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“मेरी आचार-संहिता”

नमस्ते मित्रों !

 

आप विद्यार्थी हो, तो परीक्षा में पास होना आपके लिए बहुत बड़ा चेलेन्ज है? 

आप बिज़नेस मेन हो, आपके सामने कड़ी चुनौती है, टर्नओवर कैसे बढ़ाना? 

आप डॉक्टर हो, तो मरीज़ को क्रिटीकल कंडीशन से बाहर लाना आपके सामने बड़ी चुनौती है? 

आप CA हो, तो आपके सामने बड़ा प्रश्न है, कि क्लायन्ट के एकाउन्ट को क्लीयर कैसे करना?

 

परन्तु यह मत भूलिए कि सबसे पहले आप इन्सान हो। आपके सामने सबसे पहले यही बात अहमियत रखती है कि मेरी इन्सानियत को गिरते हुए कैसे बचाया जाए?

 

अगर गौर से देखा जाए, तो सरकार के सामने यह चुनौती है कि बढ़ती हुई पेट्रोल-डीज़ल की कीमत कैसे घटानी चाहिए, तो इन्सान की गिरती हुई नीयत कैसे ऊपर उठानी यह चुनौती धर्मगुरुओं के सामने है।

 

पारा (मरक्युरी) शायद पकड़ में आ सकता है, लेकिन आज इन्सान का संकीर्ण होता जा रहा चरित्र (केरेक्टर) समझ पाना, पकड़ पाना व उसे ऊपर उठाना सबसे ज्यादा मुश्किल होता जा रहा है।

 

आज सामान्यतः इन्सान का बौद्धिक स्तर खूब बढ़ा है। पहले आदमी भूल कर बैठता था, तो किसी के समझाने पर भूल को अपना भी लेता, एवं छोड़ भी देता था। परन्तु आज आदमी भूल करता है, और जब कोई उसे अपनी इस भूल के बारे में कुछ भी कहे तो वह इस बात का भरसक प्रयास करता है, कि वो गलत नहीं था। अपनी बुद्धि का इस तरह दुरुपयोग करता है।

 

ऐसे में किस को बोले? कैसे समझाए? किस तरह उनको अपनी जिन्दगी का विनाश करने से रोकें ? इस समस्या का हल अच्छे-अच्छे धर्मगुरुओं और समाज के हितचिन्तकों के पास नहीं है।

 

चरित्र, केरेक्टर आज बहुत ही संकीर्ण और कॉम्प्लीकेटेड हो चुका है। जिन्हें पुरखों ने ‘पाप’ कहा था, वैसे कईं आचार आज जीवन के भाग बन चुके है, उसमें बहुजन समाज को संभवतः कोई आपत्ति भी नहीं है, उस कार्य को भूल या पाप समझने का अहसास तक नहीं है।

 

जो भी हो, पर मुझे और आपको, हम सब को खुद अपनी एक चरित्र-सीमा और आचारसंहिता तय करनी चाहिए, “मैं इसको क्रोस नहीं करूंगा।“

 

जीवन सभी का भिन्न है, मन सभी का अलग है, संयोग और परिवेश सभी के अलग हैं – ऐसे में सभी के साथ एक सरीखे चरित्र की अपेक्षा कैसे रखी जा सकती है?

 

पर फिर भी इतना खयाल रखिए कि, अध्यात्म जगत में एक नियम है, 

” जिसका चरित्र जितना ऊँचा, वह उतना ही महान। “

 

» क्यों सृष्टि का चक्र भी संयमी मुनिवर की आज्ञा का पालन करता है?

» क्यों देवी-देवता भी संयमी मुनिवर की सेवा में तैनात रहते हैं?

» क्यों जैन-अजैन सभी मनुष्य संयमी के सामने झुक जाते हैं?

» क्यों शिकारी खूंखार पशु भी संयमी के पास आकर शांत हो जाते हैं?

 

इन सभी का एक ही कारण है, संयमी मुनिवर का चारित्र सबसे ऊँचा होता है। इस संसार में सबसे श्रेष्ठ, उत्तमोत्तम और उत्कृष्ट जीवन है – संयम जीवन। संयमियों का चारित्र सबसे ऊँचा और सर्वश्रेष्ठ होता है। अंततः वे सर्वाधिक सम्मान के पात्र हैं।

 

ऐसे चारित्रधर को नमन करें, उनका स्मरण करें, उनके वचन सुनें, उनके पथ पर कभी हम भी चलें, और फिर हम भी प्रभु बनें। ऐसी शुभकामना के साथ आओ, इस गीत को गुनगुनाए।

 

।। चारित्र पद ।।

 

(पतझड़ सा ये मेरा जीवन)

 

संसार है बुरा सपना, संयम सुनहरा है;

अब छोड़ के मुझे सब कुछ, चारित्र ही पाना है,

संयमियों को नमन-नमन मेरे नमन

संयमियों को नमन, मेरे लाखों नमन…(1)

 

 

संचित कर्मों को ये, चारित्र खाली कराए;

एक ही दिन में ये जीवन, मोक्षमंजिल दिलाए;

कैसे मिले संयम मुझको, मन में चले मंथन,

संसार में सबसे कठिन, सबसे महान जीवन… संयमी...(2)

 

 

पाप नहीं यहाँ कोई, ना कोई दोष की पीड़ा;

चारित्री नहीं देते, जीवों को थोड़ी भी पीड़ा;

चलते यूं ही बोले वैसा, जिसे कोई ना हो दुःखी,

उनके निकट जो भी आते, वे सर्वथा हो सुखी… संयमी...(3)

 

 

चारित्र देता मुक्ति, चारित्र प्रभु बनाता;

दुनिया के हर जीवों से, चारित्रधर का नाता;

सबका भला हो ऐसा ही, चारित्री का चिंतन,

जो सिद्धिपद पहुँचवा दे, ये ऐसा है इंजन… संयमी...(4)

 

About the Author /

authors@faithbook.in

शास्त्रबोध, संवेदनशीलता और शीघ्र-कवित्व का व्यक्तित्व धारण करने वाले मुनिवर ने, भगवान बनने का राजमार्ग, अर्थात् वीसस्थानक पर नूतन काव्यों की रचना की और साथ उनकी ऐसी विवेचना की जो युवा हृदय को छू सके।

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