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मेरे प्यारे मित्र

यह दुनिया रिश्तों के रंगों से चहक उठती है । रिश्तों की खुशबू से ही ये जहाँ महक रहा है । उसमें भी दिल को जो रिश्ता खूब प्यारा और खुशमिज़ाज़ लगता है वह है दोस्ती का । यह रिश्ता खुन का तो नहीं होता लेकिन इसका जज़्बा दिल से जुड़ा होता है ।

 

दोस्ती के रिश्ते में पद… प्रतिष्ठा… सत्ता… पैसा… अभिमान… गर्व… अहंकार… Status… ये सब बीच में नहीं आते । जैसे कि; श्रीकृष्ण और सुदामा की दोस्ती… ना इस दोस्ती में उच्च-नीच की भावना थी, ना सत्ता का अभिमान, ना ऐश्वर्य का अहंकार… और यही तो होती है दोस्ती ।

 

दोस्ती ही एक ऐसा आशियाना है जो जिंदगी का लुत़्फ उठाने का ज़रिया होता है । दोस्ती में हमें खुद को बदलने की जरुरत नहीं होती हम जैसे हैं वैसे ही हमारे दोस्त को पसंद आते हैं । हमारी खासीयत, कमजोरीयाँ और सारे राज़ उसके दिल में कैद होते हैं ।

 

दोस्ती करने का कोई वक्त नहीं होता, जब दोस्ती हो जाती है वही वक्त खास बन जाता है । खास वक्त तो शादी-ब्याह के लिए देखा जाता है क्युँकि उसमें कदम-कदम पर जोखिम जो उठानी होती है । लेकिन दोस्ती तो में दिल को सुकुन मिलता है । शादी को लिए उम्र मायनें रखती है लेकिन दोस्ती के लिए ऐसी कोई पाबन्दियाँ नहीं होती । दोस्ती तो बच्चों के साथ, जवाँ मर्दों के साथ या उम्र की दहलीज़ पर कदम रखे हुए बुज़ुर्गों के साथ भी बेहद और बे-इन्तिहाँ हो सकती है । इत्र की तरह महकती हुई दोस्ती सभी के दिलो-दिमाग पर अपनी मदहोश हुकूमत करती है ।

 

नर्सरी की शिक्षा से लेकर विदेश में मास्टर्स करने तक के जिंदगी के सफर में हर कदम कदम पर हमारे दोस्त बनते ही रहते हैं । घर के पास-पड़ोस में रहने वाले लोगों के साथ दोस्ती… किसी नई जगह शिफ्ट हो जाएँ तो वहाँ पर नए लोगों से दोस्ती… छुट्टी में मामा-मासी-बुवा या किसी रिश्तेदारों के वहाँ जाए तो वहाँ नए दोस्त बन जाते ही हैं ।

 

कभी किसी ट्रैव्हेलींग में या टूर्स् पर गए हों, किसी तीर्थ-यात्रा पर गए हों, ओफिशीयल काम से किसी प्रोजेक्ट वर्क पर गए हों तो बिना किसी मकसद़, बिना किसी सोच-समझ के या बिना किसी कोशिश के ही दोस्त बन जाते हैं ।

 

School और Collage time के दोस्तों को लोग आज कहाँ-कहाँ से search कर उनके साथ groups बना रहे हैं । और अपनी पुरानी यादों के photos, videos उन groups में share करके अपने दोस्तों के साथ बीताए हुए उन यादगार पलों को याद करते हुए बुढ़ापे में भी उन लम्हों का… अपनी दोस्ती का आनन्द ले रहे हैं… अपने दोस्तों का याद कर रहे हैं…।

 

दोस्त दूर हो या नज़दिक… रोजाना मिलना होता हो या नहीं भी… लेकिन इन सब बातों से दोस्ती में कभी फासले नहीं बढ़ते । जो दिल के गहराई तक पहुँचे हुए ये रिश्ते हैं वे दिन-ब-दिन और खिलते रहते हैं… महकते रहते हैं… किसी गुलदस्ते की तरह…।

 

हाँ…! लेकिन रिश्ता निभाना भी पड़ता है, वो भी दोनों ओर से । एक तरफ से एक दोस्त सम्बन्ध बनाया हुआ है, हमेशा communication के साथ connected है और दूसरी ओर आप हो कि वक्त का बहाने बना रहे हो तो one way communication भी ज़्यादह दिनों तक नहीं चलता है इससे आप अपने करीबी और सबसे अच्छे दोस्त को खो सकते हो हमेशा हमेशा के लिए…!

