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मैं एकलवीर एकलव्य 

द्रोणाचार्य की पाठशाला में अलग-अलग राजकुमारों ने युद्धकला आदि अनेक प्रकार की विद्याएँ प्राप्त की थी। अमुक्त और करमुक्त ऐसे शस्त्रों की कला सभी राजकुमारों ने सीखी थी। भीम और दुर्योधन गदा युद्ध में प्रवीण हुए थे। महापराक्रमी अर्जुन अस्त्र और शस्त्र के उपरांत राधावेध जैसी कला में भी पारंगत हुआ था। कर्ण ने भी बहुत सारी कलाएँ सीखी थी।

 

द्रोणाचार्य को भी अपने से सवाया धनुर्धर बन जाये वैसा अर्जुन मिल जाने पर खुशी का ठिकाना नहीं था। उन्होंने अपनी तमाम शक्ति को उसके पीछे लगाने का संकल्प कर दिया था। अर्जुन की ग्रहण शक्ति से भी बढ़कर उसकी गुरुभक्ति से प्रभावित होकर द्रोणाचार्य उसे तैयार करने के लिए अतिशय उत्साहित हो गए थे। अर्जुन भी विश्वश्रेष्ठ धनुर्धर बन गया था। 

 

एक दिन की बात है। विद्यादान की छुट्टी के कारण अर्जुन अपने धनुष को लेकर पुष्पकरंडक नाम के उद्यान में क्रीड़ा करने के लिए गया। वहाँ अनेकविध क्रीड़ाएँ करते-करते वह स्वतंत्र विहार कर रहा था। आगे चलते हुए एक दृश्य को देखकर उसके आश्चर्य की कोई सीमा नहीं रही थी। उसने एक ऐसे कुत्ते को देखा कि जिसके मुँह को बाणों से भर दिया गया था।

 

अर्जुन सोचने लगा कि भौंकने की आवाज से परेशान करने वाले ने इस कुत्ते को किसने इस तरह तीर मारकर चुप कर दिया होगा? यह तो गजब की धनुर्कला है। ऐसा अद्वितीय धनुर्धर इस उपवन में और कौन हो सकता है? आगे चलते हुए उसने एक युवक को देखा। उसके हाथ में धनुष आदि को देखकर उसने अनुमान कर लिया कि उस कुत्ते को चुप करने वाला यही व्यक्ति लगता है। 

 

भद्र ! तुम कौन हो? तुम्हारे विद्यागुरु कौन हैं? तुम कहाँ रहते हो?

 

तब मैंने जवाब दिया, यहीं इस उपवन के समीप रूद्रपल्ली नामक एक गाँव है। उसमें हिरण्यधनुष नाम का एक पल्लीपति रहता है। मैं उनका पुत्र एकलव्य हूँ।  शस्त्रविद्या में निपुण अजोड़ धनुर्धारी अर्जुन जिनका शिष्य है, वे द्रोणाचार्य मेरे गुरु हैं।

 

मेरे यह वचन सुनकर अर्जुन उदास हो गया। वह वहाँ से वापस द्रोणाचार्य के पास आया और खिन्न वदन से गुरु को नमस्कार किया। अपने प्रिय शिष्य अर्जुन का मुख निस्तेज देखकर पूछा। 

 

वत्स ! आज तू इतना उदास क्यों दिख रहा है। क्या किसी ने तेरा अपमान किया है?

 

अर्जुन ने कहा : गुरुदेव आपके अलावा मेरा तिरस्कार करने में कौन समर्थ है? सिंह का पराभव सिंह के अलावा कौन कर सकता है? परंतु आपका वचन मिथ्या साबित हुआ है। क्योंकि आपने तो मुझसे भी बढ़कर एक ऐसा शिष्य तैयार किया है, तो आपने मुझे अजोड़ धनुर्धर बनाने का जो वचन दिया था उसका क्या अर्थ है? अर्जुन ने विस्तार से सारी बात बताई तब द्रोणाचार्य ने स्पष्टता करते हुए कहा, ‘वत्स! तुझसे बढ़कर मेरा कोई शिष्य नहीं है। और तू जो बातें कर रहा है, उसे तो मैं पहचानता भी नहीं हूँ।

