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नमस्कार आणगार को…

नमस्ते मित्रों !

 

Faithbook के जरीए हम अरिहंत बनने की यात्रा में अग्रसर हो रहे हैं । दुनिया भर की और सभी पदवीयाँ, संपत्ति से, मेहनत से, बुद्धि से अर्जित की जाती है । परंतु यह ‘अरिहंत’ पदवी यूं देखे तो बड़ी सरलता से और यूं देखे तो बड़ी ही मेहनत से पाई जा सकती है । वहां बाहरी विश्व में तनिक भी मेहनत न की जाए, तो भी चल जाए, किंतु भीतरी विश्व में कठिन से कठिन मेहनत करनी जरूरी है । वह मेहनत हैं मन में शुभ भावनाओं को भरने की, और अशुभ भावनाओं को हरा देने की । और वाकई में यहीं मेहनत सबसे बड़ी challengeable है । क्योंकि हमारा मन सही कम, गलत ज्यादा ही सोचता रहता है, और फिर हमारा मन हमारे बस में भी कहां है ? हम सोचना चाहते हैं कुछ, पर मन कुछ अलग ही बात सोच लेता है । इसीलिए तो मित्रों ! ‘अरिहंत’ बनना बड़ा मुश्किल है । एनाकोंडा जैसे कातिलों को बस में लेना फिर भी आसान है, मन को बस में लेना उससे भी कई गुना ज्यादा मुश्किल है । पर जिस महान व्यक्ति ने एक बार अपने मन को वश में कर लिया, अपनी मुट्ठी में बंद कर लिया, फिर उसके लिए ‘अरिहंत’ बनना तनिक भी मुश्किल नहीं है ।

 

….तो आज हम ऐसे महान व्यक्तियों के बारे में जानेंगे, जिन्होंने अपने मन को वश में ले रखा है । इसीलिए हम उनकी पूजा करते हैं, भक्ति करते हैं, उन्हें गोचरी का लाभ ले कर अपने आप को धन्य महसूस करते हैं ।

 

हां, वह है हमारे पूजनीय साधु भगवंत । मन उनकी मुट्ठी में है, इसीलिए जिस कठोर चर्या, एकाकी जीवन, न मोबाइल, न इंटरनेट, न फेसबुक, न चैट, न घूमना फिरना, न खाना-पीना… यह सब चीजें जो हमारे लिए प्रसन्न होने के लिए, फ्रेश होने के लिए अहमियत रखते हैं, वो सब बातों से जोजनों दूर होने पर भी आश्चर्य की बात है कि, उनके चेहरे पर हम संसारीयों के चेहरे से भी ज्यादा प्रसन्नता झिलमिलाती है । क्योंकि हम मन के दास है, और वह मन के मालिक ।

 

साधु जीवन क्यां ?

 

1) जहाँ पर वस्तुओ का अभाव हो, औऱ

2) जहाँ पर मस्त स्वभाव हो ।

 

इन साधु भगवंतों की सेवा से, उपासना से, उनके प्रति आंतरिक बहुमान और श्रद्धा का भाव रखने से हम अरिहंत बन सकते है । उन्होंने मन मकड़े को वश में लिया है, औऱ उनकी भक्ति हमारे मर्कट मन को वश में लेने में सहायक है ।

 

साधु भगवंत आखिर करते क्यां है ? साधु भगवंत स्वाध्याय करते है, साधना करते है, सहाय करते है, सेवा करते है, साधुता का पालन करते है ।

 

जिनशासन के साधु भगवंत एक ऐसी शख्सियत है, जो आपको पूरे विश्व मे औऱ कहीं भी देखने को न मिलेगी, साधु भगवंत बोलकर नहीं, परंतु मौन रहकर, औऱ इशारों के द्वारा नसीयत देते हैं ।

 

शालीभद्र शेठ ने इतनी ऋद्धि पाई, साधु भगवंत को दान देने से,  धन्नाजी ने इतना धन पाया, साधु भगवंत को दान देने से, कयवन्ना शेठ ने इतना सौभाग्य पाया, साधु भगवंत को दान देने से, आदीश्वर भगवान और महावीरस्वामी भगवान ने सम्यक्त्व की प्राप्ति की साधु भगवंत को दान देने से, और रेवती श्राविका ने अरिहंत की पदवी पाई, साधु भगवंत को दान देने से ।

 

मकड़ी अपने आस – पास जाल बनाती है, पर उसमें फंसती नहीं, रेशम का कीड़ा अपने आस पास जाल बनाता है और उसमें फंसता भी है। हम संसारी और साधु में इतना ही फर्क है कि, हम संसार में रहते है, और सांसारिक मायाजाल में फंस जाते है, जब कि साधु भगवंत संसार में है- मोक्ष में तो नहीं पहुंचे अभी, परन्तु वे सांसारिक मायाजाल से परे है ।

 

चलो, हम सब भी उस साधु पद का गीत गुनगुनाएं ।

 

।। साधु पद ।।

 

(तर्ज: अखियों के झरोखे से…)

साधना आपकी है कडी,

जो तोड़े कर्मो की लड़ी,

ओ साधु भगवंतो ! मेरे वंदन लाखो हो…

उत्तम उन्नत और उच्च है, साधु भगवंतो का जीवन ;

संसार के बीहड़ वन में, हँसता खिलता गुलशन ;

इस साधुता को आपकी, शिवसुख मुनासिब हो… ओ साधु…

नहीं देखा सिद्धों के सुख को, पर लगता ऐसा हैं ;

जो आप के मुख पर दिखा, मोक्ष में भी बस वैसा है ;

दुःख चिंता के सागर में डूबे, हमें आप सहारा हो… ओ साधु…

आप मौन हंमेशा रहते हो, नहीं देते हो उपदेश ;

पर आपकी तपस्या से, मिलता मुक्ति का संदेश ;

पामर को परमात्मा बना देते, आप ऐसे अजूबा हो… ओ साधु…

About the Author /

authors@faithbook.in

शास्त्रबोध, संवेदनशीलता और शीघ्र-कवित्व का व्यक्तित्व धारण करने वाले मुनिवर ने, भगवान बनने का राजमार्ग, अर्थात् वीसस्थानक पर नूतन काव्यों की रचना की और साथ उनकी ऐसी विवेचना की जो युवा हृदय को छू सके।

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