 

संस्कृत सुभाषित में कहा है कि सखा साधुप्रलापावधि ।

 

          मित्र उस समय तक आपके साथ जुड़े रहते हैं जब तक आप दोनों के बीच स्नेहयुक्त सुसंवाद चालु रहता है । जब वह धीरे-धीरे समाप्त होना चालु हो जाएगा तो आपकी मैत्री भी धीरे-धीरे अपने अन्तिम चरण पर पहुँच जाएगी । इसलिए अच्छे मित्र के साथ बने रहने के लिए सजग तो रहना ही पड़ेगा ।

 

हम अपनी life को जब एक movie की तरह देखेंगे तो हमे इस बात का खयाल आएगा कि हम जब छोटे बच्चे थे तब school में हम अपने टीफीन में जो भी लेकर जाते थे वह अपने दोस्तों के साथ share करके खाते थे । दोस्तों के साथ share करके खाने की मज़ा ही कुछ और थी । घर से निकलते समय माँ समझाकर भेजती थी कि “मैंने आज तेरा पसन्दिदा टीफीन बनाया है तो वह सब अकेले ही खा ले ना ! ना कि अपने दोस्तों में बाँटना ।” लेकिन वो बात घर के दहलीज़ तक ही रहती थी, जैसे ही school में lunch time होता था तब दोस्त के साथ अपना टीफीन कब share करे ऐसा होता था, मम्मी ने बनाया हुआ पसन्दिदा उसे भी खिलाने का इन्तज़ार रहता था । एक बार वो अपने टीफीन में से कुछ खाए तब जाकर दिल को सुकुन मिलता था ।

 

थोड़ेसे बड़े होकर अब teenage मे आ गए… अब हमें मिलने वाली चॉक्लेट्स भी दोस्तों के साथ share होने लगी, दोस्तों के साथ games खेलने का अलग मज़ा आने लगा । उनके साथ अपने toys भी share होने लगे, खेलते-खेलते अगर कोई cheating करे और पकड़ में आने के बाद अगर वो रूठकर रोने लगे तो उसे मनाने का भी एक अलग मज़ा आता था ।

 

हमारे birthday celebration में हमारे रिश्तेदारों से ज़्यादह खुशी दोस्तों के साथ celebrate करने में ही मिलती थी । और उसके photos click करते समय उन मीठी यादों को भी हमेशा के लिए अपने दिल में कैद कर लेते थे ।

 

Teenage जैसे जैसे खत्म होती है वैसे वैसे Emotions के कारण दिल में कोहराम उछलता है… अजीबो-गरीब हल-चल मचना चालू हो जाती है । ऐसे समय में हमारे लिए दोस्त ही safe deposit locker बन जाता है । हमारी जो secret बातें हम अपने मम्मी-पापा, भाई-बहन को भी बता नहीं सकते वो सब दोस्त के सामने अपने आप बयाँ हो जाती हैं ।

 

खुशी की बातें भी उसे कहने का मन होता है और जब दिल भर जाता है तो उसके गले में पड़कर फूँट-फूँटकर रोने का भी मन होता है ।

 

भीड़ में मिला हुआ दोस्त कब फुरसत में मिलेगा इसका हमे दिल से इन्तज़ार रहता है । जब वो मिलता है तो ना बातें खत्म होती है, ना ही दिल भरता है ।

 

“अबे ओय !” कहते हुए धक्का मारके जिसके साथ बातों की शुरुआत कर सकें और Sorry, Thank you जैसी formalities किए बिना एक-दूसरे को bye करके निकल सकें, यह होती है दोस्ती ।

 

