मृगापुत्र कथा – 2

मृगापुत्र कथा – 2

इसी जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में शतद्वार नामक समृद्ध नगर था। वहाँ धनपति नामक राजा राज्य करता था। इस नगर के निकट विजयवर्धमान नामक एक नगर था, वहाँ इक्काइ नामक राठौड़ (राजा द्वारा नियुक्त प्रतिनिधि) राज्य करता था। उसके अधीन पांच सौ गांव थे। वह अत्यन्त अधर्मी था, और पाप करने में ही मौज का अनुभव करता था। उसने इस प्रकार के पापाचरण किए:

 

  • अपने अधीन पांच सौ गांवों पर अत्यधिक कर लगाना।
  • किसानों को कम पैसे देकर दोगुना अनाज लेना।
  • रिश्वत देकर या अधिक ब्याज लेकर धन का संचय करना।
  • लोगों पर हिंसा आदि के गलत इल्जाम लगाना।
  • पैसे लेकर अयोग्य व्यक्ति को उच्च पद देना।
  • चोरों को दण्ड न देकर उनका पालन करना।
  • गाँव के गाँव जला देना
  • राह चलते राहगिरो को सहायता करने की बजाय परेशान करना।
  • लोगों को धर्म से विमुख करना।
  • श्रीमन्तों को परेशान करके गरीब बनाना।
  • बड़े लोगों के सामने वादा करके मुकर जाना।
  • प्रजा को पीड़ा देने को ही कर्तव्य मानना।
  • माया, झूठ प्रपंच का लगातार सेवन करना

 

ऐसे अनेक पाप करके अपनी आत्मा को कलुषित करते हुए इक्काइ अपना जीवन व्यतीत कर रहा था। एक दिन उसके शरीर में एक साथ सोलह महारोग उत्पन्न हुए, जो इस प्रकार थे:

 

1. श्वास2. खांसी3. बुखार4. दाह
5. कुक्षिशूल6. भगंदर7.  मस्सा8. अजीर्ण
9. दृष्टिशूल10. मस्तकशूल11. अरुचि12. आँख की वेदना
13. कान की पीड़ा14. खुजली15. जलोदर16. कुष्ठ

 

ये सोलह रोग भयानक, असाध्य और मृत्यु के समकक्ष थे। इक्काइ से ये रोग सहन नहीं हो रहे थे। उसने सेवकों को बुलाकर कहा, कि मेरे रोग दूर कर सके, ऐसे वैद्यों को बुलाकर मेरी चिकित्सा करवाओ। सोलह रोग भले ही दूर न कर सके, लेकिन एक रोग तो दूर करवाओ और ऐसी घोषणा करवाओ कि जो ये रोग दूर करेगा, उसे बहुत अधिक धन मिलेगा।

 

राजा की आज्ञा से सेवकों ने घोषणा करवाई। सुनकर अनेक वैद्य और वैद्यपुत्र उपचार करने के लिए आए, विविध प्रकार की औषधियाँ दी गई। अनेक प्रकार के चिकित्साकर्म किए गए। किन्तु सोलह में से एक भी रोग शान्त नहीं हुआ, अन्ततः सब लोग थक-हार कर चले गए।

 

शारीरिक वेदना से पीड़ित इक्काइ राजा ने अपने राज्य आदि पर अत्यधिक राग-मूर्छा की, और एक दिन उसकी मृत्यु हो गई। दो सौ पचास वर्ष की आयु पूर्ण करके वह रत्नप्रभा नामक पहली नरक में गया, और वहाँ घोर पीड़ा भोगकर अपना आयुष्य पूर्ण करके मृगारानी का पुत्र बना।

 

यह बालक जब से माता के गर्भ में था, तब से माता के शरीर में भी अनेक वेदनाएँ उत्पन्न हुई। इतना ही नहीं, वह राजा विजय की भी अप्रिय बन गई। इन कारणों से रानी ने गर्भ गिराने का निर्णय किया। इस हेतु उसने अनेक प्रयास किए, किन्तु सन्तान का आयुष्य प्रबल होने के कारण वह जीवित रहा।

 

बालक का जन्म हुआ, वह बहुत कुरूप था, इसलिए मृगा ने घाई को आदेश दिया, कि बच्चे को कचरे में फेंक दो। किन्तु चतुर घाई ने राजा को बता दिया। राजा स्वयं चलकर रानी के पास आया और कहा, “देवानुप्रिये ! यह तुम्हारा प्रथम गर्भ है। यदि इसे कचरे में फेंक दिया तो भावी प्रजा और सन्तति भी स्थिर नहीं रहेगी।” इसलिए रानी ने राजा की बात मानी और बालक को गुप्त रूप से पालने लगी।

 

गौतम ! पूर्व भव में बाँधे कर्मों का कटु विपाक इस भव में मृगापुत्र साक्षात् भोग रहा है।

 

मृगापुत्र का भूत और वर्तमान जानने के बाद गौतम स्वामी को मृगापुत्र का भविष्य जानने की जिज्ञासा हुई, इसलिए उन्होंने विनयपूर्वक प्रश्न किया।

***

 

“प्रभु ! मृगापुत्र यहाँ से मृत्यु प्राप्त करके कहाँ उत्पन्न होगा?”

