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जिनशासन : एक वटवृक्ष

संघत्याग

 

सुमितभाई होस्पिटलाईज्ड हुए। उनका मित्र खबर पूछने गया। तबियत पूछी, लगभग कुछ भी अच्छा नहीं था। तीन फ्रेक्चर, बुखार, उल्टी, पीड़ा, दवाओं की साइड इफेक्ट्स, इत्यादि। मित्र सरफिरा था, बोला “तुझे शरीर इतना परेशान करता है! कितना बुरा है तेरा शरीर! फोकट तू इस शरीर में बैठा है, छोड़ दे इस शरीर को!”

 

क्या कहेंगे सुमितभाई? शरीर हैरान करता है, यह बात तो 100% सही है। शरीर छोड़ देने से परेशानी मिट जायेगी, यह भी हकीकत है। फिर भी शरीर छोड़ने की बात तो दूर, शरीर छोड़ने का खयाल मात्र भी सुमितभाई नहीं कर सकते थे। जर्जरित, टूटा-फूटा, बीमार, दुःखदायक, पर ‘मेरा’ शरीर है। उसे छोड़ने का अर्थ ‘मौत’ है। यह सुमितभाई बराबर समझते हैं।

 

शरीर त्याग का अर्थ है मृत्यु। संघत्याग का अर्थ है अनंत मृत्यु। भले ही हमारे विचार दूसरों के साथ ना मिलें, भले कभी-कभी बर्तन टकराये, भले कभी-कभी किसी के द्वारा मेरे प्रति अच्छा व्यवहार ना भी हो, तो क्या हुआ? क्या उसके लिए संघ छोड़ सकते हैं?

 

मुझे मान मिले तो मैं काम करूं – इसका अर्थ है, संघत्याग।

मुझे आगे आने दो तो मैं संघ में आऊं, इसका नाम है संघत्याग।

वहाँ तो सारे फसाद ही हैं – इसका नाम है संघत्याग।

 

परिवार बिगड़ता है तो हम सुधारने का प्रयास करते हैं, क्योंकि परिवार के प्रति आत्मीय भाव है। शरीर चूर-चूर हो जाता है, तो हम ICCU तक के सारे ही प्रयास कर गुजरते हैं। क्योंकि शरीर के प्रति आत्मीयभाव है। संघ में कुछ अनहोनी होते ही हम फटाक से किनारा कर लेते है, क्योंकि संघ के प्रति हमें आत्मीयभाव है ही नहीं।

 

जहाँ नाता तोड़ा जाता है, वहाँ हकीकत में नाता जुड़ा ही नहीं होता है। मनमुटाव होते ही, हम अलग हो जाते हैं, इसका अर्थ यह हुआ कि हम अलग होने की ही राह देख रहे थे।

 

प्रेम

 

When love is thin, faults are thick;

When love is thick, faults are thin.

प्रेम पतला हो, तब भूलें तगड़ी होती है;

प्रेम तगड़ा हो, तब भूलें पतली होती है।

 

  • वास्तव में सवाल भूलों का है ही नहीं, प्रेम का है। प्रेम नहीं, तो बिना गलती के भी तलाक हो जाता है।

 

देरासर की एक-एक वाटकी के साथ हमारा प्रेम-संबंध है? हमने कभी भी देरासर के एकाध स्तंभ की Carving में ममता से हलके हाथों से पोता मार कर क्लिनींग किया है? हमने कभी उपाश्रय की सीढ़ी को वंदन किया है? हमने कभी भी देरासर के माली का भीगे हृदय के भावों से उपकार माना है? बारह महीने में बारह दिन भी हमारे ऐसे है कि पाठशाला के बालकों को हमने प्रेम से सर पर हाथ रखकर कहा हो कि, “बेटा! तू पाठशाला में आया! बहुत अच्छा किया।” पानी उबालने वाले आदमी का हमने कभी पैर छूआ कि, आप तो हमारे साधु-साध्वीजी भगवंतों को पानी वहोराते हो, आप भी हमारे लिए वंदनीय हो। हमारे घर पर प्रसंग हो तब देरासर के पुजारी और उपाश्रय के सफाई कर्मचारी को सहभागी बनाया है? संघ में प्रसंग हो और हमारे समय और शरीर का कुछ भी योगदान देना संभव ना हो सका हो तो, हमें रात को नींद ना आये, सब कुछ खाली-खाली सा लगे – ऐसा कभी हुआ है?

