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श्रावक का गुणवैभव

5 गुण

 

संघ के श्रावक बनने के लिए पांच गुण अति आवश्यक हैं।

 

ज्ञान – वर्षों की दैनिक साधना के बाद तत्त्वज्ञान की गहराई प्राप्त हो जानी चाहिये।

 

वैराग्य – नाम आदि दुन्यवी प्रलोभन के प्रति वैराग्य भाव होना चाहिये।

 

अध्यात्म – आत्मा के भीतर में उतरा हुआ होना चाहिये, भीतर से आध्यात्मिक परिणति की स्पर्शना होनी चाहिये।

 

समर्पण- गुरु को सर पर रखकर, सब कुछ उनके मार्गदर्शन के मुताबिक करता होना चाहिये। 

 

शासनराग – तन, मन, वचन और जीवन में अविहड़ (अटूट) शासन राग होना चाहिये। जिनशासन को यथाशक्ति अनुसरण होता जीवन होना चाहिये। मन का कोन-कोना जिनशासन की सेवा से रंगा होना चाहिये और  रक्त की बूंद-बूंद में जिनशासन का ग्रुप होना चाहिये।

 

वस्तुपाल में ये सारे गुण थे। और इसीलिए वे संघ की सच्ची सेवा कर सके थे। जिसमें ये गुण ना हो, वह व्यक्तिगत अपमान को नहीं सह सकता, जिसमें ये गुण नहीं होंगे, वह नाम और पद की संपूर्ण स्पृहा नहीं छोड़ सकता, जिसमें ये गुण नहीं होंगे, वे अपने अहं को अखंड रखने के लिए संघ को खंडित कर देंगे, जिनमें ये गुण नहीं होंगे, वे अपने कषायों की गंदगी से संघ की गरिमा को मलिन कर देंगे। 

 

गुण परिणति 

 

वस्तुपाल की गुणपरिणति इस दूसरे श्लोक से भी प्रकट होती है।

 

 

स्वामिन! रैवतकाद्रीसुन्दरदरी-कोणप्रणीताऽऽसन:,

प्रत्याहार मनोहरं मुकुलयन् , कल्लोललोलं मन:।

त्वां चन्द्रांशुमरीचि चन्द्ररुचिरं, साक्षादिवाऽऽलोकयन्,

सम्पद्येय कदा चिदात्मकपरा-ऽऽनन्दोर्मिसंवर्मितम्? ।।

 

 

स्वामिन् !

 

कब वो दिन आयेगा, कि गिरनार की सुंदर गुफा के एक कोने में मैं पालथी लगाकर बैठा हुआ होगा, विषयवृत्ति शून्य होगी, चंचल मन बिलकुल समझदार और सयाना बन गया होगा ?

कब आयेगा ऐसा दिन !…

जब चंद्रकिरण और कपूर जैसे उज्ज्वल और सुंदर…. आप जैसे साक्षात् दिखाई दे रहे होंगे।

कब आयेगा ऐसा दिन !…

जब ज्ञानानंद की मस्ती मेरे मन को पूरी तरह से चिपक गई होगी ! 

 

गुणस्थान क्रमारोह ग्रंथ में भी मंत्रीश्वर के ये श्लोक देखने को मिलते हैं। 

इस श्लोक के दो अर्थ हैं 

 

(1) छंदोबद्ध रचना, (2) यश। 

 

मंत्रीश्वर के ये श्लोक उनकी रचना भी है, और यशपताका भी है।

 

साधना की प्यास, संसार का वैराग्य, शासन का राग, आत्मरस, अध्यात्म प्रेम, वैभव की अनासक्ति आदि गुण इस श्लोक में नजर से नहीं हटते।

 

गुण शून्य अस्तित्व इस पद का और खुद का उपहास है। 

 

Q. मुझे समझ में नहीं आता कि किस तरह पद के लिए फॉर्म भर सकते हैं ? 

 

Q. पद के लिए किस तरह हाथ-पैर मार सकते हैं? 

 

Q. किस तरह Election में खड़े रह सकते हैं

 

Q. और कौनसा मुँह लेकर चुनाव का प्रचार कर सकते हैं

 

Q. पद की लालसा वाले लोग संघ की क्या सेवा करेंगे ? 

 

Q. जिनको जिनशासन की कोई भी समझ नहीं है, वे शासन का क्या विकास लेंगे ? 

 

Q. जिनके अंतर में कषाय का तांडव चलता हो, वे शासन समर्पण कैसे दिखा सकेंगे ? 

 

यद्यपि सारे पदाधिकारी ऐसे नहीं होते, पर योग्यता बहुत कम लोगों में होती है।

 

क्या करें इस परिस्थिति में? पदाधिकारियों के सामने मोर्चा निकालें? अंदर-अंदर लड़-झगड़ कर आहूति दे दें? पदाधिकारियों को बिन माँगे उपदेश देने जायें? या फिर अंधों को आईना दिखाने की कोशिश करें? पक्के घड़े पर काँठा नहीं लगता !

