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पाळे पळावे पंचाचार

 

हेलो फ्रेंड्स !

 

अरिहंत बनाने के लिए 20 कदमों की बातें हम कर रहे है ।आपको शायद पता ही होगा कि अरिहंत किसे कहते है । नहीं तो हो मैं बता दूं जिन्होंने अपने सभी शत्रुओं को परास्त कर दिया हो उन्हें अरिहंत कहते हैं ।

 

शत्रु बाहर के हो तो हमें इतने परेशान नहीं करते हैं जितने भीतरी शत्रुओं करते है । इन भीतरी शत्रुओं के साथ संग्राम खेल उन्हें हरा दे, उसे ही अरिहंत कहा गया है ।

 

सोचो, कभी हमारी स्थिति ऐसी हो जाए जबकि हमारे मन में किसी भी वस्तु या व्यक्ति के प्रति न लगाव हो.. न द्वेष हो, न कभी हमारे मन में ईर्ष्या आए…न क्रोध पैदा हो, न आसक्ति हो… न मोह, न माया हो…. न मूर्छा, और बचा हो सिर्फ आनंद, अपार असीम अनराधार आनंद ! तब हमारे भीतर जो सुख और दुख के बीच की अवस्था होती है वही जीवन का सच्चा और परम सत्य है ।उसी को पाना, उसी को खोजना हमारा परम कर्तव्य बनता है ।

 

अरिहंत बनाने हेतु इस पड़ाव में से चौथा पड़ाव है – आचार्य पद । आचार्य कि अगर बहुत संक्षिप्त व्याख्या बताएं तो वह होगी “पाळे पळावे पंचाचार” यानी कि आचार्य भगवंत पंचाचार पालन में लगे रहते हैं और अन्यों को भी जोड़ते है ।

 

हमारे जीवन के परिप्रेक्ष्य से अगर देखा जाए, तो जीवन में जो कोई व्यक्ति ऐसी होती, है जिसे हमारे जीवन में बुजुर्ग हो या बड़े का दर्जा मिला हो, जो हमारे मां-बाप भी हो सकते हैं या हमारे गुरु भी। जो हंमेशा हमें रोकते है, टोकते रहते है, ऐसी व्यक्ति हमारे जीवन में आचार्य के स्थान में है।

 

परंतु बात यह करनी है कि आज हमें हमारे जीवन में क्या ऐसे किसी भी व्यक्ति का स्थान होना पसंद है । वह जब हमें कोई भी सलाह-मार्गदर्शन देते है तो हमें क्या अच्छा लगता है या अखरता है ? क्या हमें सुनना पसंद आता है ?

 

एक छोटी सी कथा :

 

दो युवक रास्ते से गुजर रहे थे, यकायक जोरों से बारिश शुरू हो गई, दोनों ही एक ही छप्पर के नीचे खड़े खड़े हुए । छपरा स्टील का था, बारिश जोरों से हो रही थी, और छपरा बड़ा ही कानों में सुई की तरह भौंकने वाला आवाज रहा था । उन दोनों युवकों में से एक युवक बोखला गया और कानों पर हाथ दबा कर चिल्लाया –

 

“अरे! यह छपरा कितना आवाज़ कर रहा है”

 

दूसरा युवक मुस्कुराया और बोला –

 

“हां, बात तो सही है, आवाज़ तो हो रही है । परंतु क्या तुम्हें पता है ? यह छपरा ही तो हमें बारिश की परेशानियों से भी तो बचा रहा है।”

 

कहानी यहां पर खत्म हो जाती है । आप तो समझ ही गए होगे फिर भी हम बता दें कि वह आवाज करने वाला छपरा आपके पैरेंट्स ही है और इतना ध्यान रहे बारिश जोरों से होती है तभी छपरा आवाज भी ज्यादा करता है।

 

आपके जीवन में जब मुश्किलों की संभावनाएं बढ़ जाती है तभी…

 

चलो, इस आचार्यपद गीत गुनगुनाए…….

 

( तर्ज: छेलाजी र म्हारे हाटु पाटणथी )

 

हो आचारजजी! हमें तुम्हारे चरणों में विराजना

अंग-अंग आचारप्रेम जगाना…

 

यह वैभव है भारी विषम, यहां कर्मचोर की हार;

लूटे जो गुणदन को, कर देते हाल हवाल;

हाथ फैलाओ आप, मुझे बचा लो अब,

करो दो मेरा उद्धार..…तुम्हारे..

 

हम तो अज्ञानी है, बालक तुम माता हो;

संकट आफत अवगुण से पालन हारा हो;

पार करा लो बस इस भ्रमणा से और,

मुझे बना लो तुम सा…… तुम्हारे….

 

 

About the Author /

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शास्त्रबोध, संवेदनशीलता और शीघ्र-कवित्व का व्यक्तित्व धारण करने वाले मुनिवर ने, भगवान बनने का राजमार्ग, अर्थात् वीसस्थानक पर नूतन काव्यों की रचना की और साथ उनकी ऐसी विवेचना की जो युवा हृदय को छू सके।

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