति में प्रायः आपत्ति नहीं सकती। यदि कभी आचारसम्पन्न व्यक्ति को कभी कोई आपत्ति आ भी गई, तो वह पूर्वकृत अनाचार का फल है, ऐसा समझें।
  • आचार = Moonlight, जो Life में Everytime and Everywhere शीतलता देती रहती है। आचार ठण्डक देता है, अनाचार जलाता है, आचार निर्भय बनाता है, अनाचार भयभीत करता है।

 

अनाचार करने वाले लोगों को जेल हुई, नोटबन्दी के समय अनेक छोटे-बड़े धनिक लोग टेंशन में आ गए थे। जिसके पास White का (नीति का) पैसा (व्यवहार) था वे लोग निश्चिन्त थे। प्रत्येक छोटे-बड़े आचार या अनाचार के मामले में इस प्रकार Plus – Minus समझें।

 

अनाचार से मिलने वाली खुशबू परफ्यूम जैसी होती है, जो समय के साथ उड़ जाती है। आचार से मिलने वाला आनन्द चन्दन की लकड़ी जैसा है, जो सदैव स्थिर रहता है।

 

धनवान, रूपवान, कलावान, सत्तावान (सत्ताधीश) व्यक्ति प्रसिद्ध भले ही होते हों, किन्तु प्रिय हो ऐसा जरूरी नहीं। इसके विपरीत आचारसम्पन्न व्यक्ति प्रसिद्ध भले ही न हो, किन्तु प्रिय अवश्य होता है।

 

एक संस्कृत सुभाषित है, आचाराल्लभते धनम्, आचार से धन प्राप्त होता है। आचारात्सर्वमाप्नोति, आचार से सब कुछ प्राप्त होता है।

 

प्रस्तुत सूत्र में भी सुभाषितकार आचार का फलकथन करते हुए कहते हैं, कि आचार से इस लोक में Top Level की यश एवं कीर्ति प्राप्त होती है। और परलोक में Top Level के सुख की परम्परा मिलती है

 

अंग्रेजी सुभाषित में लिखा है, Chastity is life, sensuality is death. सदाचार ही जीवन है, और दुराचार ही मरण है। All time सुखकारी और हितकारी आचार को अपने व्यक्तिगत जीवन में, परिवार में, समाज में सर्वत्र First and must बनाते रहिए।

 

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प्राचीन साहित्यों में तीन चीजों को रत्न की उपमा दी गई है, जल, अन्न और सुभाषित। इनमें से सुभाषित रत्न का जगमगाता प्रकाश पू. मुनि भगवन्त हमारे समक्ष लेखमाला के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।संस्कृत से संस्कृति का सन्देश देने वाला यह लेख युवावर्ग बड़े चाव से पढ़ेगा।

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