 

हमने देरासर में साधारण में रकम लिखाई है। उबाले हुए पानी की तिथि लिखायी है। पाठशाला में हमारा हिस्सा होता ही है। और संघ में प्रसंग हो उसमें, एक शुभेच्छक के रूप में हमारा नाम लिखाते हैं। उसका हमें संतोष होता है। पर जिसे ‘संघपूजा’ कहते है, ऐसा कुछ भी हम नहीं कर सके हैं, उसकी हमें कोई व्यथा हुई है?

 

‘साहेबजी! अब ऐसा है ना कि, आपकी सारी बात सही है, पर आपको अंदर की पूरी खबर नहीं होती है। यहाँ लफड़े इतने है, उसने ऐसा किया, उसने वैसा किया, उसने मुझे ऐसा जवाब दिया, उसने मेरे बारे में ऐसा कहा, इसलिए अब मेरा मन यहाँ पर नहीं लगता है। मेरा फ्रेंड मुझे एक बार वहाँ ले गया था, वहाँ कोई भी खटपट नहीं थी। सब कुछ सिस्टेमेटिक, सब कुछ ड़ीसीप्लीन में, सब कुछ पोलाईट, प्रेजन्टेशन भी अच्छा, अब मेरा वहाँ ही जाने का विचार है, हम लड़ने में नहीं मानते।’

 

ठीक है। इतना तय करो कि जहां झगड़ा हो वहाँ से निकल जाना है। लेकिन पहले घर से निकल जाना पड़ेगा, फिर धंधे में से निकल जाना पड़ेगा, फिर शरीर में से निकल जाना पड़ेगा।

 

 

वटवृक्ष और मशरूम

 

जिनशासन यह वटवृक्ष जैसा है। जिसका वृक्षारोपण श्रमण भगवान श्री महावीर स्वामी ने किया है। दुनिया की यह प्राचीनतम संस्था है, जो आज भी अपने मूल स्वरूप में है। यह शाखा, प्रशाखा, प्रप्रशाखा आदि रूप से निरंतर बढ़ती-बढ़ती आज बहुत-बहुत ‘विशाल’ कक्षा को पहुँची हैं। इसकी विराटता, इसकी छाया, इसके फल, इसमें रहने वाले सैकड़ों-हजारों पक्षी, इसके नीचे आराम करते मुसाफिर यह सब बेजोड़ है। पक्षियों के मालिक हैं। 

 

हाँ, उसकी किसी शाखा किसी ने इस तरह तोड़ी है, कि यह कुरूप लगता है। कोई कृतघ्न मुसाफिर ने उसकी छाया में ही थोड़ी गंदगी फैलाई है। कुछ बंदरों ने उसकी कुछ डालियों में तूफान मचा रखा है। कुछ पक्षियों की चरक से यह थोड़ा मलिन हुआ है, ऐसा हो सकता है। 

 

इसलिए कुछ मुसाफिर सोचते है, ‘यदि इस बरसात में सामने एक मशरूम उगा है, ब्युटीफूल, एकदम डिसन्ट, उसकी चमक तो देखो, न वहाँ तूफान है, ने वहाँ चरक, न वहाँ गंदगी और न वहाँ तोड़-फोड़, चलो अब हम इस वटवृक्ष को छोड़ देते हैं। कितना पुराना है यह वटवृक्ष। अब वटवृक्ष का जमाना गया, बस, अब तो यह मशरूम है, और वे वहाँ जाने की तैयारी करते है।’

 

