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देहनिर्माण में दृष्टा भाव

 

त्रिशलाराणी के गर्भ में जो भी घटित हो रहा था

उसे अघटित होकर देख रहे थे प्रभु….।

विश्व के सर्वश्रेष्ठ परमाणुओ के गठन से शरीर का

संपादन होने जा रहा है ।

यही वो शरीर होगा जिसे मेरूपर्वत पर कोटि कलशो से

अभिषिक्त किया जाएगा,

यही वो देह होगा जिसे लेकर साधना का आयाम

रचा जाएगा,

यही वो काया होगी जो गणधरो के मस्तक पर वासक्षेप

कर के तीर्थ की स्थापना करेगी और असंख्य जीवों पर

उपदेशामृत की पावन धारा की बौछार करेगी ।

भविष्य के सभी पर्यायो को देखते हुए भी

निर्माणाधीन शरीर की रचना के प्रति प्रभु निर्ममत्त्व है ।

 

कुक्षि में बच्चा आते ही माँ पेट पर हाथ रखकर

ममता बताती है, पिता भी जन्म लेने से पहेले बच्चे को

लेकर ‘मेरापन’ महेसूस करता है ।

और साधारणतया कुक्षि में विकसित होनेवाला आम जीव भी

शरीर योग्य पुद्गलो को जूटाने के संघर्ष में

शरीरमय ही हो जाता है ।

पर, यह कोइ सामान्य जीवात्मा नहीं है यह तो महात्मा से भी

उपर परमात्मा है ।

अवधिज्ञान से दिख रहा है प्रभु को,

कि अंतिमबार अपने आत्मप्रदेशो के संयोग से-

कर्म के माध्यम से मानवपिंड का सुरम्य-सर्जन हो रहा है ।

आखरीबार यह देह का ढांचा बनाया जा रहा है ।

पर प्रभु की चेतना सिर्फ उसे दृश्यरूप से हि निहारती रही,

कभी भी उस सृजन प्रक्रिया में ‘मेरापन’ उठा नही प्रभु को…!

उसे खुशीओ से सहेलाया नही प्रभुने…!

क्योंकी वो प्रभु अब दुजे के नही बन सकते है,

खुद को पा लिए है ।

दूसरा अब खुद नहीं बनेगा दूसरा बनेगा तो सिर्फ दृश्य हि बनेगा…

दृश्य मतलब दूसरा…

 

‘दूसरा है’ यह जानते हुए भी जब कर्माधीन होकर

संयोग के रूप में शरीर को अपनाना पडता है तब

ज्ञानी को अधिकार भाव नहीं आता है पर औचित्यभाव

प्रकट होता है ।

जन्म लेना प्रभु के लिए अधिकार नहीं, औचित्य था ।

जो अधिकार से जन्म लेते है वे मरते है,

जो मरते हि नहीं वे औचित्य से अवतरते है ।

प्रभु का जन्म ‘अवतरण’ होता है, अधिकरण नहीं ।

A4 P2 mediumजब हम अपने घर में होते है तब अधिकार से और

पराये घर में जाते है तो औचित्य से रहते है ।

संकोच से बरतते है… ठीक उसी तरह

प्रभु का अपना घर तो आत्मस्वभाव हि है ।

शुद्ध-अपनापन हि प्रभु का निवासन है ।

अब यह शरीर भी पराया घर है ।

माता त्रिशलाराणी की कोख भी पराया घर है ।

वहां अधिकार नहीं औचित्य प्रकट करते है प्रभु…

सिकुड जाते है (अलीणपलीणगुत्ते)

ताकी त्रिशलाराणी को तकलीफ न हो

 

अपने आप में लीन होकर सिकुडना तो प्रभु गर्भ से हि जानते थे,

सिकुडना संयम की अभिव्यक्ति है ।

जो ओरो से सिकुडता है वो अपने में विकसित होता है ।

प्रभु का जागृतिपूर्वक स्थिर होना वो भी गर्भ में….! ।

यह उत्कृष्ठ औचित्य ओर योगकौशल्य का परिचायक है ।

 

हम मरते दम तक स्थिर नहीं हो पा रहे है,

सिकुड़ना परेशानी लगती है, अधिकार जमाने की बदमाशी जाती नहीं है ।

कहाँ प्रभु, कहाँ हम ?

प्रभु की जीवन-यात्रा औचित्य और संयम के मंगलाचरण से शरू हुई ।

 

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बाल्यकाल में दीक्षा लेने के पश्चात् ज्ञान-ध्यान की अलख जगाई और वर्तमान में युवावस्था होने पर भी जिनका हृदय अध्यात्म से सराबोर है, ऐसे पू. पंन्यास भगवन्त प्रभु वीर की साधना को मात्र उपसर्ग या परिषह सहन करने की सहिष्णुता में ही नहीं देखते, बल्कि इस साधनाकाल के भीतर गहराई में जाकर हमें भी साधना का स्पर्श करवाएँगे। यह लेखमाला अध्यात्म रसिकों के लिए अमृत भोजन की भूमिका निभाएगी, ऐसी आशा है।

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