महाभारत और महाभिनिष्क्रमण के महावीर पितामह भीष्म

महाभारत और महाभिनिष्क्रमण के महावीर पितामह भीष्म

‘महा’ अर्थात् विशाल और ‘भारत’ अर्थात् भरत के वंशज । इन्हीं भरतवंशीओं के पराक्रम एवं यशो गाथाओं के कारण यह हिन्दवी साम्राज्य भारत के नाम से विख्यात हुआ  । महाभारत अर्थात्  महान, श्रेष्ठतम, सर्वोत्तम भारत या भरत के महान वंशजों का इतिहास, उनकी परम्परा की गाथा । कुरुओं का प्राचीन एवं महान कुरुक्षेत्र इस महाकाव्य के सृजन का आधार है । कौरव और पाण्डवों के मध्य हुए घमासान महायुद्ध के विषय पर इस कथा की रचना की गई है । यह महाकाव्य या महाकथा भारत की सर्वाधिक एवं अत्यन्त लोकप्रिय गाथा है । इस काव्य का केन्द्रस्थान है कुरु साम्राज्य पर मूलभूत अधिकार स्थापित करना और उस अधिकार को सिद्ध कर कुरु साम्राज्य प्राप्त करने के लिए कुरुओं के दो मुख्य वंशज कौरव और पांडव इन पितराई बन्धुओं के बीच में हुआ घनघोर युद्ध का प्रसंग । इस भव्यकथा का प्रारम्भ शान्तनु-गंगा के पुत्र गांगेय, अर्थात् भीष्म (पितामह भीष्म) से होता है । तो आइए, उनके शब्दों में ही इस महागाथा का श्रवण करते हैं ;

 

भीष्म…! मैं भीष्म

 

इस संसार से विचित्रवीर्य का परलोकगमन होते ही उनके तीनों पुत्र धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर का उत्तरदायित्व मैंने अपने कन्धों पर लिया ।

 

सन्तानों का संस्करण या तो गर्भावस्था के नौ महिनों में ही हो जाना चाहिए  नहीं तो जन्म पश्चात् के आठ वर्ष शिशुओं के संस्कार हेतु अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होते हैं । कच्चे और गीले घड़ों को जिस प्रकार नक्षिकृत करके उन्हें मनचाहा आकार देकर उनका संस्करण कर सकते हैं उसी प्रकार नवजात शिशुओं का संस्कार किया जा सकता है ।

 

धृतराष्ट्र आदि तीनों भाई परस्पर में अत्यन्त प्रेमभाव से अपना जीवन व्यतित करते हैं । सत्यवती, अम्बिका इति आदि भी इससे अत्यन्त प्रसन्न हैं । किन्तु भविष्य अपने गोद में कौन-कौनसे रहस्य समेटकर बैठा है, क्या कोई इसका अनुमान लगा सकता है ? इस राज्य के उत्तराधिकारी सभी कुमार अल्पवयीन थे, किन्तु फिर भी उन्हें अपने दायित्त्व से अभिज्ञ कराना आवश्यक था । इसलिए मैंने अपने सबसे ज्येष्ठ भतीजे धृतराष्ट्र से पूछा, “पुत्र ! इस हस्तिनापुर के सिंहासन का क्या करेंगे ? तुम्हारे विचार इसके लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है ” धृतराष्ट्र ने कहा, “पितामह ! आपके होते हुए मुझे विचार करने की क्या आवश्यकता है ? आप कुरुश्रेष्ठ हैं, आप अधिक जानते हैं, मैं तो ठहरा अन्धा ! भला मैं इस राज्य का क्या करूँगा ? क्या मेरा प्रिय पाण्डु इसके योग्य नहीं हैं ? मेरे हृदय में उसके लिए अत्यन्त स्नेह है, आदर एवं सन्मान है । मेरा अनुज उसके विनय, शौर्य और शालिनता इत्यादि गुणों से हस्तिनापुर के प्रजाननों के हृदय पर वास करता है, अतः इस सिंहासन के उत्तराधिकारी के रूप में उससे अधिक योग्य कौन हो सकता है ?”

 

यह सुनकर मैं आश्वस्त हुआ और हस्तिनापुर के सिंहासन के उत्तराधिकारी के रूप में पांडु का राज्याभिषेक किया । राज्य प्राप्ति के पश्चात् भी पाण्डुने मेरा तथा धृतराष्ट्र का विनय-आदर करने में अंशमात्र भी कमी नहीं की । परस्पर में स्नेह, आदर, मान-सन्मान के साथ तीनों भाई आनन्द एवं प्रसन्नता के साथ अपना जीवन प्रेम से व्यतित कर रहे थे ।

 

यौवन के द्वार पर खड़े हुए धृतराष्ट्र का विवाह गान्धारनरेश की गान्धारी आदि आठ पुत्रियों से साथ सम्पन्न हुआ, जिनका शकुनि नामक एक अत्यन्त धूर्त, चालाक और महत्त्वाकांक्षी भाई था मानो मनुष्य के वेश में चतुर लोमड़ी । साथ ही विदुर का विवाह देवकराज की पुत्री कुमुदवती के साथ और पाण्डु का कुन्ती के साथ अत्यन्त हर्षोल्लास में सम्पन्न हुआ । आओ ! अब तुम्हें राजकुमारी कुन्ती से परिचित कराता हूँ !

