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गोशाला V/s गौतम

Hello Friends!

 

परमात्मा बनने की सफ़र में हम अग्रसर हैं। आज एक बहुत महत्त्वपूर्ण पद पर हम विचार करेंगे। आज का हमारा पद है – ‘श्री विनय पद।’

 

विनय एक श्रेष्ठ आलंबन है। इसी आलंबन के जरिए तीर्थंकर नामकर्म का बंध हो पाता है। गौतम स्वामी जी भगवान महावीर स्वामी जी का विनय करते-करते ही सब कुछ पाए थे। 

 

विनय का अर्थ है झुकना। लोग मटकी लेकर समुद्र के पास जाते हैं, पर यदि झुकने से इनकार कर दें, तो मटकी पानी से भर नहीं पाते। पूर्ण होने की प्रथम शर्त है झुकना। जो महान है, जो पूर्ण पुरुष परमात्मा हैं, उनके पास मात्र जाने से कल्याण नहीं होता, वर्ना गौशाला और जमालि भी तो प्रभु महावीर के पास आये थे, क्यों उनका कल्याण नहीं हुआ? क्यों गौतम स्वामी जी का ही कल्याण हुआ? क्योंकि गौतम स्वामी का लोटा झुका, और भर गया। जबकि गोशालक का लोटा समुद्र के पास तो आया, पर झुका नहीं, सो खाली का खाली ही रह गया।

 

कैसी करुणदशा होगी, जब बड़ी मेहनत से समुद्र के करीब आया जाए, पर फिर भी समुद्र में लोटा डुबोने से इन्कार कर दिया जाए……….

 

यदि हमें पूर्ण होना है, तो सबसे पहले यह आवश्यक है कि हमें हमारी अपूर्णता का भान हो। कभी-कभी इन्सान अपने आप को इतना बड़ा और सभी तरह से पूर्ण मानने लगता है कि उसे कहीं पर भी झुकने की कोई जरुरत ही महसूस नहीं होती…

 

किसी शायर ने कहा है –

‘झुकता है वही जिसमें जान है, अक्कड़ता तो ख़ास मुर्दों की पहचान है।”

मतलब स्पष्ट है – जो झुकता है, वही ज़िंदा है, जो अकड़ू है वह मुर्दा है।

 

अक्कड होकर घूमने वाले इन्सान के कभी कोई सच्चे दोस्त भी नहीं होते है। जो उसके आस-पास होते हैं, वे सभी स्वार्थी होते हैं, जैसे ही उनको लगा कि यहाँ अपनी कुछ दाल गले ऐसा नहीं है, अब इसके पास कुछ बचा नहीं, तो वे लोग तुरंत ही आप को छोड़ के चले जाने में ज़रा सी भी देर नहीं करेंगे। वे लोग कभी दिल से आप को चाहते ही नहीं थे, और क्यों चाहेंगे? अक्कड़ आदमी अपने गलत बिहेवीयर से हर बार अपने नजदीक रहने वालों का दिल तोड़ता रहता है, वह कभी किसी के दिल को जीतने की मेहनत नहीं करता है।

 

मैं कहूंगा ज़रा जागो, अपने आस-पास देखो, थोडा गौर करो…

 

कौन आदमी आपसे सच्चा प्रेम रखते हैं, और कौन ले भागू है, जो अपना काम निकलवाने के लिए आप से संबंध रखता है। आप को अपने आप पता चल जाएगा। और फिर एक बात सुनना… आपके सही-सच्चे रिश्तों का मान रखना, उनको सम्मान देना, उनके सामने सिर झुका देना… उनके पैरों मै बैठ जाने में खुद को भाग्यशाली समझना। वह इन्सान बड़ा भाग्यशाली होता है, जिसके पास ऐसे रिश्ते होते हैं।

 

हाँ. ले भागू-स्वार्थी लोगों से हमेशा अंतर रखना, भले ही उन्हें ये लगे कि आप अक्कड़ हैं, झुकते नहीं। लगने देना, परन्तु उन्हें अपना उपयोग करने मत देना। संसार ऐसे लोगों से भरा पड़ा है, जो आपका सिर्फ उपयोग करना चाहते हैं, जो आपसे सही प्रेम नहीं रखतें।

 

तो दोस्तो, ये बात है विनय की, यह दास्तान है विनय की। विनय झुकना सिखाता है, विनय जीना सिखाता है, विनय जान है, आन-बान और शान है। विनय से जियो शान से जियो। अभी हम छोटे बच्चे नहीं है कि बड़ों बुजुर्गो के सामने जवाब दें, ऊँची आवाज में बात करें, उनकी बाते न मानें, उनका अविनय करें … नहीं, जब छोटे थे तब यह भूल हम करते रहे, ठीक है, उन्होंने समझा छोटा है सो भूल करता है। पर जब अब बड़े हो गए है, उसके बाद भी जब हम वही गलतियाँ दोहरा रहे हैं, तब उनका दिल टुकड़े-टुकड़े हो जाता है।

 

अगर विनय पद की आराधना करनी है, तो इतना ध्यान रखें – 

 

“जो हमारी जिंदगी में हमसे सच्चा प्यार रखते हैं, उनकी आँखों में हमारे लिए आँसू भले ही आये, पर हमारे कारण आँसू कभी भी न आयेंगे।”

About the Author /

authors@faithbook.in

शास्त्रबोध, संवेदनशीलता और शीघ्र-कवित्व का व्यक्तित्व धारण करने वाले मुनिवर ने, भगवान बनने का राजमार्ग, अर्थात् वीसस्थानक पर नूतन काव्यों की रचना की और साथ उनकी ऐसी विवेचना की जो युवा हृदय को छू सके।

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