 

अर्जुन द्रोणाचार्य को उस उद्यान की ओर ले गया। वे दोनों एक जगह पर छुपकर देखने लगे। उस समय मैं (एकलव्य) मेरी अपनी अनेकविध निशानेबाजी खेल रहा था। मैं अकेला ही बोलता रहता था, ‘गुरुजी! अब मैं क्या करूँ ? आप ही बताओ। इस प्रकार धनुष को धारण करूँ ? इस प्रकार से लक्ष्य की और तीर चलाऊँ ? क्या करूँ ? आप ही मेरे सर्वस्व हैं। वंदे द्रौणं महागुरु…’ इत्यादि।

 

मेरे गुरुदेव (द्रोण) और अर्जुन तो यह दृश्य देखकर स्तब्ध रह गए। 

अर्जुन ने गुरुदेव को धीरे से कहा, कि देखिए, आप ही उसके गुरु हो ना?

इतने में मेरी नजर उन पर पड़ी, मैं तो उनको देखते ही उनकी तरफ दौड़ा। 

गुरुदेव पधारो… पधारो… मेरे प्राण, मेरे सर्वस्व… हर्षाश्रु से मैं द्रोण-गुरु के चरणों का प्रक्षालन करने लगा।

गुरु के प्रति का असाधारण बहुमान देखकर अर्जुन तो दंग रह गया वह मुझे नम्र अदा से – अनिमेष नजरों से देखता रहा। 

आश्चर्यचकित हुए द्रोणाचार्य ने मेरी पीठ थपथपायी और पूछा, ‘वत्स! यह विद्या तू कहाँ से सीखा? तेरे गुरु कौन हैं ?’

तब मैंने हँसते-हँसते कहाँ, ‘गुरुदेव! आपने ही तो मुझे यह विद्या सिखायी है।’

गुरुद्रोण बोले, ‘वत्स! तुम्हें धनुर्विद्या का शिक्षण मैंने कैसे और कब दिया? यह बात मुझे समझ में नहीं आई।

 

मैंने कहा, ‘गुरुदेव! जब कौरव-पांडव आपसे धनुर्विद्या सीख रहे थे, उस समय मैंने आपको सविनय प्रार्थना की थी कि, गुरुदेव! आप मुझे भी धनुर्विद्या का अभ्यास कराइये। उस समय जाति से भील होने के कारण, आपने मुझे धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया। मैं निराश हो गया। परंतु मैंने मन ही मन आपको ही गुरु के रूप में हृदय में स्थान दे दिया। मैंने सुंदर-सी एक कुटिया बनायी। और आपकी मिट्टी की प्रतिमा बनायी। कुटिया में उसका स्थापन किया। मेरे हृदय में और कुटीर में, दोनों जगह आपका स्थान है। जिसे कोई भी विचलित नहीं कर सकता है। बस, आपको ही नजर के समक्ष रखकर आपकी कृपा और मेरी श्रद्धा से स्वत: अभ्यास करता हूँ।

 

जब अजोड़ गुरुभक्ति और अविरत पुरुषार्थ, इन दोनों का जब सुयोग प्राप्त होता है तब, कल्पना बाहर के लाभ होते हैं।

 

(पदार्थ का हकीकत में सामने होना यह – objective reality,

पदार्थ का कल्पना सृष्टि में सर्जन करना यह – ideal reality कहलाता है।

दोनों ही reality से लक्ष्य को सिद्ध कर सकते हैं। कभी-कभी objective से भी ideal reality ज्यादा फल दे सकती है। जैसी जिसकी श्रद्धा!)