 

कालिन्दी नदी के किनारे सातवेँ तीर्थंकर श्री सुपार्श्वनाथ भगवान की जहाँ अत्यधिक महिमा है, ऐसी मथुरा नगरी में यथाक्रम से यदु राजा हुए । उन्हीं के प्रताप और कीर्ति से यदुवंश विख्यात हुआ । राजा यदु का शूर नामक पुत्र अपने पिता से सवाई शूरवीर निकला । शूर के भी शौरी और सुवीर नाम के दो प्रतापी पुत्र हुए । शौरी ने अपने पराक्रम से शौर्यपुर नगर की स्थापना की और कालानुवश अपने सिंहासन को अपने पुत्र अन्धकवृष्णि को सौंपकर स्वयं दीक्षा ग्रहण करके मोक्षगमन किया ।

 

अन्धकवृष्णि के दस पुत्र हुए जो दशार्ण के नाम से विख्यात हुए । इन भाईयों में से ज्येष्ठ समुद्रविजय (जो बाइसवेँ तीर्थंकर श्रीनेमिनाथ भगवान के पिता था) तथा वसुदेव नौंवेँ (जो वासुदेव श्रीकृष्ण के पिता) थे ।

 

अन्धकवृष्णि की महारानी सुभद्रा ने इन दस पुत्रों के उपरान्त एक कन्यारत्न को भी जन्म दिया । जिसका जन्मोत्सव पुत्र-महोत्सव से अत्याधिक भव्य हुआ । उस कन्या के जन्मनक्षत्रों का अभ्यास करते हुए ज्योतिर्विदों ने कहा, कि “यह तेजस्वी कन्या आने वाले समय में भारतवर्ष की एक महान माता बनेगी और इसके पुत्र महान साम्राज्य के स्वामी बनेंगे ।” यह भविष्य कथन सुनकर माता-पिताने अपने प्रिय पुत्री का नाम कुन्ती रखा ।  किन्तु बाल्यावस्था से ही कुन्ती के उदार हृदय को देखकर एवं उसकी परिपक्व तथा सौहार्दपूर्ण बातों को सुनकर घर में सभी उसे पृथा (विस्तृत) कहने लगे । कुन्ती का विवाह महाराज पाण्डु के साथ एक ऐतिहासिक घटनाक्रम के साक्षी में हुआ, जिसे कुन्ती स्वयं अपने पात्रावलेखन में बताएगी ।

 

मैं भीष्म हूँ…! अब मेरी आँखों के समक्ष मेरी तीसरी पीढ़ी का हलन-चलन स्पष्ट रूप से दिखने लगा था । किन्तु मेरा एक ही कार्य था, जैसे कोई चंदनागर के भाँति स्वयं जलकर दूसरों को सुरभि देना, ठीक वैसे ही मुझे स्वयं जलकर दूसरे का जीवन सुगन्धित करना था ।

 

पाण्डु के पाँच पुत्र पाण्डव कहलाए और धृतराष्ट्र से जन्मे हुए 100 पुत्र कौरव कहलाए । कृपाचार्य और द्रोणाचार्य से शिक्षा ग्रहण करते हुए इन 105 राजकुमारों का पारस्परिक प्रेम मात्र मुझे ही नहीं अपितु समस्त राज-परिवार की आँखों और आत्मा को शान्ति प्रदान कर रहा था । किन्तु यदि सभी का सांसारिक जीवन हर समय सुख के साथ ही व्यतित हो, तो फिर वह संसार ही कैसा !! बचपन में जो बालक एक ही सेब को एक-एक कर के चारों ओर से परस्पर स्नेह से खाते हैं, वे ही बालक बड़े होने के बाद सब अपने-अपने सेब खाते हुए भी एक-दूसरे को घूरते रहते हैं ।

 

मैं भीष्म हूँ…! महाभारत के सबसे ऊँचे एवं विशालकाय पर्वत के समान हूँ । एक ऐसा पर्वत जिसकी पैरों तले कौरवों और पाण्डवों के स्नेह सम्बन्ध से परिपूर्ण लहरें और ज्वार सतत उछल रही हैं, फिर भी मैं निश्चलता से अटल खड़ा हूँ । कुरुवंश के मंगल और कल्याण की एक मात्र इच्छा को धारण करते हुए भी अमंगल, अशुभ, अयश और अनाचारों के थप्पड़ यहाँ लगते ही रहते हैं ।

