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मूलाधार चक्र ध्यान

  1. सबसे पहले शान्त चित्त होकर पद्मासन या सुखासन में बैठें।
  2. फिर तीन मिनिट तक अनुलोम-विलोम करें। इसमें दाहिने हाथ के अँगूठे से दाहिनी नासिका बन्द करें, और बाईं नासिका से लें, फिर दाहिने हाथ की तर्जनी से बाईं नासिका बन्द करके दाहिनी नासिका से श्वास छोड़ें। फिर इसी मुद्रा में दाहिनी नासिका से श्वास लें और अँगूठे से दाहिनी नासिका बन्द करके बाईं नासिका से श्वास छोड़ें।
  3. फिर शरीर को ढीला छोड़कर शान्त चित्त होकर आज्ञाचक्र (कपाल) पर ध्यान केन्द्रित करें और ॐकार का सात बार नाद करें।
  4. फिर श्वासोच्छ्वास पर मन को केन्द्रित करें, शरीर ढीला रखें और मन, वचन एवं काया ध्यान की तैयारी करें। अब ऐसा विचार करें, कि आप ध्यान के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
  5. अब मन में एक सरोवर की कल्पना करें। सरोवर के किनारे नन्दनवन जैसे एक रमणीय उद्यान की कल्पना करें। उस नन्दनवन में सरोवर के किनारे एक अशोक वृक्ष की कल्पना कीजिए। यह अशोक वृक्ष अत्यन्त प्रभावशाली एवं सभी प्रकार के शोक दूर करने में सक्षम है। आप उस वृक्ष के नीचे पद्मासन या सुखासन मुद्रा में पूर्वाभिमुख होकर बैठे हैं। अमावस्या की रात्रि बीतने के बाद भोर के सूर्योदय के अद्भुत दृश्य की कल्पना कीजिए। सरोवर का मनोरम दृश्य, सूर्य के साथ खिलते हुए कमल, अन्य जलचर जीव, पक्षियों के चहकने की आवाज आदि अनुभव करें।

फिर दोपहर का सूर्य देखें। बाहर की गर्मी के कारण सरोवर के जीव अन्दर चले गए, इसलिए पूर्ण शान्ति है। आप अशोक वृक्ष के नीचे बैठे शीतलता अनुभव कर रहे हैं। चारों ओर गर्मी होने पर भी वृक्ष के नीचे शीतलता है। शाम के समय सूर्यास्त होता देखें। सभी पक्षी अपने घोसलों में लौट रहे हैं, सरोवर के जीव पुनः खेल रहे हैं, सूर्य पर निर्भर कमल भी बन्द हो रहे हैं। अब पूर्ण सूर्यास्त हो गया, जरा भी उजाला नहीं रहा, अमावस की रात है, तारे टिमटिमा रहे हैं।

रात्रि का एक प्रहर बीतने के बाद, आप देख रहे हैं कि सरोवर में स्थित तेजस्वी किरणों सा दिखने वाला अमृत झरना आकाश की ओर उछल रहा है। वह पवित्र अमृत जल उछलते हुए आपकी ओर भी आ रहा है, ऐसा विचार कीजिए। वह जल पहले आपके चरणों को स्पर्श कर रहा है। पानी धीरे-धीरे बढ़ रहा है, और अब हृदय, गले और मस्तक तक पहुँच कर पूरे शरीर को पवित्र कर रहा है, नहला रहा है।

वह जल ब्रह्मरन्ध्र तक पहुँच कर सबसे पहले “सुषुम्ना नाड़ी” को खोल रहा है। अब वह जल उसमें प्रवेश करके उस नाड़ी को पवित्र बना रहा है। फिर “वज्रा नाड़ी” खुल रही है, वह जल उसमें प्रवेश करके उस नाड़ी को पवित्र बना रहा है। फिर “चित्रिणी नाड़ी” खुल रही है, अब वह जल उसमें प्रवेश करके उस नाड़ी को पवित्र बना रहा है। अब “ब्रह्म नाड़ी” खुल रही है, और वह जल उसमें प्रवेश करके उसे पवित्र बना रहा है।

इस प्रकार समस्त नाड़ियों को पवित्र करते हुए अन्दर गया वह जल बाहर न निकले, इसलिए समस्त नाड़ियाँ बन्द हो रही है। अब मात्र शुद्ध चेतना है, अन्दर स्थित जल अब धीरे-धीरे शान्त और स्थिर हो रहा है, और अन्ततः पूर्ण स्थिर हो गया है। उस अमृत जल के कारण आत्मा भी एकदम पवित्र हो गई है, आनन्द अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया है।

  1. फिर शान्त चित्त होकर सरोवर को देखिए, उसका अवलोकन कीजिए।
  2. फिर विचार कीजिए कि दूर क्षितिज से लाल रंग की कोई चीज आ रही है। वह धीरे-धीरे निकट आ रही है, बड़ी हो रही है। वह लाल रंग का कमल है, अब उसकी लाल रंग के कमल की पंखुड़ी देखिए, वह कमल धीरे-धीरे खिल रहा है, प्रकाशमान हो रहा है। फिर उसकी हरे रंग की कर्णिका और पीत वर्ण का पराग देखिए।
  3. उस पराग के मध्य में पीले रंग से ‘लँ’ अक्षर बनाइए, और उस अक्षर के मध्य में लाल रंग का त्रिकोण बनाइए। लाल रंग के त्रिकोण की पीठिका पर एक सर्प की धारणा कीजिए। वह सर्प साढ़े तीन मोड़ लेकर शान्ति से बैठा है। आप उसके साढ़े तीन मोड़ पर लोगस्स सूत्र द्वारा 24 तीर्थंकरों का अवधान कीजिए। पहले मोड़ पर 1 से 7, दूसरे मोड़ पर 8 से 14, तीसरे मोड़ पर 15 से 21 और 22 से 24 आधे मोड़ पर हैं, इस प्रकार विचार कीजिए।

 

( क्रमशः )

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तपस्या में रहने वाले पूज्य मुनिश्री ने ध्यान की प्रक्रिया पर लेख लिखकर ध्यान प्रेमियों को मिष्ठान थाल दिया है।पूज्य आचार्य श्री यशोविजय सूरीश्वरजी म.सा.‌ ( पूज्य श्री आचार्य भुवनभानु सूरिजी म.सा. ) ने यह ध्यान विषयक लेख का संशोधन करके महान उपकार किया है।जिनशासन मान्य ध्यान योग से आत्मा शीघ्र समाधि - सिद्धपद प्राप्त करेंगी ऐसा आत्मा विश्वास है।

2 Comments

  • Hemant makati
    June 1, 2020

    From so many time I was searching..I was request so many MAHATMA JI..I want more details. For Kundalini shakti..Please guide me

  • Hemant makati
    June 1, 2020

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