 

“गौतम ! मृगापुत्र इस भव में २६ वर्ष तक जिएगा, आयुष्य पूर्ण करके वह जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र के वैताढ्यगिरि के तलहटी में सिंह के रूप में उत्पन्न होगा। सिंह के भव में अत्यन्त पाप करके वह घोर अशुभ कर्म बाँधेगा। वहाँ से मरकर पहली नरक में एक सागरोपम तक पीड़ा भोगकर सरीसृप ( भुजा एवं छाती के बल  चलने वाले पशु ) की योनी में उत्पन्न होगा। वहाँ भी हिंसादि करके पापकर्म उपार्जित करेगा।

 

वहाँ से काल पूर्ण करके दूसरी नरक में तीन सागरोपम की  पीड़ा भोगकर पक्षी योनी में उत्पन्न होगा। यहाँ भी अनेक कर्म बाँध कर तीसरी नरक में सात सागरोपम की पीड़ा भोगेगा। वहाँ से सिंह के भव में जन्म लेगा। सिंह के भव में अनेक जीवों को मारकर अशुभ कर्म बाँधते हुए चौथी नरक में उत्पन्न होगा।

 

नरक के घोर-अतिघोर दुःख सहन करके वहाँ से च्यवन करके सर्प के भव में उत्पन्न होगा। वहाँ भी अनेक पाप करके पांचवी नरक में जाएगा।

 

अनेक सागरोपम दुःख सहन करके यह मृगापुत्र काल करके स्त्री के रूप में उत्पन्न होगा। उस भव में अनेक प्रकार के विषय कषायों द्वारा क्लिष्ट कर्म बाँध कर वह छठी नरक में जाएगा।

 

वहाँ असह्य क्षेत्रज वेदनाएँ भोगकर वहाँ से निकल कर मनुष्य बनेगा। वहाँ भी पापकर्म करके सातवीं नरक में उत्पन्न होगा। सातवीं नरक के भयंकर दुःख भोगकर भी उसे छुटकारा नहीं मिलेगा। वहाँ से निकलकर जलचर पंचेन्द्रिय तिर्यंच गति में मछली, मगर, ग्राह, सुंसुमार आदि जाति की समस्त योनियों और साढ़े बारह लाख कुल कोटियों में प्रत्येक में लाखों बार जन्म-मरण को प्राप्त करेगा।

 

इसी प्रकार चतुष्पद पशुओं में, उरपरिसर्प और भुजपरिसर्प के रूप में, खेचर में, चउरिन्द्रिय, तेइन्द्रिय, बेइन्द्रिय में भी लाखों भव करेगा।

 

इसी प्रकार एकेन्द्रिय में वनस्पतिकाय, वायुकाय, तेउकाय, अप्काय और पृथ्वीकाय में भी प्रत्येक योनी में और प्रत्येक कुलकोटि में लाखों बार जन्म लेकर मृत्यु को प्राप्त करेगा।

 

इस प्रकार दीर्घकाल तक भव-भ्रमण करने के बाद मृगापुत्र की आत्मा, कुछ कर्म हल्के होने के कारण सुप्रतिष्ठपुर नामक नगर में एक बैल के रूप में उत्पन्न होगा। वर्षाऋतु के प्रारम्भ में वह गंगा नदी के किनारे वह जब मिट्टि खोद रहा होगा, वहीं गिरकर उसकी मृत्यु होगी। मरकर इसी नगर के श्रेष्ठी के घर पुत्र के रूप में जन्म लेगा।

 

उसका युवावस्था में पंचमहाव्रतधारी गुरु भगवंत के साथ संयोग होगा। उनके मुख से धर्म-श्रवण करके वह चारित्र अंगीकार करेगा। दीर्घकाल तक निरतिचार श्रमण जीवन का पालन करके अन्त में अतिचारों का आलोचन – प्रतिक्रमण करके समाधिपूर्वक कालधर्म प्राप्त करके वह सौधर्म नामक प्रथम देवलोक में उत्पन्न होगा।

 

वहाँ से मृत्यु पाकर महाविदेह क्षेत्र में श्रीमन्त श्रेष्ठी के घर जन्म लेगा। वहाँ कलाभ्यास करके, चारित्र ग्रहण करके अन्त में सभी कर्मों का क्षय करके मोक्ष जाएगा।

 

मृगापुत्र के वर्तमान काल का दुःख, भूतकाल के पाप एवं भविष्य की दुर्गति का श्रवण करके राजा हस्तिपाल की शुल्कशाला में बैठी अपापापुरी की पापभीरु पर्षदा अधिक भीरु बनी।7

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जिनके प्रवचनों में लोगों को जकड़ कर रखने की क्षमता है। प्रसंगोचित प्रवचन करने की अद्भुत कुशलता है। और प्रवचन के साथ-साथ कलम चलाकर साहित्य का सृजन करके जिन्होंने अपनी सर्वतोमुखी प्रतिभा का परिचय दिया है। ऐसे प्रवचन प्रवर आचार्य भगवन्त उपकार करते हुए श्री विपाक सूत्र आगम ग्रन्थ की कथा को हृदयस्पर्शी शब्दों में कलमबद्ध किया है।वाचकों के लिए यह आगम कथा निश्चय ही हृदय के द्वार खोल देने वाली बनेगी, ऐसी श्रद्धा है।

1 Comment

  • दिनेश भंसाली
    June 10, 2020

    ऐसी कहानियां भेजते रहे बच्चों को सुनाकर हमारा स्वाध्याय भी हो जाता है।

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