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गोडीजी का इतिहास

!! अथ श्री गोडी पार्श्वनाथजी की कथा !!

 

अखिल विश्व में 23 वें तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथ भगवान का प्रभाव अतिशय प्रख्यात है।

 

प्रायः ऐसा कोई जिनालय नहीं होगा कि जिसमें पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमाजी प्रतिष्ठित न हो, साथ ही ऐसा कोई जैन श्रावक का घर नहीं होगा कि जिसमें पार्श्वनाथ भगवान की छवि (फोटो) न हो।

 

कहीं पर शंखेश्वर पार्श्वनाथ, तो कहीँ नाकोडा पार्श्वनाथ के रूप में भगवान की भक्ति होती है। कहीं पर नागेश्वर पार्श्वनाथ, तो कहीं जीरावला पार्श्वनाथ के रूप में भगवान का पूजन होता है।

 

108 जिनके नाम हैं और गाँव-गाँव जिनके धाम हैं।

 

  • जिनकी मूर्ति स्वयं यंत्र है,

 

  • जिनका नाम स्वयं मंत्र है,

 

  • जिनकी पूजा स्वयं तंत्र है,

 

ऐसे प्रगट प्रभावी, सकल समीहित संपूरक, पुरुषादानीय श्री पार्श्वनाथ प्रभु में “श्री गोडीजी पार्श्वनाथ” प्रभु की महिमा को हम जानेंगे।

 

क्योंकि,

 

गत चौबीसी में जिस बिंब का निर्माण किया गया था, वर्तमान समय में जो प्राचीनतम प्रतिमा कही जाती है, और जिसकी महिमा सविशेष प्रसरित हो रही है, ऐसे श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ प्रभु का इतिहास को तो अनेकानेक लोग जानते हैं।

 

किन्तु जिन्हें प्रकट हुए केवल 645 वर्ष हुए हैं ऐसे श्री गोडीजी पार्श्वनाथ प्रभु का इतिहास बहुत कम लोग जानते हैं।

 

शंखेश्वर पार्श्वनाथ प्रभु की महिमा आज खूब विख्यात हो गयी है। एक समय ऐसा भी था कि शंखेश्वरजी की पेढी को भोयणी की पेढी सहायक बनती थी। और आज प्रभाववंत श्री शंखेश्वर तीर्थ में से अनेक जिनालयों का जीर्णोद्धार हो रहा है।

 

वि.सं. 2077 के अनुसार प्राचीन तीर्थों में श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ भगवान मूलनायक स्वरूप में विराजमान हो, ऐसे तीर्थ अधिक नहीं होंगे। किन्तु वर्तमान में जहाँ भी पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिष्ठा होती है, वहाँ प्रतिमा का नामकरण “श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ भगवान” के नाम से अधिक होता है ।

 

➡️ एक समय था जब श्री गोडीजी पार्श्वनाथ भगवान का प्रभाव ऐसा ही रहा है।

 

➡️ जहाँ-जहाँ प्रभु पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिष्ठा होती थी, वहाँ-वहाँ “श्री गोडीजी पार्श्वनाथ भगवान” के नाम से नामकरण होता था।

 

➡️ 645 वर्ष में 150 जितने प्राचीन तीर्थों में मूलनायक के रूप में श्री गोडीजी पार्श्वनाथ भगवान विराजमान हैं।

 

➡️ पालीताणा आदि अनेक तीर्थों में गोडीजी पार्श्वनाथ भगवान के पगलिए (पादुका) प्रतिष्ठित है।

 

अनेक छरी पालक संघ गोडीजी दादा के दर्शनार्थ निकले हुए हैं। उस समय जब किसी के घर में कोई बीमार पड़ता था, तब लोग गोडीजी दादा के नाम से दीपक प्रज्वलित करके प्रार्थना करते थे और रोग दूर हो जाता था।

 

प्रभुजी का प्रभाव दूर-सुदूर तक फैला हुआ था।

 

किन्तु काल की असर से मूल गोडीजी पार्श्वनाथ प्रभु की प्रतिमा और उनके इतिहास की बातें विस्मृतप्राय: हो गयी हैं।

 

ना ही मूल प्रतिमा की जानकारी प्रसिद्धि में रही, और ना ही उसके ऐतिहासिक तथ्यों की जानकारी। 

 

और हाँ !

