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शुद्धि और सिद्धि का उपाय

अहो ! आज हम अरिहंत बनने के सफर के 14 वें मुकाम पर पहुँच चुके हैं। और आज जिस मुकाम पर
खड़े हैं उसका नाम है – तप पद।

 

तपस्या और जीवदया ये दोनों ही जैनियों की पहचान है। हमारा धर्म महान क्यों है? क्योंकि इसमें दो ही
बातों पर अधिक जोर डाला गया है, खुद पर नियंत्रण करो, और दूसरों पर अनुग्रह करो।

 

यूँ देखें तो खुद पर नियंत्रण करना भी एक बहुत बड़ी जीवदया है, और दूसरी ओर दूसरों पर अनुग्रह
करना अपने आपमें एक बहुत बड़ी तपस्या है। आइए इन दोनों ही बातों को जरा गौर से जानें।

 

क्रोध में आकर हमें दूसरे को पीड़ा देने का मन हो जाता है। यदि ऐसे समय में खुद पर नियंत्रण रखा तो
वह तपस्या भी हुई और जीवदया भी।

 

रास्ते से गुजरते वक्त यदि कुछ अभक्ष्य खाने-पीने का मन हो गया। लेकिन उस समय नियंत्रण रखा तो
यह तपस्या भी की, और उस खाने-पीने में रहे हुए जीवों की रक्षा भी की।

 

जब हम उपवास करते हैं, भूखे रहते हैं, तो अपने आप शरीर शांत हो जाता है, शरीर की धातुएँ निर्मल
हो जाती हैं। शरीर के शांत होने के साथ ही मन भी शांत होता है, आत्मा निर्मल हो जाती है। सारे दोषों
और दुर्गुणों की जन्मभूमि शैतानी मन है। जब हम उपवास करते हैं, तो शैतान मन में से भाग जाता है
और मन में देवता का वास हो जाता है, मन ईश्वर का मंदिर बन जाता है। और ईश्वर कभी भी औरों को
पीड़ा नहीं देते। तो देखो तपस्या करते-करते जीवदया भी अपने आप हो गई।

 

इस बार कोरोना की नागचूड़ में पूरा देश फँसा है। फिर भी आश्चर्य की बात देखें, पूरे भारत में इस बार
कम से कम 2000 तपस्वियों ने सामूहिक वर्षीतप की आराधना की है। उसमें अकेले सूरत (गुजरात) शहर
में ही 700 तपस्वी आज के इस दूभर समय में उच्च भावना के साथ तपस्या कर रहे हैं। यह सब
जिनशासन की बलिहारी है।

 

 

कईं प्रसंग है इन तपस्वियों के बारे में। उनमें से एक प्रसंग जानते हैं:

 

" गुरुदेव ! परिवार से छिपकर आयंबिल की ओली करने में पाप लगता है ? " गुरुदेव पूज्यपाद भुवनभानु
सूरीश्वरजी महाराजा के पास एक श्राविका बहन ने आकर यह प्रश्न पूछा, और अपनी परिस्थिति का बयान किया।

 

" मुझसे आयंबिल मस्ती से हो रहे हैं। परिवार की पूरी जिम्मेदारी बड़े खयाल से निभाती हूँ। फिर भी मेरे
पति मुझे तपस्या की अनुज्ञा नहीं देते। एक दिन आयंबिल करती हूँ, और उनको पता चलता है, तो
जबर्दस्ती मुँह में कच्चा पानी डालकर तप तुड़वा कर ही रहते हैं।

 

" ओली करना और परिवार को पता न चले, यह कैसे संभव है ? " गुरुदेव ने पूछा।

 

" मैं सब कुछ सम्भाल लूंगी। पर आप इतना बता दीजिए कि क्या इसमें कोई पाप तो नहीं लगेगा ना ?

 

" तुम्हारी परिस्थिति ही ऐसी है, तो तुम्हें पाप नहीं लगेगा। " गुरुदेव ने उन्हें आज्ञा दे दी।

 

और फिर अहमदाबाद में कालुशी की पोल में रहने वाली उस श्राविका दमयंती बहन ने वर्धमान तप की
100 ओली अपने पति से और परिवार से छुपकर की। जब 100वीं ओली का पारणा नजदीक था तब
अपने पति को हकीकत बताई। और पति फूट-फूटकर रो पड़ा। उसके पैरों में गिरकर बोला,

 

"मुझसे बहुत बड़ा पाप हो गया। तू पत्नी नहीं, देवी है। तेरे तप से ही मेरी उन्नति है।

 

" दुःखिओं के दुःख और पापियों के पाप दोनों को मूल से काटने की क्षमता तपस्या में है। जरूरत है थोड़ा धैर्य रखने की।

 

तप से तन, मन और जीवन की शुद्धि होती है। दुःखों और दोषों का क्षय होता है। कर्म और कषाय का
उच्छेद होता है। पाप, ताप और संताप का नाश होता है। शुद्धि और सिद्धि मिलती है। ऋद्धि और
लब्धि प्राप्त होती है। ऐसा कुछ भी नहीं जो तप से प्राप्त नहीं हो सकता हो। ऐसी कोई भी समस्या नहीं,
जो तपस्या से सुलझ न सकती हो। इसीलिए तपस्या कीजिए और गुनगुनाइये यह गीत…

 

॥ तप पद ॥
(हूँ मीरा हूँ राधिका…)

 

 

तप से होता काय का कषाय का दमन,

तप से मन का है शमन, मिले अमन चमन;

तप बनाये आत्मा को अमल, तप का प्रकृति पे भी अमल है सबल…

 

 

तारे हजार यहाँ आस-पास हैं,
सैकड़ों फूलों की भी बरसात है;
कुछ तो यहाँ खास है, हाँ तपस्वी साथ है,
उनकी सेवा में यह प्रकृति का अवतरण,
ना कहीं विषाद है, दुःख की ना ही बात है,
है प्रकाश और सुवासमय पूरा चमन;
जिसके बल से ना जला था द्वारिका नगर,
देव भी करें तपस्वी की बड़ी कदर… तप…१॥

 

 

भोग की पुकार से बधिर है जहां,
ईन्द्रियों की तृप्ति की ये मिजबानियाँ;
फिर भी प्यास ना छिपी, किन्तु बढ़ती ही चली,
कैसे होगी दूर अब ये हैरानियाँ;
कोई आ के बोल दे, तप का द्वार खोल दे;
तंग कर गई मुझे परेशानियाँ;
तप का आचरण करूँगा भोग रोक कर;
हौसला है तप की राह पर बढ़ें कदम… तप…२॥

 

About the Author /

authors@faithbook.in

शास्त्रबोध, संवेदनशीलता और शीघ्र-कवित्व का व्यक्तित्व धारण करने वाले मुनिवर ने, भगवान बनने का राजमार्ग, अर्थात् वीसस्थानक पर नूतन काव्यों की रचना की और साथ उनकी ऐसी विवेचना की जो युवा हृदय को छू सके।

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