सद्गुरु शरणं मम

औचित्य का एवरेस्ट

 

गुणगण सम्राट्, सुविशाल गच्छाधिपति, सिद्धान्त दिवाकर पूज्यश्री के गुणगान करना गुणों के समुद्र से रत्नों का संचय करने जैसा है। वे स्वयं गुणों के महासागर थे। इस अवसर पर ‘अल्पश्रुतं श्रुतवतां परिहास धाम—’ श्लोक याद आ रहा है। परंतु उनके प्रति भक्ति, लगाव व समर्पण मुझे कलम उठाने की प्रेरणा दे रहा है।

 

पूज्यश्री के गुणों की बात करना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा है। क्योंकि-

 

पूज्यपाद श्री अर्थात् गुणगण के समुद्र!, पूज्यपाद श्री अर्थात् वात्सल्य के महासागर!

 

पूज्यपाद श्री अर्थात् उपशम रस के महाभण्डार!, पूज्यपाद श्री अर्थात् सुधारस की खान!

 

पूज्यपाद श्री अर्थात् समता के शिखर!, पूज्यपाद श्री अर्थात् अध्यात्म साधना के महायोगी!

 

पूज्यपाद श्री अर्थात् जीवन्त ज्ञान का उछलता हुआ महासागर!, पूज्यपाद श्री अर्थात् परोपकार की मूर्ति!

 

पूज्यपाद श्री अर्थात् औचित्य के शिखर!

 

इस प्रकार के अनेक गुणों में से अध्यात्म के एक महत्वपूर्ण स्तम्भ स्वरूप ‘औचित्य गुण’ की बात यहां की जा रही है। पूज्यश्री औचित्य के शिखर थे।

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ओपेरा:

 

पूज्यश्री का अंतिम चातुर्मास ओपेरा में था। वहां पूज्य अशोकसूरि दादा के अंतिम संस्कार से पवित्र हुई भूमि के ऊपर छोटा सा गुरू मंदिर था। पूज्यश्री प्रतिदिन जब मंदिर जाते थे, तो उसके पहले वे उपाश्रय में लगे तीन गुरू भगवंतों के चित्र ( फोटो )  को वंदन करते, तदुपरांत पूज्य अशोकसूरि दादा के  गुरूमंदिर जा कर विधिवत वंदन करते थे। यह वंदन पूज्यश्री के नित्यक्रम में सम्मिलित था।

 

कई बार बीमारी के कारण सीधा देरासर जाना होता तो स्ट्रेचर को गुरू मंदिर की ओर ले जाने के लिए कहते, और वंदन कर लेते थे। विशेष परिस्थितियों में मांगलिक आदि प्रसंग पर जाना होता था तो समारोह के उपरांत स्थापित गुरू-चरणों का वंदन कर अपने स्थान पर पधारते थे।

 

इस प्रकार के औचित्य, आदर, सम्मान, बहुमान को नतमस्तक वंदन।

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परिमल जैन संघ:

 

पूज्य नेमिसूरि समुदाय के पूज्य आचार्य श्री हेमचन्द्रसूरिजी महाराज की पावन निश्रा में संवत् 2070 के आंबावाड़ी चातुर्मास में सभी श्रमण-भगवंतों का स्नेह मिलन हुआ।

 

मिलन के प्रारंभ में जब पूज्यश्री ने पाट से नीचे उतर कर वडिल एवं निश्रादाता आचार्य श्री की खड़े होकर वंदन करना प्रारंभ किया, तो पूज्य निश्रादाता आचार्य श्री एवं उपस्थित अन्य श्रमण व श्रावकवृंद आश्चर्य चकित हो गये। पांच सौ श्रमणों के सुविशाल गच्छ के गच्छाधिपति अपने से बड़े आचार्य को सार्वजनिक रूप से इतनी सहजता और सरलता से वंदन करें, इतनी लघुता, इतनी सहजता, और इतना औचित्य सभी को अहोभाग्य से भर गया।

 

पूज्य आचार्य श्री हेमचन्द्रसूरिजी महाराज ने गुणानुवाद करते समय इस प्रसंग को बार-बार याद किया है।

 

शारीरिक स्वास्थ्य की अनुकूलता न होने पर भी सम्मेलन के उपरांत संघ के कल्याण एवं रत्नाधिक होने के कारण आप श्री पैदल विहार कर देवबाग (शान्तिवन) पूज्य आचार्य श्री हेमचन्द्रसूरिजी महाराज (पूज्य नेमिसूरि समुदाय) को वंदन करने हेतु पधारे।

 

इस प्रकार के आत्मीय व्यवहार से आपसी संबंधों में अभिवृद्धि हुई।

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आंबावाडी:

 

आंबावाडी में शेषकाल की स्थिरता के समय किसी प्रसंग पर अन्य समुदाय के आचार्य श्री पधारे। पूज्यश्री ने अपने शिष्य से कहा कि उन साधुओं से गोचरी पानी के लिए विनती करो। शिष्य ने जाकर विनती की, परंतु उन्होंने अस्वीकार कर दिया और अपनी गोचरी और पानी स्वयं लेकर आये।  इसके बावजूद सरल-हृदयी पूज्यश्री ने संध्या के समय अपने शिष्य से कहा कि, ‘जाओ, वंदन करके आओ।’

