जिनशासन के हीरे मोती

जिनशासन के हीरे मोती

रत्न का स्थान तिजोरी में और राख का स्थान कचरे के ढेर में होता है। रत्न जैसे जीव शासन की सेवा करते हैं, और राख जैसे जीव संसार में पड़े रहते हैं।

 

रत्न ढूंढने पर भी कम मिलते हैं, कभी मिलते, कभी नहीं भी मिलते हैं। रत्नों की प्राप्ति अल्प होने पर भी हमें उनके प्रति प्रेम होता है।

 

जिनशासन अनेक विविधता पूर्ण रत्नों से भरा हुआ है, और सभी रत्न गुण समृद्ध है। ऐसे कोई ना कोई रत्न हमें भी गुण समृद्ध करने के लिए हमारा इंतजार कर रहे हैं। इन रत्नों के प्रति हमें हृदय से अहोभाव विकसित करना है, ताकि हम भी गुणों के खजाने से समृद्ध बन सकें।

 

जिनशासन की साध्वी श्रृंखला में ऐसे सुख समृद्ध रत्न बहुत हैं।

 

आर्या ब्राह्मी-सुन्दरी से प्रारम्भ करते हुए आर्या चन्दनबाला तक, और वर्तमान परम्परा में भी ऐसे अनेक गुण समृद्ध श्रमणी भगवन्त हैं, जिनकी संयम साधना, आज्ञा आराधना, उत्कृष्ट उपासना, सर्वोत्कृष्ट शासन राग के सामने हम नतमस्तक हुए बिना नहीं रह सकते।

 

ऐसी बेजोड़ बेमिसाल श्रमणी परम्परा में एक अनमोल रत्न हुआ, जिसका नाम था साध्वी पद्मश्रीजी म.सा। वि. सं. 1268 में खम्भात में कोट्याधिपति श्रीमन्त श्रेष्ठि के घर एक दिव्य आत्मा का अवतरण हुआ। कन्यारत्न का जब जन्म हुआ तब उसके ललाट पर अप्रतिम भाग्य का तेज चमक रहा था। सोने के घुंघरुओं से खेलती, सुखपूर्वक बचपन को जीती यह कन्या अपने दादा के साथ समीप में रहे जिनालय तथा उपाश्रय में भी जाती रहती थी। एक बार आचार्य श्री धर्ममूर्ति म.सा. उस जिनालय में  आए,  तो दर्शनार्थ दादा और पोती भी पहुँच गए।

 

कन्या का भाग्य जो भविष्यवेत्ता भी पढ़ ना सके, उसे आचार्य ने तुरन्त जान लिया, और दादा से कहा, “इस कन्या को जिनशासन को सौंप दीजिए। यह कन्या प्रभावशाली है, ये स्व एवं पर का कल्याण करेगी।

 

पुण्यशाली परिवार ने भी अपने कलेजे के टुकड़े जैसी इस कन्या को बड़े उत्साह से, ठाट-बाट से दीक्षा दी। ८ वर्ष की पद्मा, अब पूज्य साध्वी श्री पद्मश्रीजी म.सा. बन गए।

 

आश्चर्य की बात तो अब शुरू होती है ।

 

दीक्षा के बाद तो बाल साध्वी सब को बहुत प्रिय-मीठे लगते थे। गुरुणी के पास बैठी हुई बाल साध्वी का आकर्षण अभूतपूर्व था। वन्दन के लिए आई हुई सारी श्राविकाओं-कन्याओं की नजरें उनके मुख से हटती नहीं थी। वे सबके दिल में बस गई थी। सब उस बाल साध्वी से दीक्षा लेने का मन बनाती थी।

 

विश्वास नहीं होगा, पर वास्तव में केवल तीन साल के दीक्षा पर्याय में ही बाल साध्वी 700 शिष्याओं की गुरुणी बने। अल्पायु में ही प्रवर्तनी पद को विभूषित किया और केवल तीन-चार साल में परम पूज्य साध्वीश्री पद्मश्रीजी महाराज साहेब को सूरि भगवन्त ने “ महत्तरा” की पदवी से विभूषित किया ।

 

उत्कृष्ट संयम आराधना, दृढ चारित्र और अगाध ज्ञान से परिपूर्ण आर्या सबकी आदर्श थी।

 

संयम, आज्ञापालन तथा तप साधना में उत्तरोत्तर प्रगति पथ पर विचरने वाली इन श्रमणी भगवन्त ने केवल २८ वर्ष की अल्पायु में ही संचित पुण्य को भोगने के लिए तथा अधिक उत्कृष्ट साधना करने के लिए सद्गति की ओर प्रयाण किया।

 

उस काल में पूज्य सूरि भगवन्तो की गुरुमूर्ति भी कभी-कभी बनती थी, ऐसे समय में वि. सं. 1298 में महत्तरा साध्वी जी की प्रतिमा का निर्माण हुआ। यह प्रतिमा काल कि करवटें बदलने पर भी आज मातर तीर्थ में श्री सुमतिनाथ प्रभु के जिनालय में विद्यमान है ।

 

अनोखी संयम मूर्ति, तप मूर्ति श्रमणी भगवन्त के चरणों में कोटि-कोटि वन्दन !!

 

जय हो… ! जय हो… ! महत्तरा साध्वी श्री पद्मश्री म.सा. की जय हो… !!

 

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प्रभु के प्रति अपरम्पार भक्तिभाव, गुरु भगवन्तों के प्रति उछलता अहोभाव, जिनशासन के प्रति असीम बहुमान भाव से जिनका हृदय भरा है, और जिनशासन के विराट प्रसंगों में जिनके सफल संचालन से भाविकों का हृदय नम होता है, ऐसे सुश्रावक की प्रथम लेखमाला का शुभारम्भ भी इसी “faithbook” से हो रहा है।श्रमणी भगवन्तों के प्रति अहोभाव जगाने वाली यह लेखमाला सबके हृदय में सद्भाव की अभिवृद्धि करेगी …

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