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संघ मेरा स्वामी

श्रावक

 

श्रावक मतलब क्याँ? जिसके लिए ‘जैन’ बेटा बन गया और बेटा जैन बन गया हो उसका नाम श्रावक।

 

‘जैन’ मात्र बेटा बन जाये यानी परम स्वजन बन जाये। सारे वाद-विवाद-फसाद-अहं आदि का अंत हो
जाए। बेटा जैन बन जाए तो पुत्र भी परिवार का पोषण भी पुत्रादि के रूप में नहीं पर साधार्मिक के रूप
में हो जाये। संसारनीति-मोह-आसक्ति-यह सभी का अंत हो जाये। पत्नी में पत्नी ना दिखे, साधर्मिक
दिखे। मां-बाप में साधर्मिक दिखे, बेटे में बेटा ना दिखे, साधार्मिक दिखे।

 

पंचसूत्र कहता है_

 

एवं खु तप्पालणे वि धम्मो, जह अन्नपालणे त्ति।

 

यदि आपमें इतनी दृष्टि आ जाये और परिवार को धर्म में जौड़कर आप उनका साधर्मिक के रूप में पालन
करो तो जिस तरह दूसरों का पालन यह धर्म है। उस तरह उनका पालन करो, यह भी धर्म है।

 

बात इतनी ही है – ‘जैन’ बेटा बन जाये और बेटा ‘जैन’ बन जाये। एक Basic श्रावक बनने के लिए
इससे ज्यादा कुछ भी जरूरी नहीं होता है।

 

वस्तुपाल के पास यह परिणति थी। स्वामित्वाभिमान शून्य था, इसलिए ही संघपति पद उन्हें परेशान
कर रहाँ था। पूरा वातावरण गंभीर हो गया था। एक तरफ यह पद के लिए वोही लायक है, ऐसा सभी को
लगता था, और दूसरी तरफ वस्तुपाल की व्यथा देखी नहीं जा रही थी। वस्तुपाल की अश्रुधारा रुक नहीं
रही थी।

 

मैं आपको पूछता हूँ – संघ संवेदना से हम कब भावित हुए? ‘मेरे भगवान का संघ ऐसी ममता हमें कब
जगी? हम कोहिनूर हीरे के साथ कंकर जैसा बर्ताव कर रहे हैं, ऐसा नहीं लगता है? हम भावना शून्य-जड़
हो गए हैं, ऐसा नहीं लगता है? क्यों संघ का नाम पड़ते ही हमारे रोम-रोम पुलकित नहीं हो जाते हैं?
क्यों हम इतने शुष्क और उदासीन है?
वस्तुपालचरित्त में स्पष्ट कहाँ है,

 

जिनेन्द्रान्न परो देव: सुसाधोर्न परो गुरु:।

न सड्घ़ादपरं क्षेत्रं, पुण्यमस्ति जगत्त्रये।।

 

तीनोलोक में जिनेन्द्र से बड़े कोई देव नहीं है।
सुसाधु से बड़े कोई गुरु नहीं है, और संघ से ज्यादा पवित्र कोई भी क्षेत्र नहीं है।

 

दुनिया की श्रेष्ठ से श्रेष्ठ कंपनी हो, जिसमें किया गया investment अवश्य दस गुना होकर रिर्टन
मिलता हो। उससे भी ज्यादा श्रेष्ठ कंपनी हमें संघ लगे तो हम सच्चे जैन हैं। विश्व के टॉप 10 श्रीमंतो
से भी हमें हमारे संघ के bottom ten जैन more VIP लगे, विश्व के सभी देशों के P.M. से भी हमारा
एक फटेहाल श्रावक ज्यादा आदरणीय लगे, हमारे दामाद से भी एक साधर्मिक ज्यादा मूल्यवान मेहमान
लगे तो हम सच्चे जैन है।

 

