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मैं राजनीतिज्ञ कृष्ण

मैं कृष्ण हूँ मैं महाभारत के युद्ध का महासूत्रधार था, रामायण के राम की तरह ही उस समय मैंने सबसे सफल योद्धा के रूप में काम किया। परंतु मुझे पता था कि सेना को एक अच्छे योद्धा की नहीं पर अच्छे मार्गदर्शक की जरूरत है।

 

राम के पास लक्ष्मण, हनुमान, सुग्रीव आदि धुरंधर योद्धा थे, तो मेरे पास तत्कालीन श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन तथा गदाधारी भीम जैसे अनेक महान योद्धाओं की सेना थी।

 

जब दुर्योधन और अर्जुन एक साथ मेरे पास मांगने आये, तब दुर्योधन ने मेरी सेना मांगी और अर्जुन ने मेरी – खुद की मांग की। साथ-साथ कुरुवंश के तत्कालीन बड़े बुजुर्ग भीष्म के समक्ष मैंने एलान किया था कि, युद्ध में मैं शस्त्र नहीं उठाऊंगा। मैं तो सिर्फ सारथी की भूमिका अदा करूंगा। और वास्तव में मैं सारथी की तरह केवल युद्ध में ही नहीं; अर्जुन के रथ की लगाम के साथ-साथ अर्जुन की भावनाओं की लगाम भी मेरे हाथ में रखकर पांडवों को विजयपथ पर ले गया।

 

जरूरत पड़ी तब गीता का उपदेश देकर अर्जुन के मन में जो ग्लानि का उद्भव हुआ था; उसे दूर किया। तो साथ ही मौके पर कर्ण के ब्रह्मास्त्र को (एकाघ्नी शक्ति) घटोत्कच की ओर मोड़ दिया। और युद्ध के पलड़े को पांडवों की और झुका भी दिया। सभी जानते थे कि मेरे मार्गदर्शन के बिना भीम, द्रोण तथा कर्ण जैसे शूरवीरों से भरी हुई दुर्योधन की विशालकाय सेना को हराना पांड़वो के लिए आसान नहीं था। 

 

मुझे यह कहना है कि सच्चा लीड़र वह नहीं होता जो अकेला सफलता प्राप्त करे। सच्चा लीड़र वह होता है जो सभी को साथ लेकर सफलता सिद्ध करता है। जो अपनी सफलता को सभी के साथ बाँट सकता हो। अस्तु।

 

महाभारत की कथा के केंद्र बिंदु के समान मेरे इर्द-गिर्द चारों और सारे पात्र वर्तुलाकार में घूम रहे हों सी प्रतीति आपके मन पर हुए बिना नहीं रहती है।

 

मेरी माता देवकी थी और पिता वसुदेव थे। वसुदेव के पुत्र होने के कारण मैं वासुदेव कहलाया गया।

 

हर एक उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी के काल में चौबीस तीर्थंकर होते हैं। उसी तरह नौ वासुदेव, नौ प्रतिवासुदेव और नौ बलदेव भी होते हैंमैं इस अवसर्पिणी का आखिरी वासुदेव था। वासुदेव के बड़े भाई को बलदेव कहते हैं। बलराम आखिरी बलदेव थे, और जरासंखिरी प्रतिवासुदेव था

 

सा नियम है कि प्रतिवासुदेव द्वारा प्राप्त किया हुआ सर्व साम्राज्य-संपत्ति आदि को प्रतिवासुदेव को जीतकर वासुदेव प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार से तीन खंडों का साम्राज्य जो जरासंने प्राप्त किया था, उसे जीतकर मैंने हासिल कर लिया, इसलिए मैं तीन खंडों का मालिक कृष्ण-वासुदेव कहलाया गया।

 

जो पक्का राजनीतिज्ञ हो और उसके साथ-साथ जो धर्मात्मा हो, वो कैसा होगा? वह आपको जानना हो तो महाभारत के मेरे पात्र को देख लेना।

 

धर्मात्मा को राजनीति खेलनी पड़े तब वह, हो सके तब तक युद्ध को टालने के लिए जितने संभव हो उतने उपायो को आजमाये बिना नहीं रहता । और फिर भी यदि युद्ध छिड़ जाये तो काया से कठोरता से युद्ध करने पर भी मन से तो उसकी हेयता का ही जाप करता है।

 

पांड़वो की ओर से दूत बनकर जब मैं धृतराष्ट्र और दुर्योधनादि की राज्यसभा में आया तब मैंने कौरवों कोहुत धैर्यपूर्वक पांडवों के साथ समाधान कर लेने के लिए समझाया था। आखिर में पांच पांड़वो को केवल पांच गांव देने की बात करके युद्ध को टालने की ही मेरी भावना थी। पर दुर्भाग्य से दुर्योधन पांच गांव देने के लिए भी सहमत नहीं हुआ। उसने कहा कि सूई की नोक जितनी भी भूमि नहीं मिलेगी, जो पाना हो उसे युद्ध के मैदान में ले सकते हो।

 

दुर्योधन के इस युद्धज्वर को देखकर मैं उसकी राजसभा छोड़कर निकल गया, फिर भी युद्धनिवारण के प्रयत्नों को नहीं छोड़ा।

 