 

यह तो जीवन है । इसे वन, उपवन, मधुवन, तपोवन आदि जितनी उपमाएँ दें, उतनी कम ही हैं ।

 

द्रौपदी के वस्त्रहरण के समय मेरे मौन के कारण द्रौपदी सहित अनेक लोगों को व्यथित किया था । वह मेरी भूल थी या नहीं, इस बात का निर्णय मैं अपने जीवन के अन्त तक नहीं कर पाया । कभी-कभी तो मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि मैं उस समय ‘पितामह’ के रूप में अपना दायित्त्व को नहीं निभा सका । द्रौपदी पर जो अन्याय होने दिया, वह यथार्थ में मुझ पर हुआ एक अन्याय है ।

 

मेरे जीवन में कदाचित् ऐसा एक और अन्याय हुआ है और वह है दुर्योधन (कौरवों) के पक्ष में रहना । दुष्ट कौरवों के पक्ष में रहकर वास्तव में उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहन देने जैसा ही था । जब दुर्योधन ने पाँच पाण्डवों को पाँच गाँव जितनी तृणभर भूमि देने के श्रीकृष्ण के प्रस्ताव को स्पष्ट रूप से अस्वीकार किया, उसी समय श्रीकृष्ण ने मुझसे कहा था कि, “कुरुश्रेष्ठ होने के नाते आप अपने अधिकारों का उपयोग करके अधर्मी दुर्योधन को रोक सकते थे, किन्तु आपने वैसा नहीं किया ।” उस समय मैं भी व्यथित होकर दुर्योधन पर क्रोधित होते हुए श्रीकृष्ण से कहा कि, “इन पापियों का अन्त अब निकट है, अन्यथा वे ऐसी नीच हरकत नहीं करते । मुझे तो यह प्रतीत हो रहा है, कि इन पापी पुत्रों के कारण कुरुवंश का समूल संहार होगा । किन्तु अब क्रोध करके कुछ लाभ होगा, ऐसा मुझे नहीं लगता । जब समय बलवान हो वहाँ मनुष्य क्या कर सकता है ? नियति को अपना कार्य करने दो । इसलिए हे कृष्ण ! मैं आपसे एक विनती करता हूँ कि आप क्रोध न करें और कौरव-पाण्डवों के युद्ध में कृपा करके आप हस्तक्षेप न करें । वे भले ही आपस में लड़ते हुए मृत्यु का वरण करें, किन्तु आप क्रोध के आवेश में आकर अपकीर्ति का भोग न बनें !”

 

यद्यपि श्रीकृष्ण ने मेरी बात अंशतः स्वीकार की, किन्तु ऊपरोपरी मैंने इस बात को कहते हुए दुर्योधन के पक्ष का समर्थन किया था, कदाचित् वह मेरे लिए सही नहीं था । जो परामर्श मैंने दिया था, उस सलाह का मुझे स्वयं पालन करना चाहिए था । मुझे भी किसी का पक्ष न लेते हुए अन्त तक निष्पक्ष रहना चाहिए था । यद्यपि भले मेरा तन कौरवों के पक्ष में था किन्तु मेरा मन तो पाण्डवों के पक्ष में ही था । इसलिए युद्ध के पहले दिन जब युद्धभूमि पर युधिष्ठिर ने मुझे सविनय प्रणाम किया और आशीष माँगा, तो मैंने गद्गद् होकर उससे कहा, “हे वत्स ! तुम्हारे प्रति मेरा वात्सल्य आज भी उतना ही स्नेहपूर्ण और गहरा है, परन्तु तुम्हारे वनवास आदि के अनुपस्थिति में दुर्योधन ने हमारी श्रद्धा-भक्ति के साथ सेवा करके हम सबको विवश कर दिया है, ऐसा लगता है । हम हमारे सत्य से अलिप्त हो गए हैं, सत्य और न्याय जैसे दो धर्माचारी योद्धा तुम्हारे पक्ष में हैं, इसलिए तुम्हारी पराजय नहीं होगी और अवश्य ही विजय होगी ।”

 

कुरुक्षेत्र में 18 दिन चले युद्ध में 7 दिन तक मैंने सेनापति के रूप में पाण्डवों की सेना को नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन आठवेँ दिन पाण्डवों ने कौरवों का महासंहार किया । इसलिए उस रात दुर्योधन ने मेरे छावणी में आकर मुझे बहुत ताने मारे । उसने कहा, “पितामह ! इतने दिनों तक युद्ध में अपने पाण्डवों के अनेक योद्धाओं को मारा है, किन्तु पाँचों पाण्डवों मे से किसी एक पाण्डव को भी भूल से आपके बाणों से क्षति न पहुँचे, इसका पूर्ण रूप से ध्यान भी रखा है । पितामह ! हमारे पक्ष में रहकर आप काम उनके पक्ष का कर रहे हैं, इसे मैं क्या समझूँ ? यदि हस्तिनापुर का राज्य पाण्डवों को ही सौंपने की आपकी इच्छा है, तो हे तात ! आप अभी ही हम सब कौरवों का संहार कर दीजिए ।”