इतने में कुछ बुजुर्ग मुसाफिर कहते है, “भले आदमी! आप में कुछ अक्ल है कि नहीं? चाहे जैसा भी हो, वटवृक्ष तो वटवृक्ष होता है। वटवृक्ष 300 वर्ष पुराना है। यह मशरूम तो 3 दिन पुराना है। यह 30 दिन भी टिकेगा कि नहीं, यह प्रश्न है। उतना समय भी वह आपको छाया नहीं दे सकेगा। आपकी रक्षा नहीं कर सकेगा। दुनियाभर के मशरूम मिलकर भी आपको यह नहीं दे सकेंगे, जो यह वटवृक्ष दे पायेगा। सौंदर्य और चमक यदि हमारी रक्षा ना कर सके तो हमारे किस काम के? उसका सौंदर्य और उसकी चमक उसे ही मुबारक। भले आदमी! वस्तु जितनी ज्यादा पुरानी हो उतना उसमें बदलाव ज्यादा होता है। मशरूम की आयु भी छोटी, उसकी साइज भी छोटी, उसमें कितना बदलाव (प्रगति) आयेगा? वटवृक्ष खुद बड़ा, उसका आयु भी बड़ी और उसके पास आने वाला वर्ग भी बड़ा, इसलिए उसमें ज्यादा नयापन होता है।”

 

सही सवाल तो कम बदलाव या ज्यादा बदलाव का है ही नहीं। असली सवाल तो हमारी सुरक्षा कहाँ है, उसका ही है। यहाँ बदलाव ऊंच-नीच है और वहाँ चमक है। यह सब देखने में आप अपनी सुरक्षा का मूल मुद्दा ही खो बैठे हैं। जो खुद की सुरक्षा नहीं कर सकता है, वह आपकी सुरक्षा क्या करेगा?

 

वटवृक्ष का त्याग करने में वटवृक्ष हमें नहीं गँवाता, हम वटवृक्ष गँवा बैठते है। वटवृक्ष का त्याग यह सुरक्षा का त्याग है। वटवृक्ष त्याग यह भविष्य का त्याग है। वटवृक्ष का त्याग-यह आत्मा का, खुद का त्याग है।

 

मशरूम के पास फास्ट प्रोग्रेस है। एकस्ट्रा ब्यूटी है। एक अलग ही Existance है। वटवृक्ष को पास इनमें से कुछ भी नहीं है, क्योंकि वटवृक्ष यह मशरूम नहीं है, वटवृक्ष, वटवृक्ष है।

 

नये तमाम पंथ मशरूम है। जिनशासन वटवृक्ष है। उसमें कहीं कुछ टूट गया है तो हमें मरम्मत करानी चाहिये या पलायन हो जाना चाहिये? उसमें कहीं तूफान आया तो वटवृक्ष के पक्ष में खड़ा रहना चाहिये कि वटवृक्ष पर ही ‘तूफान निवास’ का आरोप रखना है? यह कहीं मलिन हो गया हो तो हमें उसका शुद्धिकरण करना चाहिये या छी-छी कहकर चलते बनना चाहिये?

 

वटवृक्ष इक्कीस हजार वर्ष टिकने वाला है। वटवृक्ष विस्तृत होते रहने वाला है। वटवृक्ष हमारी आत्मा की सुरक्षा करने वाला है। वटवृक्ष शीतल छाया देते रहने वाला है। वटवृक्ष संसार के ताप-संताप को रोकते रहने वाला है। वटवृक्ष की और मशरूम की तुलना की ही नहीं जा सकती! वटवृक्ष छोड़कर मशरूम के टोप में छाया ढूंढ़ना तो मूर्खता है।

( क्रमशः )

About the Author /

authors@faithbook.in

जिन्होंने अनेक धर्म-सम्प्रदायों के ग्रन्थ एवं पुस्तकों का गहन अध्ययन किया, और वर्तमान के विद्वानों में जो पहली पंक्ति में बैठते, ऐसे तीव्र मेधावी मुनिवर की विविध विषयों की यह लेखमाला मात्र प्रौढ़ या प्रबुद्ध वर्ग को ही नहीं बल्कि युवाओं को भी आकर्षित करेगी। Life को Change करने वाले लेख जीवन को नई दिशा देंगे।

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