मूलाधार चक्र ध्यान

मूलाधार चक्र ध्यान

  1. ( ध्यान प्रक्रिया में क्रमांक 8 से आगे )

 

  1.  तत्पश्चात् आकाश से श्वेत वर्ण की एक बून्द आपकी ओर आ रही है, ऐसा विचार कीजिए। धीरे-धीरे उस बिन्दु का आकार बढ़ रहा है। समीप आने पर उसके दो भाग हो रहे हैं। और समीप आने पर आप एक बिन्दु में भगवान, और दूसरे में शासन देवी देख रहे हैं। और निकट आने पर आप वहाँ “सुविधिनाथ” भगवान और “सुतारा देवी” को देखते हैं। फिर उस रक्त कमल के पराग में “लँ” अक्षर के मध्य के दोनों स्थानों पर आप उनकी प्रतिष्ठा कर रहे हैं।

 

10. अब पुनः आकाश से आपको श्वेत पुंज आता हुआ दिख रहा है, जिसमें से चार वर्ण आते हुए दिख रहे हैं – “वँ” “शँ” “षँ” और “सँ”। इन चारों वर्ण को रक्त पद्म की चार पंखुड़ियों पर रखें। पंखुड़ियाँ स्थिर होने के बाद उनकी वहाँ प्रतिष्ठा करें। फिर उस कमल के दो तंतु उतार कर उनकी प्रतिष्ठा करें, एक का नाम “इल्तला” (प्रभु के दाहिनी ओर) और दूसरे का नाम “कालधर्मिनी” (प्रभु के बाईं ओर)।

 

11. फिर प्रभु का लाँछन ‘मकर’ जो अहिंसक है, प्रचण्ड प्रभावी और महा पुण्यशाली है, उसे आता हुआ देखें और उसे कमल में स्थापित “लँ” के नीचे (प्रभु के चरण में) विराजित करके प्रतिष्ठा करें।

 

12. फिर उस रक्त चतुर्दल कमल को शान्त चित्त से देखें, फिर उसे ब्रह्म रन्ध्र के पास ले जाएँ।

 

13. अब उस रक्त चतुर्दल पद्म को आते देखकर सबसे पहले “सुषुम्ना नाड़ी” खोलें, उस कमल को अन्दर ले जाकर पूरी नाड़ी में घुमाएँ। फिर उसे ब्रह्म रन्ध्र के पास लाकर “वज्र नाड़ी” खोलें, उस कमल को उसमें ले जाकर पूरी नाड़ी में घुमाएँ। फिर उसे पुनः ब्रह्म रन्ध्र के पास लाकर “चित्रिणी नाड़ी” खोलें, उस कमल को उस नाड़ी में ले जाकर पूरी नाड़ी में घुमाएँ। फिर उसे ब्रह्म रन्ध्र के पास लाकर “ब्रह्म नाड़ी” खोलें, उस कमल को उसमें ले जाकर पूरी नाड़ी में घुमाएँ। फिर उसे मूलाधार चक्र के पास लाकर वहाँ स्थिर करें, और फिर प्रतिष्ठित करें।

 

यह मूलाधार चक्र अत्यन्त प्रभावशाली है। यह मेरुरज्जू के नीचे के भाग पर स्थित चतुष्कोणीय रक्त वर्ण का चक्र है। यह वटवृक्ष से आच्छादित है। इस चक्र में पहुँचने और कमल स्थिर करने में “ण” इसकी चाबी रूपी मन्त्र है। डाकिनी देवी और सुतारा देवी से अधिष्ठित और मकर लाँछन युक्त श्री सुविधिनाथ भगवान इस चक्र के सम्राट हैं। हम प्रभु के लिए एक थाल भरकर जासवन्ती के फूल लेकर खड़े हैं, और प्रभु को चढ़ा रहे हैं। यह मूलाधार चक्र ऐसे महा प्रभावशाली प्रभु से परम पवित्र एवं पृथ्वी तत्त्व से प्रभावित है।

 

जैसे यह पृथ्वी समता, सहनशीलता, धीरज इत्यादि गुणों से भरी है, लेकिन जब उसकी यह समता, सहनशीलता और धैर्य जवाब दे जाए, तो भूकम्प आदि विनाश हो सकता है; ठीक उसी प्रकार इस चक्र को भी नियन्त्रण में रखना आवश्यक है। और यदि यह चक्र सम्यक् रूप से प्रभावी हो, तो विपुल लौकिक सामग्रियों का संयोग होने पर भी साधक उन्हें छोड़कर वैरागी बनता है। वाक्पटुता, श्रेष्ठ वक्ता, विनोदी, आनन्दित, आरोग्यवान एवं पुण्यानुबँधी पुण्य का स्वामी बनता है, जिससे उसे मोक्ष प्राप्ति में मदद मिलती है। उसे कल्याण मित्र मिलते हैं, सर्व लोकमान्य, लोकप्रिय, सबका विश्वासपात्र, किसी से सम्बन्ध खराब न करने वाला, बेजोड़ आत्मविश्वासी, स्फूर्तिशील, सन्तोषी, अपनी, परिवार की, संघ की, देश की और सर्व जीवों की रक्षा करने में सक्षम बनता है। स्वयं को या अन्य को मारने का विचार न करने वाला, स्वाधीन और स्वाभिमानी बनता है, स्वास्थ्य देता है,  किडनी, मेरुदण्ड, शारीरिक सूजन, पैर-कमर आदि के दर्द को नियन्त्रित करता है और साधक को स्फूर्तिशील बनाता है। ये सब गुण मूलाधार चक्र के कारण उसे प्राप्त होते हैं।

 

इस के अलावा इस चक्र के नियन्त्रण से यदि अनित्य लोक भावना का सतत अभ्यास किया जाए तो संसार की वृद्धि नहीं होती। और यदि मिथ्यात्व हो या अनियन्त्रित मूलाधार हो तो पापानुबँधी पाप रूपी सम्पत्ति, असन्तोषी, सुस्त, मानसिक निराश, शारीरिक बीमार, कुसंग, पराधीन, लोक में निन्दनीय, रागी, द्वेषी, रौद्रध्यानी बनता है, फलतः संसार बढ़ाता है। इसलिए इस चक्र को नियन्त्रित रखना आवश्यक है।

 

फिर इस चक्र को निहारते हुए इस चक्र के मूल मन्त्र “ॐ नमः सिद्धम्” का जाप करते हुए चेतना को सभी नाड़ियों से बाहर निकालें। फिर ब्रह्म नाड़ी, चित्रिणी नाड़ी, वज्र नाड़ी और सुषुम्ना नाड़ी को बन्द करते हुए अशोक वृक्ष के नीचे आकर शान्त चित्त होकर सरोवर का अवलोकन करें। फिर “ॐ शान्ति” तीन बार बोलकर दोनों हाथ मसलकर आँखों पर लगाएँ और पूरे शरीर पर हाथ फेरते हुए धीरे-धीरे ऑंखें खोलें।

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तपस्या में रहने वाले पूज्य मुनिश्री ने ध्यान की प्रक्रिया पर लेख लिखकर ध्यान प्रेमियों को मिष्ठान थाल दिया है।पूज्य आचार्य श्री यशोविजय सूरीश्वरजी म.सा.‌ ( पूज्य श्री आचार्य भुवनभानु सूरिजी म.सा. ) ने यह ध्यान विषयक लेख का संशोधन करके महान उपकार किया है।जिनशासन मान्य ध्यान योग से आत्मा शीघ्र समाधि - सिद्धपद प्राप्त करेंगी ऐसा आत्मा विश्वास है।

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