 

दुर्योधन के इन कटु आक्षेपों से मैं अत्यन्त व्यथित हो गया । मेरे हृदय में पाण्डवों के प्रति बहते वात्सल्य को कुचलते हुए मैंने नौंवेँ दिन पाण्डवों की सेना में हाहाकार मचा दिया । पाण्डव मेरा यह रूप देखकर त्राहिमाम् पुकार रहे थे । मेरे इस असाधारण पराक्रम और ताण्डव को देखकर उस रात पाण्डव श्रीकृष्ण के छावणी में जाकर उनसे इसका उपाय पूछते हुए कहते हैं, “पितामह को मारने की हमारी स्वाभाविक इच्छा नहीं है, किन्तु हम अत्यन्त लाचार और सामर्थ्यहीन हैं, इसलिए कोई ऐसा उपाय बताइए कि पितामह घायल तो हो परन्तु उनका दुःखद अन्त हमारे हाथों से न हो !”

 

श्रीकृष्ण ने कहा, कि “पितामह निःशस्त्र, स्त्री, नपुंसक, गरीब और भयभीत व्यक्ति के ऊपर शस्त्र नहीं ऊठाते, यह उनका प्रण है ।” इसलिए दूसरे ही दिन पाण्डवों ने राजा द्रुपद के नपुंसक पुत्र शिखण्डी को अर्जुन के रथ के ठीक आगे खड़ा कर दिया और पीछे से अर्जुन ने मेरे ऊपर बाणों की वर्षा शुरु की । मैंने अपनी प्रतिज्ञानुसार अपने शस्त्र नहीं उठाए । मैं अपना प्रारब्ध के देख लिया था । अर्जुन की इस तीरंदाजी पर मुझे गर्व हुआ । उसके तीर मेघ की असंख्य धाराओं की भाँति मेरे ऊपर बरस रहे थे, अब मेरा युद्धभूमि पर अधिक देर तक टिकना सम्भव नहीं था । मैं घायल होकर रथ से नीचे गिर गया । उसी समय सूर्यास्त हो रहा था । और मेरा जीवन का अस्त भी अपने कगार पर खड़ा था । मुझे उठाकर पड़ाव में लेकर गए, मेरे चारों ओर सभी कौरव और पाण्डव आकर खड़े हो गए ।

 

मेरी ऐन युवावस्था में जब प.पू. मुनिचन्द्रसूरिम.सा. ने मानव जीवन को सम्पूर्ण रूप से सफल बनाने वाली भागवती प्रव्रज्या का उपदेश किया था, तब उन्होंने मुझसे कहा था, कि “जब कुरुक्षेत्र के युद्ध में तुम अर्जुन के असंख्य बाणों से आलंकृत हो जाओगे, तब युद्ध के दसवेँ दिन तुम मेरे शिष्य भद्रगुप्ताचार्य से अवश्य दीक्षा लोगे और एक वर्ष तक सत् चारित्र का पालन करने के पश्चात् बारहवेँ देवलोक जाओगे ।

 

बस, इस भविष्यवाणी के कथनानुसार मुझे पास के ही भद्रगुप्ताचार्य के उपाश्रय में पास ले जाया गया । मैंने कौरव और पाण्डवों को हितशिक्षा दी । विशेषतः दुर्योधन को युद्धविराम करके पाण्डवों के साथ प्रेम से सन्धि करने के लिए कहा । युधिष्ठिर ने बाणों के आघात से हुए घाव और बहते रुधिर को औषधियों से ठीक करने की बात कही । किन्तु मुझे अब मेरे आन्तरिक कर्मशल्यों के घाव भरने थे । मैंने दीक्षा ली और बारह माह तक संयम व्रत का पूर्ण निष्ठा से पालन करते हुए इस शरीर का त्याग कर मृत्यु के पश्चात् बारहवेँ देवलोक में गया ।

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जिनकी कलम से नित्य नए विषयों पर विचारों का उन्मेष सतत होता रहा है, आमन्त्रण पत्रिका से लेकर पुस्तकों तक जिनकी रंगीन कलम एक खास विशेषता रखती है, ऐसे पू. आचार्य भगवन्त महाभारत की कथा की रसपूर्ण थाली आपके लिए लाए हैं।इनकी कथा वर्णन की शैली अत्यन्त अद्भुत है, और यह कॉलम अत्यन्त लोकप्रिय बनेगा, ऐसा पूर्ण विश्वास है।

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