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जिनशासन के चंद्र

 

अरिहंत बनने की मार्वेलस जर्नी पर हम नीकले है । हमारा छट्ठा पडाव है उपाध्याय पद ।

 

उपाध्याय भगवंत यानि ऐसे प्रज्ञावान साधुभगवंत जो आगमों के अर्क-नीचोड़ को भली भाँति जानते है । स्वयं भी निरंतर आगमों के अभ्यास में निरत रहते है, व दूसरों को भी हंमेशा आगमों का अभ्यास करवाते रहते है ।

 

उपाध्याय भगवंत यानि ऐसे प्रतिभावान साधुभगवंत जिनके पास आचार्यपदवी प्राप्त करने की हर प्रकार की काबिलीयतें है, पर फिर भी जिन्होंने आचार्यपदवी नहीं ली, अपितु आचार्य के प्रति हार्दिक समर्पण का भाव रखा । जिनका आचार्य के प्रति विनय व नम्रता का भाव देखकर अन्य साधुभगवंत भी प्रभावित है । उन्हें लगता है कि, यदि इतने प्रभावक होने के बावजूद भी उपाध्याय भगवंत आचार्य भगवंत के प्रति इतने समर्पित है, तो हमें भी अवश्य आचार्य भगवंत का उत्कृष्ट विनय करना ही चाहिए ।

 

जीवन में जो कोई भी व्यक्ति हमें एक शब्द भी सीखाते है, पढ़ाते है, लिखाते है, आगे बढ़ने के लिए एक बार भी थोड़ी हिन्ट भी देते है, थोड़ा सा भी अगर गाईडन्स भी कर देते है, तो फिर वह व्यक्ति हमारे लिए उपाध्याय बन जाता है ।

 

कोई जिन्दगी में ऐसे आते है, जो जीवन का बाग़ उजाड़ देते है, तो कोई जिन्दगी में ऐसे आते है जो जीवन के बाग़ में बहार भर जाते है । हमारा मन हंमेशा ऐसे लोगों का स्मरण रखता है, जिन्होंने हमारी जिन्दगी बिगाड़ के रख दी, पर हमें ऐसे लोगों का स्मरण रहता है, जिन्होंने हमारी जिन्दगी को सॅवारने के लिए कम या ज्यादा योगदान किया है ।

 

ऐसे लोगों का हमें स्मरण है ?

 

अहित करनेवाले और हित करनेवाले दोनों ही प्रकार के लोग हमारे हर एक के जीवन में आते है, आये है और आनेवाले है । प्रश्न यह है कि हमारे मन की मेमरी में किस प्रकार के लोगों का स्मरण सेव है ? यदि हम ऐसे लोगों को याद रखेंगे, कि जिन्होंने हमारा नुकसान किया है, तो जब-जब उनका स्मरण होता रहेगा, तब-तब हमारा मन कड़वाहटों से भरता रहेगा । जीवन तो उसने बिगाड़ा ही बिगाड़ा, अभी उसको याद कर के हमारा मन क्यों बिगाड़े हम ? बीते कल तो उसके कुकर्मों के कारण बिगड़ ही गए समजो, पर अपनी आज को उसकी कुस्मृतियो की वजह से खुद ही क्यों बिगाड़ के रख दे हम ? अकलमंद है तो अकल से काम ले । कोई क्या करता है वह उसके हाथों की बात है हमारे हाथों की बात नहीं, पर उसके किये पर हमें क्या सोचना, वह तो हमारे ही हाथ में है । महान आदमी हंमेशा अपनी सोच से महान होता है ।

 

यदि उपाध्याय पद की आराधना करनी हो, तो जीवन में हमेशा सकारात्मक प्रसंगों को ही याद रखें । अक्सर ऐसा भी होता है कि, एक ही व्यक्ति के साथ कुछ कड़वे प्रसंग भी बने हो और कुछ सुनहरे-मीठे भी । हो सकता है कि एक जमाने में वो हमारा बेस्ट फ्रेंड था, आज सामने देखता तक नहीं, हमारी बात ही नहीं होती है, और बाते करने बैठते है, तो बहस छिड़ जाती है । संबंधों की भी अपनी एक्सपायरी डेट होती है ।

 

यदि एक ही व्यक्ति के साथ कुछ कड़वा और कुछ मीठा दोनों ही प्रकार के प्रसंग हमने जिए है, तब मन में क्या याद आता है ? उसने हमारे लिए जो अच्छा किया वो या उसने हमारे साथ जो गलत किया वो ?

 

अच्छा बनना चाहते हो तो सबसे पहले अच्छा ही याद रखने से शुरुआत कीजिए । पहले अच्छा सोचे, फिर अच्छा करें, और फिर अपने कर्मों से अच्छे बने ।

 

हम कितने पापी थे, है, फिर भी प्रभु ने हमारी अल्प अच्छाइयों को सामने रखकर बुराइयों को भुलकर हमसे अनगिनत प्रेम किया, तो हम भी पापी, दोषी, नीच ऐसे दूसरों की अनन्य गलतियां को भी भूलकर उनको क्यों नहीं अपना सकते । हमारे न अपनाने से अपने कभी भी पराये तो होनेवाले नहीं है । प्रभु ने तो परायों को तक अपनाया, हम अपनो को तो अपनायें ।

 

उपाध्यायपद के गीत को गुनगुनाते हुए चलिए हमारे जीवन में रहे हुए उपाध्याय जैसे विरल व्यक्तिओ का स्मरण करें, जिसमें स्कुल के टीचर से लेकर घर के घाटी तक के सब कोई समज सकते है…

 

 

|| उपाध्याय पद ||

 

( सावन का महीना )

 

जिनशासन नभ आँगन में आप हो चंद्र समान,

पत्थर पर भी फुल उगाना, आप की है पहचान.

 

ज्ञान समुद्र में मगन रहते, हम को भी तत्व सफर कराते,

पढ़े पढ़ाए लिखे लिखाए आप का है यह काम… पत्थर…1

 

जिनशासन के अतल रहस्यों, आप की प्रज्ञा पार कराए,

आप बिना आगम का, अधूरा सारा ज्ञान… पत्थर…2

 

ज्ञानपटारी की कुंजी तुम हो, जिनशासन की पुंजी तुम हो;

हमें प्रभु बनाना, धरते तुम्हारा ध्यान… पत्थर…3

 

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शास्त्रबोध, संवेदनशीलता और शीघ्र-कवित्व का व्यक्तित्व धारण करने वाले मुनिवर ने, भगवान बनने का राजमार्ग, अर्थात् वीसस्थानक पर नूतन काव्यों की रचना की और साथ उनकी ऐसी विवेचना की जो युवा हृदय को छू सके।

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