 

श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ हो या श्री गोडीजी पार्श्वनाथ, हैं तो दोनों पार्श्वनाथ भगवान ही, यहाँ कोई भिन्न-भिन्न भगवान नहीं है।

 

हमें जो प्रभाव देखने के लिए मिलता है, उसमें पार्श्वनाथ भगवान ही नहीं अपितु अधिष्ठायक देवों की जागृति एवं भक्तों के भावों की इच्छा-आकांक्षा ही प्रमुख कारण है।

 

सांसारिक जीव सामान्यतः स्वार्थी होते हैं, जहाँ उनका स्वार्थ पूर्ण हो सकता है, वहाँ वे भागते हुए जाते हैं।

 

यह स्वार्थभाव इतना खतरनाक होता है कि, यदि प्रभु भी इनके स्वार्थपूर्ति के साधन ना लगें, तो ये लोग प्रभु को भी बदलने में देर नहीं लगाते।

 

श्री गोडीजी पार्श्वनाथ भगवान से जो हम दूर हुए हैं, उसके पीछे भी ऐसा ही कुछ कारण लगता है।

 

तो आइए !

आज हम इतिहास के उन पन्नों को उलटते हैं, और जान लेते हैं मूल गोडीजी पार्श्वनाथ प्रभुजी की बातें !

 

 


 

 

गुरुवर पधारे ! प्रभु को पधराएँ !

 

‘पधारिए गुरुदेव ! पधारिए !’ जन-जन के मुख पर स्वागत के शब्द थे।

 

पाटण की धन्य धरा आज गुरु भगवन्त के पावन कदमों से धन्य-धन्य बनी थी।

 

वि.सं. 1431, ई.स. 1357 के वर्ष की बात है।

पूज्य आचार्य श्री महेन्द्रप्रभसूरि म.सा. के शिष्य पूज्य आचार्य श्री अभयदेवसूरि म. सा. को वन्दन करके सभी आशीर्वाद प्राप्त कर रहे थे। जिज्ञासुओं की ज्ञान-पिपासा को प्रवचन के माध्यम से गुरुदेव शांत कर रहे थे।

 

पाटण संघ में अनेक श्राद्धवर्य हैं, जिनके केवल मन में ही धर्म नहीं अपितु मन भी धर्म में बसा है। इन सभी श्राद्धवर्यों में एक परम भक्तिवन्त श्रावक थे, जिनका नाम था खेतसिंह। 

 

गुरुवन्दन कर सुखशाता पृच्छा करने का इस श्रावक का नित्यक्रम था।

 

एक स्वर्णिम दिवस पर पूज्य आचार्य भगवन्त की दृष्टि इस श्रावक पर स्थिर हुई। उनके ललाट पर शासन के लिए भव्य सुकृत करने का पुण्य झलक रहा था।

 

पूज्यश्री ने खेतसिंह को कहा, “प्रभु के उपकारों के समक्ष कृतज्ञता की अभिव्यक्ति के लिए आपको भव्य जिनालय का निर्माण करना चाहिए !”

 

“गुरुदेव ! मनोरथ तो है ही और उसमें आपश्री ने प्रेरणा की है अर्थात् अब यह भव्य सुकृत होगा ऐसी श्रद्धा दृढ हो गई है ।”

 

“॥ शुभस्य शीघ्रम् ॥”

 

 

“आप आशीर्वाद दें गुरुवर !” तत् पश्चात् शुभ मुहूर्त देखकर खनन विधि की गई।

 

शिल्पशास्त्र में पारंगत सोमपुरा को आमन्त्रित किया गया। शिला स्थापन आदि से लेकर शिखर तक का निर्माण अविरत रूप से चला।

 

खेतसिंह भी उदारता से कारीगरों से लेकर सोमपुरा तक सभी को खुश रख रहे थे।

 

जिनप्रतिमा के निर्माण के लिए कुशल शिल्पी हृदय में श्रद्धाभाव को धारण कर तन-मन से पत्थरों को आकार दे रहे थे।

 