 

अर्जुन को तो प्रत्यक्ष द्रोण मिले थे। एकलव्य को कल्पना के द्रोण मिले थे। एकलव्य अर्जुन से आगे निकल गया। 

 

सच्चे भूत से जितना डर लगता है, उतना ही डर वृक्ष के साये में अथवा संध्या के समय पर, दूर से वृक्ष के ठूंठ में भूत की कल्पना से लगता है। दोनों में हार्ट फेल होने की समान संभावना है।

 

कोरोना से भी शायद कोरोना के डर से ज्यादा लोग मर गए होंगे।

 

कोरोना – objective reality है, और कोरोना की कल्पना ideal reality है। दोनों से लोग भय के भयानक साये में जी रहे हैं।)

 

मुझे द्रोणाचार्य ने शिष्य के रूप में कभी भी स्वीकार नहीं किया। केवल एक पक्षी तरह से मैंने द्रोण को गुरु के रूप में स्वीकारा है। उनकी गुरुमूर्ति के रूप में प्रतिष्ठा की, उस मूर्ति में मुझे जीवंत गुरु दिखते थे, और उनके पास से बाणविद्या के लिए मैंने निरंतर प्रेरणा ली।

 

इस तरह करते-करते मैं अर्जुन से सवाया गुरुभक्त बन गया था। और उसी के कारण, जब गुरुद्रोण ने, मुझे अर्जुन से सवाया धनुर्धर बनने से रोकने के लिए मुझसे गुरु दक्षिणा में दाहिने हाथ का अंगूठा माँगा, तब हर्ष से गद्गदित होकर मैंने कहा, “ओ उपकारी गुरुदेव! अंगूठा ही क्यों? पूरा सिर काटकर गुरु दक्षिणा में दे दूँ, तो भी मैं आपके ऋण से मुक्त नहीं हो पाऊँगा। आदेश कीजिए!”

 

यह तन विष की वेलड़ी, गुरु अमृत की खान।

शीश दिए जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान।।

 

….और खच्च करके, क्षण का भी विचार किए बिना मैंने दाहिने हाथ का अंगूठा काटकर दे दिया। धरती पर टप…टप…टप… खून टपकने लगा।

 

उस समय आकाशस्थ देवों ने गुरुद्रोण को शर्म… शर्म… की पुकार से सम्मानित (?) किया और मुझ पर पुष्पों की वृष्टि करके मेरा सम्मान किया।

 

कीचड़ में सिर्फ कीड़े ही पैदा नहीं होते, कमल भी उसी में ही पैदा होता है। उसी तरह भील कुल में जन्म लेने वाले मुझमें भी गुरु के प्रति का इतना समर्पणभाव था, कि जिसमें शीश उतार कर देने में भी कोई हिचकिचाहट नहीं थी, जो उच्च कुल के खून में भी शायद हर जगह देखने को नहीं मिलेगा…!

 

देवों के द्वारा हुई पुष्पवृष्टि को देखकर गुरु द्रोण का मस्तक लज्जा के कारण झुक गया, और भारी आदर और वात्सल्यपूर्वक उन्होंने मुझे गले से लगा लिया, और कहा, “वत्स! मुझे बहुत कठिन फर्ज निभाना पड़ा, और तुझे इस मुश्किल कसौटी से गुजरना पड़ा।

 

धन्य है तुझे ! मैं तुझे अंतःकरण से आशीर्वाद देता हूँ कि बिना अंगूठे के भी तू तेरी सिद्धहस्त धनुष कला में पारंगत बना रहेगा।”

 

याद रहे, ‘एकलव्य वास्तव में एकलवीर था’ आज भी जगत मुझे इसी प्रकार याद करता है। इसमें गुरुभक्ति और गुरुकृपा ही महत्वपूर्ण है।

 

शिष्य के हृदय में गुरु का स्थान हो वह शिष्य भाग्यशाली होता है,

परंतु गुरु के ह्रदय में शिष्य का स्थान हो तो वह शिष्य परम सौभाग्यशाली होता है।

 

अब आप किसकी सराहना करोगे? अर्जुन की या एकलव्य की?

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authors@faithbook.in

जिनकी कलम से नित्य नए विषयों पर विचारों का उन्मेष सतत होता रहा है, आमन्त्रण पत्रिका से लेकर पुस्तकों तक जिनकी रंगीन कलम एक खास विशेषता रखती है, ऐसे पू. आचार्य भगवन्त महाभारत की कथा की रसपूर्ण थाली आपके लिए लाए हैं। इनकी कथा वर्णन की शैली अत्यन्त अद्भुत है, और यह कॉलम अत्यन्त लोकप्रिय बनेगा, ऐसा पूर्ण विश्वास है।

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