और दोस्त भी कुछ कम नहीं होते… छोटी-छोटी बात पर हमें छेड़ते रहते हैं, हमारे सामने हमारे दिल में छिपी हुई किसी खास शख्स का नाम ले लेकर हमे परेशान करते रहते हैं, हमारी नकल उतारते हैं, हमारे ऊपर घुस्सा होते हैं, हक़ ज़ताते हैं, हमारी कोई भी चीज़ बेझिझक माँग लेते हैं जैसे कि उनकी हो और उनकी चीज़ें देते वक्त कभी एहसान नहीं ज़ताते ।

 

हमारे upset mood को set करने की technique दोस्तों के पास होती है । खासकर जब अपना mood nervous होता है तब groups बनी हुई वही पुरानी कॉमेडीज् को याद दिलाकर हँसाते-हँसाते कब mood ठीक हो जाता है, उसका पता भी नहीं चलता । जोक्स् तो वैसे भी बकवास ही होते हैं लेकिन उन्हें इस तरह से पेश करते हैं कि हँसी निकल ही जाती है ।

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दोस्त बातें करता है तो दिल खुशमिज़ाज़ रहता है लेकिन जब किसी कारण से वह चूप होता है तब दिल की बैचेनी का ठिकाना नहीं होता ।

वो अपने सबसे करीब़ होता है, दिल के एकदम पास । इसलिए उसके हाव-भाव से… Expressions से हम ये तय कर सकते हैं कि अब ये मेरा दोस्त रहा है कि नहीं । उसकी छोटी-छोटी बातों को इतनी नज़दिकी से हमारे सिवाय किसी ने नहीं देखा होता इसलिए उसके अन्दर आए हुए छोटे से छोटे बदलाव को भी हम झट से पकड़ लेते हैं ।

 

वैसे तो दोस्त कभी धोखा नहीं देता लेकिन जब कभी अपना भरोसा over confidence या disbelief में बदल जाता है तो जिंदगी में कभी-कभी ऐसे भी झटके लगते हैं कि जिसे ना सह सकते हैं, ना कह सकते हैं । इसलिए शास्त्रों मे भी कहा है कि दोस्त बनाते समय बहुत सावधानी रखे क्युँकि बाद में सावधानी काम नहीं आती बस पछतावा ही करना पड़ता है ।

 

वर्जनीया मतिमता, दुर्जनः सख्यवैरयोः, श्वा भवत्यपकाराय, लिहन्नपि दशन्नपि ॥

          (सोबत करतौं श्वान की, बे बाजु भवै दुःख, खीजुं चाटतैं पींड कौ, रीझ्युं चाटत है मुख ॥)

 

अर्थात्- जिसके साथ एक बार गाँठ पड़ जाती है तो बाद में उसे निभाना पड़ता है । इसलिए सोच-समझकर ही कदम रखने चाहिए ।

 

पञ्चसूत्र और उपदेशरहस्य की अन्तिम 15 हितशिक्षा में कहा है कि,

          वज्जिज्जा अधम्ममित्तजोगं ॥

 

अर्थात्- दुराचारी, अविश्वासु एवं नास्तिक मित्रों का त्याग करें !

कल्लाणमित्तं संसग्गि सदा कुव्वेज्जं पंडिए ॥ (ऋषिभाषितसूत्र-॥33॥17॥)

अर्थात्- बुद्धिशालिओं को कल्याणमित्रों की संगति करनी चाहिए ।

कल्याणमित्र किसे कहते हैं ? भर्तृहरि नीतिशतक में इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं कि,

पापान्निवारयति योजयते हिताय, गुह्यं निगूहति गुणान्प्रकटी करोति ।

          आपद्गतं च न जहाति ददाति काले, सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः ॥73॥

 

अर्थात्- 1. जो मित्र को पाप करने से रोके, 2. मित्र को हितकारी प्रवृत्तियों की संगति लगाये, 3. मित्र के रहस्य गुप्त रखे, 4. मित्र के गुणों को प्रकट करें, 5. आपत्ति में मित्र का रक्षण करें, 6. मित्र को समय दें ।

 

महापुरुषों के द्वारा कल्याणमित्र के ऐसे लक्षण बताए गए हैं ।

 