मुझे रथ तक विदा करने आये हुए लोग जब वापस गये तब मैंने कर्ण का हाथ पकड़कर मेरे साथ रथ में बिठा दिया, क्योंकि मुझे पता था कि कौरवों का मूल्य कर्ण के कारण से ही है। यदि उसे हटा दिया जाये तो कौरव बिना एक के शून्य बन जायेंगे। इसलिए कर्ण को जो अज्ञात थी वैसी बातें मैंने की, लालच भी दिया। वो राधेय नहीं है पर कौन्तेय है, सूत नहीं पर क्षत्रिय है, पांडव है। युधिष्ठिर से भी बड़ा होने से राज्य का प्रथम अधिकारी है। बहुत सारी रहस्यभूत बातें की। कर्ण भी यह सब सुनकर आश्चर्यचकित हो गया। पर मैं उसे कौरवपक्ष से बाहर नहीं निकाल सका।

 

कर्ण अत्यंत कृतज्ञ था। जिस राधा ने उसे छोटे-से बड़ा किया, जिस दुर्योधन ने उसे अंगराज बनाया, जिगरी दोस्त बनाया, उनके प्रति कृतघ्न बनना तो कर्ण के लिए स्वप्न में भी संभव नहीं था। इसीलिए युद्ध करने के प्रयास में मैं दूसरी बार भी निष्फल हुआ।

 

हाँ ! मेरा मन करुणा से भी ज्यादा करुण था। युद्ध ना हो इसलिए, क्योंकि मैं धर्मात्मा था। प्रभु नेम का भक्त था, सम्यगदृष्टि था। 

 

पर जब विपक्ष को (कौरवों को) युद्ध के सिवाय दूसरा कुछ चाहिेए ही नहीं था, तब मेरा मन कठोर से भी कठोर हो गया। क्योंकि जिस तरह मैं धर्म-मर्मज्ञ था वैसे ही राजनीतिज्ञ भी था। बेशक, इस राजनीति में भी प्रजा को दुष्टों की ड़ियों तले रौंदने से बचाने की धर्मनीति गंभीरता से मेरी अंतरात्मा में पड़ी ही थी। पवित्र प्रजा का निकंदन तो नहीं ही निकलना चाहिये। उन पर दुष्टों का आधिपत्य बिलकुल इच्छनीय नहीं हैसा हुआ तो प्रजा अपनी पवित्रता खो बैठेगी और उससे धर्मपुरुषार्थ खत्म हो जायेगा और योग्य आत्माओं की भी मोक्षप्रवृत्ति और मोक्षप्राप्ति मुश्किल बन जायेगी। ये सब टिकाये रखने के लिए प्रजा या समाज को अच्छा नेता या राजा मिलना ही चाहिये।

 

दुर्योधन के युद्धज्वर के कारण मैं युद्ध को नहीं टाल सका तब मुझ धर्मात्मा को भी राजनीति का आश्रय लेना ही पड़ा। और वह युद्ध के आखरी दिन तक रहा।

 

दुर्योधन फरार होकर तालाब में जाकर छिप गया तो उसका पीछा करके उसे खत्म करवा दिया। उसके लिए भीम से जाँघ के ऊपर गदा मार देने की अनीति का संकेत भी मैंने ही किया था।

 

एक बार हार-जीत से ही निर्णय लेने का फैसला ले लिया, तो अब उसके खातिर जो कुछ भी करना पड़े – कूड़, कपट, मृषावचन वह सब कुछ कर गुजरना सोच लिया था। उसमें दया को, संदिग्धता को, असमंजस को कोई स्थान कभी भी नहीं देना है, यह मेरी राजनीति थी।

 

हाँ, उन सारी बातों में मेरे खुद के स्वार्थ की कहीं भी कोई बात नहीं थी। सिर्फ प्रजा से दुष्टों का आधिपत्य हटाकर सत्पुरुषों के आधिपत्य को स्थापन करने की ही बात थी।

 

यह मेरी निःस्पृहता कहो या मानसिकता, युद्ध की हवा में भी धर्म की – धर्मात्मा की छवि प्रकाशित हो रही थी।

 

बाकी, युद्ध तो युद्ध; संहार तो संहार ही है। कर्मों के बंधन की कथा के सिवा वहाँ और क्या देखने को मिलेगा?

 

राजनीति में चाणक्य को बहुत पीछे छोड़ दे; सा मेरा पात्र है। दूरदर्शिता इतनी गूढ़ थी कि सामान्य इंसान सम ही नहीं पाये।

 

धर्मक्षेत्र और राजक्षेत्र दोनों भिन्न-भिन्न क्षेत्र हैं। पहले में तमाचा मारने वाले के सामने दूसरा तमाचा खाने के लिए गाल आगे कर देने की बात है। जबकि दूसरे में तमाचे का जवाब तमाचे से ही देना चाहिये ऐसी स्पष्टत मान्यता है। मैं इन दोनों क्षेत्रों का संपूर्ण जानकार था। कूड़-कपट के सामने सरलता दिखाने की धर्मनीति को मैंने राजनीति के क्षेत्रमें दाखिल नहीं होने दी थी। बल्कि बहुत ही सख्ती से वैसे ही दांव खेलकर कूड़-कपट के दाँव को निष्फल बनाने की विशिष्ट (राज) नीति मेरे पास थी।

 

हाँ, धर्मात्मा के रूप का मेरा दूसरा स्वरूप भी अभिनंदनीय और अनुमोदना है, वह अब पार्ट-२ में बताऊंगा।

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जिनकी कलम से नित्य नए विषयों पर विचारों का उन्मेष सतत होता रहा है, आमन्त्रण पत्रिका से लेकर पुस्तकों तक जिनकी रंगीन कलम एक खास विशेषता रखती है, ऐसे पू. आचार्य भगवन्त महाभारत की कथा की रसपूर्ण थाली आपके लिए लाए हैं। इनकी कथा वर्णन की शैली अत्यन्त अद्भुत है, और यह कॉलम अत्यन्त लोकप्रिय बनेगा, ऐसा पूर्ण विश्वास है।

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