 

साधुओं ने कहा- वे आप से छोटे आचार्य हैं। पहले वे आप को वंदन करने आयेंगे, उसके बाद हम उन्हें वंदन करने जायेंगे।

 

पूज्यश्री ने कहा कि वे नहीं आते, तब भी हमें जाना चाहिए। यदि छोटे साधु अभिवादन, व्यवहार न करे तो बड़े को ही शुरू कर देना चाहिए। तुम्हें नहीं जाना है तो कोई जबरदस्ती नहीं है। मैं ही ऊपर जाता हूं। मुझे वहां देखकर वे बातचीत व वंदन करने के लिए स्वयं मजबूर हो जायेंगे।

 

अपने से छोटे आचार्य से मिलने के लिए स्वयं तैयार होकर चल पड़ना, इतने महान गच्छाधिपति पद पर विराजमान पूज्यश्री की इस हद तक की सरलता देखकर सभी महात्माओं के हृदय में पूज्यश्री के प्रति बहुमान भाव और अधिक बढ़ गया।

 

सत्य है, जब हृदय में लघुता, सहजता, सरलता, औचित्य आदि अनेकानेक गुणों का महासागर हिलोरे लेता है, तभी महान गच्छाधिपति बनते हैं।

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एक प्रतिष्ठा प्रसंग पर पूज्य श्री ने फरमाया कि गौतम स्वामी की प्रतिष्ठा की बोली, भगवान की प्रतिष्ठा की बोली से बड़ी नहीं होनी चाहिए। इस बारे में पूज्यश्री हमेशा ध्यान रखते थे।

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साबरमती में चातुर्मासिक प्रवेश, संवत् 2073 :

 

मान-बहुमान के साथ भव्यातिभव्य चातुर्मास प्रवेश का सामैया शुरू हुआ। पूज्यश्री को भक्तों ने अपने कंधों पर उठा लिया। पूज्यश्री ने उनको बहुत मना किया, किन्तु लोगों ने उन्हें नीचे उतारा ही नहीं। सामैया आगे बढ़ता रहा।

 

करीब पांच-सात वर्षों से यही हो रहा था कि सामैया के दौरान भक्तजन पूज्यश्री को अपने कंधों पर उठा लेते थे।

 

आखिर पूज्यश्री कुछ बहाना बनाकर नीचे उतरे और उपाश्रय पहुंच गये।

 

अमूमन कभी ऐसा नहीं होता था। पूज्यश्री पूरे सामैया को अपनी निश्रा प्रदान करते थे और पूरे रास्ते साथ-साथ रहते थे। अतः पूज्यश्री का सामैया छोड़कर उपाश्रय आ जाना शिष्यों को खटक रहा था।

 

वहां इतने अधिक भक्तजन और साधु भगवंत थे, परंतु इसके बारे में किसी की पूछने की हिम्मत नहीं हुई। आखिर दोपहर में एक महात्मा ने पूज्यश्री से इस बारे में पूछ ही लिया। पूज्यश्री बोले- ‘आचार्य श्री हेमचन्द्रसूरिजी और मैं, दोनों समकक्ष कहे जाते हैं। भले ही पर्याय में मैं बड़ा हूं, पर आयु में वे मुझसे बड़े हैं, विशिष्ट ज्ञानी हैं। वह नीचे व्हीलचेयर पर हों और मैं भक्तों के कंधे पर, यह मुझे अच्छा नहीं लगा। यह मर्यादापूर्ण व्यवहार नहीं है। इसीलिए मैं नीचे उतर कर उपाश्रय आ गया।’

 

उस दिन औचित्य शिरोमणि पूज्यश्री के इस सूक्ष्म मर्यादापूर्ण व्यवहार ने अनेक भव्यात्माओं को उत्तम-कोटि की हितशिक्षा प्रदान की।

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पूज्यश्री योग साधना के उच्च शिखर पर आसीन थे। वे महायोगी की दशा का अनुभव करने वाले महान विरल विभूति थे। आत्मानंद की सुखानुभूति स्वरूप निश्चय के महासागर थे। ऐसे महायोगी से सामान्य व्यवहार में चूक होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यही तो सच्चा निश्चय है।

 

‘निश्चय दृष्टि हृदये धरीजी, पाले जे व्यवहार।’

 

हृदय में शुद्ध निश्चय दृष्टि धारण करने वाले पूज्य श्री औचित्य रूप व्यवहार की शुद्ध अनुपालना में निष्णात थे।

 

मेरी हार्दिक कामना है कि ऐसे गुणगण सम्राट् पूज्यश्री के चरणों में चिरकाल तक मेरा शीश नतमस्तक रहे और पूज्यश्री की करुणा, कृपा निरंतर मुझ पर बरसती रहे।

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