मेरे परममित्र मुनिवर श्री तीर्थबोधिविजयजी म.सा. की एक अत्यन्त सुन्दर एवं मनोरम कल्पना है कि प.पू. उपाध्याय श्री यशोविजयजी म.सा. के गुरु प.पू. श्री नयविजयजी म.सा. और प. पू. श्री विनयविजयजी म.सा. के गुरु  प.पू. उपाध्याय श्रीकीर्तिविजयजी म.सा. के बीच में घनिष्ठ मैत्री थी । उन्होंने तय किया था कि अपने शिष्यों के नाम भी एक-दूसरे के पूरक और समानार्थी हों ऐसे ही रखेंगे । इसलिए प.पू. नयविजयजी म.सा. ने ‘कीर्ति’ का समानार्थी नाम ‘यश’ होने से अपने शिष्य का नाम ‘यशोविजय’ रखा और प.पू. कीर्तिविजयजी म.सा. ‘नय’ शब्द को ध्यान में रखते हुए अपने शिष्य का नाम ‘विनयविजय’ रख दिया । और आपने देखा ही होगा कि पू. यशोविजयजी म.सा. और पू. विनयविजयजी म.सा. के बीच में भी इतनी घनिष्ठ मित्रता थी कि ‘श्रीपाल राजा की रास’ की रचना करने की विनती का स्विकार विनयविजयजी म.सा. इस शर्त पर किया था कि यशोविजयजी म.सा. के द्वारा इस अधूरी रास को पूर्णत्व प्राप्त हो और ऐसा यशोविजयजी म.सा. ने भी ऐसा वचन दिया था । इस कहानी का सुखद अन्त भी बिल्कुल वैसा ही हुआ, इन दो मित्रों के द्वारा ही यह रास पूर्ण हुई । यह रास अर्थात् गुरु भगवन्तों की मैत्री-गीता ही है ।

 

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हमारे पू.पा. गच्छाधिपति श्रीजयघोषसूरि महाराज के मित्र थे पू. आ. श्रीधर्मजितसूरि म. सा. । पू. आ. श्रीधर्मजितसूरि म. सा. के देवलोक गमन के पश्चात् भी वे पू. गच्छाधिपति के पास मैत्री भाव से आते रहते ही थे ।

सज्जन की मैत्री… महापुरुषों की मित्रता प्राप्त होने जैसा दूसरा परम सौभाग्य और क्या हो सकता है ?

हम जिस व्यक्ति के संगति में है वह सज्जन है कि दुर्जन यह कैसे पता चलेगा ? इसका उत्तर यह है कि,

          आरम्भ गुर्वीक्षयिणी क्रमेण, लघ्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात् ।

          दिनस्य पूर्वार्धपरार्धभिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम् ॥

 

अर्थात्- दुर्जन की मैत्री दिवस के पूर्वार्ध (सुबह से दोपहर तक) की छाया जैसे होती है, जो पहले विस्तृत होती है बाद में धीरे-धीरे वह छोटी हो जाती है । सज्जन की मैत्री दिवस के परार्ध (दोपहर से संध्या तक) की छाया जैसे होती है, पहले छोटी होती है लेकिन बाद में बढ़ते-बढ़ते विस्तृत हो जाती है ।

 

वैसे ही मैत्रीभाव के लिए अन्य शास्त्रों में भी कहा है कि,

  • उत्सवे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसंकटे, राजद्वारे स्मशाने तिष्ठति बान्धवः पञ्चतन्त्र ॥5॥41॥
  • ्यसने मित्र परिक्षा
  • आपत्सु मित्रं जानीयाद् – हितोपदेश
  • तन्मित्रं यत्र विश्वासः ।

संक्षेप में इन सभी का यही अर्थ होता है कि उत्सव में, आपत्ति में, दुःकाल में, शत्रु की ओर से आए हुए संकट में, राजकीय दावपेचों के संघर्ष में, स्मशान में जो हमारे साथ तटस्थ रहे, वही सच्चा और विश्वासु मित्र है । क्युँकि ऐसे समय में दूर भागने वाले लोग सच्चे मित्र किस प्रकार हो सकते हैं ?