टन… टन… टन… पत्थर का प्रतिमा में परिवर्तित होने के समय का कर्णमधुर संगीत गूंज रहा था।

 

देखते-देखते ही 1 वर्ष पूर्ण होने आया, अब तो देवगृह (जिनालय) प्रभु की प्रतिष्ठा के लिए प्रतीक्षा रूप में खड़ा हो गया था ।

 

अब खेतसिंह के मन में भव्यातिभव्य अंजनशलाका-प्राणप्रतिष्ठा करने के विचार उमड़ने लगे।

 

जिनमन्दिर प्रेरक गुरुदेव की निश्रा में उपस्थित होकर बहुमान पूर्वक वन्दना करके करबद्ध विनती की,

 

“हे सन्मार्ग दाता गुरुवर !” “आपके मार्गदर्शन पर चलते-चलते मैं सुकृत करने के लिए तत्पर बना। आपके आशीष से मैं सफलता के द्वार पर पहुँचा हूँ।

 

हे परम उपकारी सूरिवर ! देवविमान सदृश जिनमन्दिर प्रभु के आगमन के बिना सूना-सूना है। आप पधारें ! अंजनशलाका-प्राणप्रतिष्ठा करें ! हम पर उपकार करते हुए हमारे मनोरथ को पूर्ण करें !”

 

“ओमिति” पूज्यश्री ने (सकारात्माक प्रतिसाद) प्रत्युत्तर दिया।

 

 खेतसिंह पाटण लौटे और पूज्य गुरुदेव के स्वागत की भव्य तैयारी करनी शुरू की। साथ ही साथ प्रतिष्ठा महोत्सव के लिए अनेक संघों में मन्त्रण भेजे गए।

 

वि.सं. 1432, ई.स. 1376 के मार्गशीर्ष महीने में कृष्ण पक्ष की शुभ तिथि पर पूज्यश्री का पाटण में भव्य स्वागत के साथ प्रवेश हुआ, और तत् पश्चात् महोत्सव का शुभारंभ हुआ।

 

खेतसिंह के मन में उल्लास फूले नहीं समा रहा था।

 

देश-देशांतर से सभी लोग प्रतिष्ठा महोत्सव में पधार रहे थे। महोत्सव में हो रहे पवित्र विधान में सभी भाविक उत्साह के साथ जुड़ रहे थे।

 

और…

 

वि.सं. 1432, ई.स. 1376 फाल्गुन शुक्ल द्वितीया, शुक्रवार के शुभ मुहूर्त पर पूज्य आचार्य श्री अभयदेवसूरि म.सा. के वरदहस्त से श्री पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिष्ठा हो गई।

 

मीठडीया गोत्र के ओसवाल वंश के खेतसिंह का ललाट ‘संघपति’ के तिलक से अलंकृत हुआ और कण्ठ में माला पहनाई गई ।

 

प्रभु की प्रतिष्ठा और शिखर पर ध्वजा लहराकर खेतसिंह स्वयं के जीवन की सार्थकता का अनुभव कर रहे थे। उन्होंने प्रतिष्ठा प्रसंग पर पधारे हुए सभी की भक्ति की, संघपूजन किया।

 

और…,

 

इसके साथ जिनशासन के इतिहास में एक सुवर्ण पृष्ठ जुड़ गया ।

 

किन्तु…

 

किसे पता था कि भविष्य के अंतर में क्या समाया है।

 

जैसे श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ की प्रतिमा अनेक जगह पर स्थानांतरित होती रही है, वैसे ही श्री गोडीजी पार्श्वनाथ प्रभु की प्रतिमा भी स्थानांतरित होने वाली है ।

 

(क्रमशः)

About the Author /

authors@faithbook.in

जिनके प्रवचन और शिविरों में भाग लेने के लिए युवावर्ग दौड़ा चला आता है, साथ काव्य सृजन और लेखन में जिनकी लेखनी सुप्रसिद्ध है, ऐसे मुनिवर के विविध लेख युवाओं की पहली पसन्द बनेंगे, ऐसी श्रद्धा है।

1 Comment

  • Rushabh Sukhadia
    July 25, 2021

    🙏🙏🙏👌👌👌

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