वस्तुपाल मंत्री थे। महामंत्री थे। बहुत युद्ध जीते थे, करोड़ों सोनामोहरों के मालिक थे, इसलिए उनका
चरित्र नहीं लिखा गया। वह सच्चे जैन थे, इसलिए उनका चरित्र लिखा गया है।संघपति पद में उन्हें
संघ की आशातना नजर आती थी। स्वामित्वाभिमान को उन्होंने किस हद तक कुचल डाला होगा, उसकी
कल्पना कीजिये।

 

संघ के लिए सब कुछ कर गुजरना, संघ के लिए प्राणों की आहूति देने तक सज्ज रहना, संघ के लिए
लाखों और करोड़ों सोनामहोरे पानी की तरह बहाना, और ऊपर से जैसे कुछ किया ही ना हो, और संघ ही
मेरा परम उपकारी है, ऐसा आचरण करना, क्याँ यह आसान बात है?

 

अहम

 

प्राप्त हुए संघ को आपकी आत्मा के लिए सफल बनाना हो तो आपके स्वामित्वभिमान को चूर चूर कर
दो। गौतमस्वामी जैसे अंदर-बाहर से भरे हुए थे, पर तो भी कितने विनीत और नम्र थे। हमारे पास तो
उनके जैसा बाह्य-ऐश्वर्य भी नहीं है और आंतरिक गुण भी नहीं है। तो भी हम अहम नहीं छोड़ सकते हैं,
क्याँ यह, जेब खाली और दमाम भारी जैसी दशा नहीं है?

 

अहम् – यह आत्मा के ऊपर का अणुबोम्ब है।
अहम् – यह परलोक के लिए परमाणुबोम्ब है।
अहम् – यह आराधना के ऊपर ए.के.47 का प्रहार है।
अहम् – यह सद् गति का सत्यानाश है।
अहम् – यह मोक्ष की मौत है।

 

याद आती है अष्टावक् गीता-
यदा नाऽहं तदा मोक्षो, यदाऽहं बंधनं तदा।

 

जब अहम् नहीं है, तब मोक्ष है।
जब अहम् है, तब बंधन है।

 

अहम् के विसर्जन में हमें अपना विसर्जन हुआ लगता है। पर हकीकत अलग है, अहम् अलग है और
हमारी जात अलग है। अहम् हम नहीं है, अहम् हमारा मित्र भी नहीं है, अहम् हमारा दुश्मन है‌। अहं
पुष्ट होता है, तब हम कृश होते है। अहं बढ़ता है, तब हम घटते हैं। अहं की आंगी होती है, तब हमें
खरोचे आती है। अहं गद्दीनशीन होता है, तब हम पदभ्रष्ट होते हैं। अहं की प्रतिष्ठा होती है, तब हमारा
उत्थापन होता है। अहं की अंजनशलाका होती है, तब हमारी आँखें फूट जाती है। अहं Enter होता है, तब
हमारी Exit हो जाती, है। अहं को उसकी खुराक मिलती है, तब हम भूखमरा सहन करते है। अहं गटागट
करता है, तब हम प्यासे मरते है। अहं को गुदगुदी होती है, तब हमारी जान पर बन आती है। अहं कमाई
कर लेता है, तब हम लूट जाते है। अहं का Growth होता है, तब हमारा Downfall हो जाता है। अहं
Healthy हो जाता है, तब हमें कोरोना हो जाता है।

 

अहं रे अहं तू, जो जाये मरी,
फिर मेरे में बाकी रहे हरि।

 

मार दो अहं को, पटक दो अहं को, उखाड़ दो अहं को, फेंक दो अहं को।

 