 

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सच्चा मित्र अपनी जान की बाजी लगाकर भी मित्रकल्याण के लिए तत्पर रहता है । अपने मित्र का दुःख वह देख नहीं सकता । सुख-दुःख में समभागी होकर साथ में खड़े रहने वाले मित्र प्राप्त होना अत्यन्त दुर्लभ है ।

संस्कृत सुभाषित में से क्षीर-नीर की मैत्री की अत्यन्त सुन्दर कल्पना प्राप्त होती है,

          क्षीरेणात्मगतोदकाय हि गुणाः दत्ताः पुरा तेऽखिलाः, क्षीरे तापमवेक्ष्य तेन पयसाऽह्यात्मा कृशानोऽहुतः ॥

          गन्तुं पावकमुन्मनस्तदभवत् दृष्ट्वा तु मित्रापदम्, युक्तं तेन जलेन शाम्यति सतां मैत्री पुनस्त्वीदृशी ॥

 

अर्थात्- स्वयं के भीतर सम्पूर्ण रूप से मिश्रित हो गए जल को दूध अपने सभी गुणों से प्रयुक्त कर देता है । इसलिए उस उपकार का स्मरण रखते हुए जब अग्नि पर चढ़ाए हुए दूध में दग्धता का प्रकोप दिखाई देता है तब कृतज्ञता भाव का स्मरण कर जल अपने मित्र की रक्षा हेतु स्वयं को उस अग्निरूपी दाह में जला देता है । दूसरी ओर अपनी मित्र की पराकाष्ठा देखकर दूध भी व्याकुल होते हुए उसी पीड़ा के साथ अन्तर्बाह्य दग्धता के साथ उकलने लगता है और पुनः जल को प्राप्त करने पर ही शान्त हो जाता है ।

 

सज्जनों की मैत्री भी ऐसी ही होती है ।

दुर्जनों की मैत्री से होने वाले नुकसान को दिखाते हुए शास्त्रों में लिखा है कि,

दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिं चापि न कारयेत्, उष्णो दहति चाङ्गारं शीतः कृष्णायते करम् ॥ – हितोपदेश

अर्थात्- दुर्जन के साथ मैत्री और स्नेह नहीं करना चाहिए । जैसे कोयला अग्नि को धारण करते हुए अपनी गरमी से हाथ को जलाता है वैसे ही वह जब शीतल अवस्था में याने ठंड़ा होता है तो भी हाथ को काला तो करता ही है ।

 

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इसलिए सज्जनों के साथ मैत्री सदा बनाए रखनी चाहिए । और इस मैत्री के रिश्ते को सदाबहार रखने के लिए, अटूट रखने के लिए शास्त्रों में कुछ महत्त्वपूर्ण बातें लिखी हैं,

इच्छेश्चेद्विपुलां मैत्रीं त्रीणी तत्र न कारयेत्, वाग्वादमर्थसम्बन्धं तन्पत्नि परिभाषणम् ॥

 

अर्थात्- 1. मित्र के साथ कभी विवाद न करें, 2. आर्थिक व्यवहार कभी न करें और 3. मित्र की पत्नी के साथ कभी बातें न करें; इन तीन बातों को सदैव ध्यान रखने से मित्रता अखण्ड रहती है ।

 

यावज्जीव यदि अपनी मित्रता को सँभालकर रखना चाहते हो तो मैत्री के इन 4 महाव्रतों का पालन अवश्य करना चाहिए ।

          प्राणैरपि हितावृत्तिः, अद्रोहो व्याजवर्जनम्, आत्मनीव प्रियाधानं एतत् मैत्री महाव्रतम् ॥

 

  • प्राणों का त्याग करके भी मित्रकल्याण करने की वृत्ति होनी चाहिए !
  • जीवन में कभी भी मित्र के साथ द्रोह अर्थात् धोखा नहीं करना चाहिए !
  • मैत्री में यत्किञ्चित् भी स्वहीत या स्वार्थ न देखें !
  • जैसे हम स्वयं को प्रेम करते हैं उतना ही प्रेम अपने मित्र को करें !