 

PLAN- 0 to 16 

 

मुझे ऐसा लगता है कि इस रास्ते से सफलता मिलने की संभावना बहुत कम है, लेकिन नुकसान होने की संभावना ज्यादा है। क्या करना चाहिये? कच्चे घड़े पर मेहनत करनी चाहिये। जो आने वाले कल में पदाधिकारी बनने वाले हैं, उनके लिए कमर कस के काम करना चाहिये। हमारे पास ऐसी व्यवस्था होनी चाहिये कि जिससे नवजात बालक को भी, अथवा जो अभी जन्मा भी नहीं है, उसे भी अविहड़ शासन राग में डुबोना चालू कर दिया जाये। तत्त्वज्ञान, कथा, उदाहरण, चित्र, अभ्यासक्रम, परीक्षाएं, प्रोजेक्ट्स, प्रैक्टिकल्स आदि के द्वारा यह प्रशिक्षण अविरत चलता रहे‌।‌‌‍‍‌ ऐसा 0 से 16 वर्ष तक का पूरा सिलेबस होना चाहिये, जो आचार, विचार, ज्ञान, परिणति, शासन राग, समर्पण हर तरह से श्रेष्ठ कक्षा के व्यक्तित्व का निर्माण करे।

 

आने वाले कल में उनमें से ही साधु-साध्वीजी, आचार्य, पदस्थ और गच्छाधिपति बनेंगे। उनमें से ही संघ और संस्थाओं के पदाधिकारी बनेंगे। उनमें से ही विविध कार्यकर्ता बनेंगे। उनमें से ही भविष्य के परिवारों के मुखिया बनेंगे और पूरे संघ का नक्शा बदल देंगे।

 

हमारी बहुत सारी निष्फलताओं का मूल यह है कि, हमारे पास दीर्घदृष्टि पूर्वक आयोजन नहीं है। लोग बीमार होते रहते हैं, हम दवाई करते रहते हैं। दो-पांच लोगों को अच्छा हो जाये तो हो जाये, बाकी के मरते रहते हैं। हमने कितनी दवाइयाँ की, उसका ढिंढोरा हम पीटते रहते हैं। पर यह बीमारी आती कहाँ से है? बीमारी आये ही नहीं, उसके लिए क्या करना चाहिये? इस दिशा में हमारी दृष्टि जाती ही नहीं है।

 

0 से 16 वर्ष तक के सिलेबस के लिए संघ Maximum समय और संपत्ति का हिस्सा अगर दे तो, 

 

यह योगदान जिनशासन के प्रत्येक क्षेत्र में पहुँचेगा, 

 

यह योगदान जिनशासन की सभी समस्याओं को जड़ से उखाड़ कर फेंक देगा। 

 

इस योगदान से संघ की बेटियाँ संघ में ही रहेगी। 

 

इस योगदान से संघ के बेटे, संघ के ही बेटे रहेंगे। 

 

इस योगदान से पांचवें आरे में चौथा आरा प्रवर्तेगा। 

 

इस योगदान से भारत में महाविदेह का समवसरण होगा। 

 

इस योगदान की जब फसल उगेगी तब जिस दृश्य का सृजन होगा, उसे देखकर हमारी आंखों में आनंद के अश्रु आ जाएंगे।

About the Author /

authors@faithbook.in

जिन्होंने अनेक धर्म-सम्प्रदायों के ग्रन्थ एवं पुस्तकों का गहन अध्ययन किया, और वर्तमान के विद्वानों में जो पहली पंक्ति में बैठते, ऐसे तीव्र मेधावी मुनिवर की विविध विषयों की यह लेखमाला मात्र प्रौढ़ या प्रबुद्ध वर्ग को ही नहीं बल्कि युवाओं को भी आकर्षित करेगी। Life को Change करने वाले लेख जीवन को नई दिशा देंगे।

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