यह अहं ही है, जो हर तरह से सता रहा है। यह अहं ही है जो शासन के स्वर्णिम स्वप्नों को साकार होने
से रोक रहा है। यह अहं ही है, जो बाहर लड़ने की Emergency है, तब अंदर में लड़ा रहा है। यह अहं
ही है, जो लव जेहादियों को खुला मैदान दे रहाँ है। यह अहं ही है, जो जोखिम में पड़े हुए तीर्थों के लिए
फुरसत नहीं दे रहा है। यह अहं ही है, जिससे संघ में फाटफूट पड़ती है। यह अहं ही है जिससे संस्थाओं
टूट जाती है। यह अहं ही है, जिससे हमारे ही फूट जाते है। यह अहं ही है, जो संघ का नूर लूट जाता है।
यह अहं ही हैं जो रचनात्मक कार्यो को तोड़-मरोड़ देता है।

 

जिनशासन का शत्रु भी यही है-अहम्, संघ का शत्रु भी यही है-अहम्, आत्मा का शत्रु भी यही है-अहम्।
वैसे देखा जाये तो हमें अनंत बार शासन मिला है। पर हम शासन को ना मिल सके। शासन हमें मिले,
यह संयोग की बात होती है, हम शासन को मिले, यह साधना की बात होती है। संयोग कर्माधीन होता है,
साधना आत्माधीन होती है। आप के घर पर कोई आ जाये, यह आपके आधीन बात नहीं है, पर आपको
उसे मिलना है या नहीं, यह आपके अधीन है। आप आपकी रूम का दरवाजा खोलेंगे ही नहीं,

 

आप रूम के बाहर ही ना आओ, तो आप उनको नहीं मिलोगे। शासन तो हमारे घर अनंत बार आया। पर अहं उसे नहीं
मिले। हम हमारे अहं की रूम में घुसे रहे, उसे तो हम कैसे छोड़ सकते है ?

 

हमारे घर महावीरस्वामी आये, हमारे घर गौतमस्वामी आये, हमारे घर सुधर्मास्वामी आये, हमारे घर
केवलज्ञानी आये, हमारे घर चौदहपूर्वी आये, हमारे घर पैंतालीस आगम के जीवंत ज्ञानभंडार परम संयमी
गुरुभगवंत पधारे… हमारी राह देख देखकर वापस सिधारे, हम हमारे अहं के कमरे से बाहर ना निकल
सके।

 

अहं तीर्थंकर…अहं गणधर…

अहं पूर्वधर…अहं आगमधर

 

बिलकुल गलत थियरी पर पूरे गलत practicals करके हम अनंत पुण्य से मिले हुए अवसर को हार गये
और इस भव में भी शायद यही भूल का पुनरावर्तन हो रहा है।

 

हमें डर लगता है। यदि मैं अहं के कमरे से निकल गया तो मेरा क्याँ होगा? हम यह नहीं समझ सकते
कि कल्याण के सिवा और कुछ भी नहीं होनेवाला है।

 

वस्तुपाल अहं के कमरे से निकल गये थे। संघपति बिरुद लेते हुए उनका अंतर कचौट रहाँ था। उस
समय पर गुरु भगवंत कहते हैं – वस्तुपाल! आप संघपति शब्द के अर्थ को समझे ही नहीं है। इसलिए
ऐसी परेशानी हुई है। संघ का पति = संघपति इस तरह तत्पुरुष समास करने से – संघपति यानी संघ का
स्वामी, संघ का मालिक ऐसा मतलब समझ में आता है। पर यहाँ बहुव्रीहि समास करना है, संघ है पति
जिसका वह = संघपति यानी की आप संघ के मालिक नहीं, संघ आपका मालिक। यह सुनकर वस्तुपाल
को आनंद हो गया।

About the Author /

authors@faithbook.in

जिन्होंने अनेक धर्म-सम्प्रदायों के ग्रन्थ एवं पुस्तकों का गहन अध्ययन किया, और वर्तमान के विद्वानों में जो पहली पंक्ति में बैठते, ऐसे तीव्र मेधावी मुनिवर की विविध विषयों की यह लेखमाला मात्र प्रौढ़ या प्रबुद्ध वर्ग को ही नहीं बल्कि युवाओं को भी आकर्षित करेगी। Life को Change करने वाले लेख जीवन को नई दिशा देंगे।

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