वर्तमान समय में जैसे हि अपना youth या young generation कॉलेज में कदम रखता है उन्हें वहाँ की हवा लगती है । साथ में पाश्चात्य संस्कृति भी अपना पूरा सहयोग movies, social media के माध्यम से उनके दिलो-दिमाग  को उकसाने में दे ही रहा है । बस तो… Young generation में अब एक craze आयी है boyfriend-girlfriend बनाने की, जिसमें प्रेम नहीवत् और आकर्षण भरपूर होता है । कई लोग तो एक-दूसरे को दिखान के लिए boyfriend-girlfriend बनाते हैं । ऐसे रिश्तों में मित्रभाव जितनी पवित्रता कितनी होती है, वह तो भगवान ही जानते होंगे ।

 

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लेकिन पू.पा. महो. यशोविजयजी म.सा. को प्रभु ही एक मात्र अपने परममित्र लगते थे, इसलिए उन्होंने श्रेयांसनाथ प्रभु के स्तवन में गाया है कि,

तुमे बहु मैत्री रे साहिबा, मारे तो मन एक, तुझ विण बीजो रे नवि गमे, ए मुझ म्होटी रे टेक ।

                                        श्री श्रेयांस कृपा करो…

और इसका जवाब देते हुए प्रभु कहते हैं,

पुरिसा ! तुममेव तुमं मित्तं, किं बहिया मित्तं इच्छसि ?” श्रीआचारांगसूत्र ।

 

अर्थात्- हे सौभाग्यशाली ! आप स्वयं ही आपके मित्र हो, तो क्युँ बाहरी दुनिया के मित्रों की चाह रखते हो ?

 

प्रभु की यह बात अत्यन्त गम्भीर, गूढ़ एवं तत्त्वभाव से युक्त है, जिसके ऊपर हम सभी अनुप्रेक्षा कर सकते हैं ।

लेख के अन्त में इतना विशेष रूप से ध्यान में लाना चाहता हूँ कि, अपने शास्त्र, तत्त्वज्ञान, परम्परा, सुभाषितों में मैत्रीभाव-दोस्ती-मित्रत्व के ऊपर प्रचुर मात्रा श्लोक लिखे हुए मिलते हैं । उनमें से ही कुछ खास चुने हुए श्लोक इस पवित्र त्यौहार के अवसर आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ ।

 

अपनी प्राचीन संस्कृती में से जो निर्मल-निखालस-निस्वार्थ मैत्रीभाव सिखने के लिए मिलता है, उसका हृदय से आभार मानेत हुए गौरवान्वित् होना चाहिए ।

Last Seen:

 

          मा गा इत्यपमङ्गलं व्रज पुनः स्नेहेन हीनं वचः, तिष्ठेति प्रभुता यथारुचि कुरु ह्येषाप्युदासीनता ।

          नो जीवामि विना त्वयेति वचनं सम्भाव्यते वा न वा, तन्मां शिक्षय मित्र यत्समुचितं वाक्यं त्वयि प्रस्थिते ॥

 

जब दो मित्र बिछड़ते समय एक-दूसरे से विदाई लेते हैं, तब एक मित्र कहना चाहता है, “मत जाओ !” लेकिन ऐसा कहने से अमंगल अर्थात् अपशुकन होगा, इसलिए क्या कहें? “”ठीक है, भले जाओ !” लेकिन इसमें स्नेहभाव कहाँ है ? तो अब क्या कहें ? “ठीक है, अब ठहर ही जाओ !” इसमें तो मित्र को आदेश देने की भावना स्पष्ट दिखाई दे रही है । फिर क्या कहें, “जो ठीक लगे वैसा करो !” इसमें तो उदासिनता, नाराजगी और लापर्वाही दिखाई देती है । ऐसा कहुँ तो, “हे मित्र ! तुम जा तो रहे हो लेकिन तुम्हारे बिना मैं जी नहीं सकुँगा ।” लेकिन इस वचन में असम्भव बात और अतिशयोक्ति स्पष्ट रूप से नजर आती है ।

 

इसलिए हे मित्र ! अब तुम जा ही रहे हो तो इस असह्य विदाई के लिए कुछ उचित वचन भी सिखाकर जाना !


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जिनके प्रवचन और शिविरों में भाग लेने के लिए युवावर्ग दौड़ा चला आता है, साथ काव्य सृजन और लेखन में जिनकी लेखनी सुप्रसिद्ध है, ऐसे मुनिवर के विविध लेख युवाओं की पहली पसन्द बनेंगे, ऐसी श्रद्धा है।

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