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सत्य ध्रुव है

प्रभु महावीर ‘सत्’ को जीने वाले थे। ‘सत्’ उनका जीवन-दर्शन था।

 

सत् का अर्थ है सत्य, और सत्य का अर्थ है ध्रुव।

 

जो ध्रुव नहीं है, वह पारमार्थिक सत्य भी नहीं है।

 

वह मात्र व्यावहारिक सत्य है….।

 

व्यवस्था संचालन के लिए व्यावहारिक सत्य आवश्यक है।

 

पारमार्थिक सत्य का व्यवस्था अथवा आवश्यकता के साथ कोई संबंध नहीं है।

 

सत्य मुक्त होता है।

 

जो मुक्त नहीं है, वह स्यात् असत्य है।

 

देवलोक से च्यवन करने के एक क्षण पूर्व प्रभु के मानस-मंडल पर क्या विचार आये होंगे? हम जैसे घटना-प्रेमी के मन में ऐसी उत्सुकता का प्रकट होना सहज है। परंतु, प्रश्न यह उठता है कि क्या प्रभु भी घटना-प्रेमी हैं?

 

प्रभु तो वह हैं, जो कि अघटित है।

 

अघटित को घटना के प्रति कैसी उत्सुकता? आकाश को बादलों के लिए भला कैसा आश्चर्य? होता भी है तो वह केवल औचित्य ही होता है।

 

औचित्य घटना नहीं है। घटनाओं के बीच से सम्पूर्ण रूप से अलिप्त प्रवेश करने की कला का नाम औचित्य है। औत्सुक्य घटनाओं से प्रभावित होने की नादानी है।

 

प्रभु का जीव अनुपम औचित्य का धनी है।

 

क्षणार्ध के बाद ही च्यवन होने वाला है।

 

यह च्यवन एक घटना है।

 

घटना कल्याणक नहीं बनती।

 

घटना घटते हुए भी चेतना का अघटित होना ही कल्याणक बनता है। इतनी सामर्थ्यवान् होती है प्रभु की चेतना।

 

इसलिए प्रभु के साथ घटने वाली घटना के पीछे कल्याणक शब्द प्रयुक्त होता है।

 

प्रभु की घटना-मुक्त चेतना के अभिवादन में घटनाकाल में प्रकृति समस्त विश्व को रोमांचित करने वाला स्वागत-कृत्य करती है। परंतु, इस तीन लोक में होने वाली अलौकिक घटना से प्रभु जी अलिप्त रहते हैं। क्योंकि, प्रभु तो स्वयं प्रकाश हैं। प्रकाश को भला कौन चकाचौंध कर सकता है?

 

प्रभु जानते हैं कि च्यवन होगा। च्यवन के बाद क्या-क्या घटित होगा, यह भी प्रभु जानते हैं। उपरांत प्रभु को वंदन-प्रणाम करने के लिए इन्द्रादिक देव भी आयेंगे, यह भी देवलोक से च्यवन करने से पूर्व प्रभु का जीव जानता है।

 

एक भगवान के रूप में अवतरण हो रहा है, यह खबर है उन्हें। स्वयं जिस देवलोक में हैं, वहां के देव-देवेन्द्र मेरू पर्वत पर अभिषेक करेंगे, इससे भी वह अनभिज्ञ नहीं हैं। इन सारी घटनात्मक जानकारियों से इस देव के अंतस्थल में खास निस्बत नहीं है।

 

निश्चल अस्तित्व को कितनी भी सुन्दर घटनाओं की चादर चढ़ा दो, वह क्षणिक है। इसका समय पूरा होते यह नामशेष हो जाती है। प्रभु इस प्रकार की चलायमान घटनाओं से बनने वाले नहीं हैं।

वस्तुतः जानने योग्य घटना तो यह है कि प्रभु बनते नहीं हैं। प्रभु होते हैं। निश्चल अस्तित्व घटना नहीं, अघटित सत्य है….। प्रभु सत्य को जीने वाले होते हैं।

इस सत्य में ही प्रभु की प्रभुता है।

घटना को आकार प्रदान कर देने वाली शक्ति प्रभुता नहीं है। अपितु, विविध आकारों के बीच निराकार बने रहने का वैशिष्ट्य प्रभुता है।

प्रभु का साधनाकाल मात्र दीक्षा लेने के उपरांत का ही नहीं था। वह तो च्यवन से पूर्व ही सिद्ध साधक थे।

दीक्षा के उपरांत प्रभु की साधनाओं को समझने के लिए दीक्षा, जन्म व च्यवन से पूर्व प्रभु की आंतर विश्व की भूमिका को समझना आवश्यक है। क्योंकि, प्रव्रज्या भी इस भूमिका से ही उठी है।

प्रभु की उपयोगात्मक साधना का अनुभव किये बिना उनकी योगात्मक साधना का मूल्यांकन करना प्रभु के लोकोत्तर स्वरूप का अवमूल्यन होगा।

प्रभु महावीर की योगात्मक साधना प्रभु पार्श्वनाथ की योगात्मक साधना से अधिक थी। प्रभु महावीर की साधना साढ़े बारह वर्ष तक चली थी, जबकि प्रभु पार्श्वनाथ की साधना 83 दिन में ही पूर्णता को प्राप्त कर गई।

किसको महान् कहा जायेगा?

कालगणना महानता का मापदण्ड नहीं है।

क्रियात्मक योगोद्वहन एक घटना है।

जो घटनातीत है, अघटित है, त्रिकाल है, ध्रुव है, निरंतर है; ऐसी शुद्ध निजताएं जो एकाकार हो जाती हैं, और फिर उसी स्वरूप में सदा रहते हैं, वह एक समान महान् होते हैं। उसमें कोई भेद नहीं रह जाता।

इस प्रकार चौबीस तीर्थंकर भगवंतों की साधना-पद्धति एवं साधना-काल में भेद हो सकता है, परंतु सभी चौबीस तीर्थंकरों की पूजनीयता में कोई भेद नहीं रहता।

प्रयत्न की निरंतरता से प्राप्ति की उपलब्धि होती है, यह भौतिक जगत का मान्य नियम है। परंतु, आध्यात्मिक जगत में ऐसा नहीं है। यहां पर बाह्य रूप से किये गये प्रयत्नों का कोई औचित्य नहीं। इससे आंतरिक प्राप्ति में कोई फर्क नहीं पड़ता। यहां मात्र समानता है, पूर्णता है।

हां, यह अलग बात है कि उपकार और निकटता के संबंध में प्रभु महावीर के प्रति पूज्यता का भाव स्वतः स्फुरित होता है। परंतु सभी तीर्थंकर भगवंतों की पूजनीयता समान है।

प्रभु महावीर के जीवन के माध्यम से हमें सभी तीर्थंकरों की साधना के एक केन्द्रित आयाम और आम्नाय को पहिचानना है।

इससे एक बात निश्चित हो जाती है कि साधना के बाह्य परिबलों की संख्या भले ही असंख्य है, परिवर्तनशील है, परंतु आंतरिक परिबल सभी का एक समान व सुनिश्चित है।

अनंत तीर्थंकर भगवंत इस आंतरिक परिबल की बिना अर्थ-भेद देशना प्रदान करते हैं। इसमें शब्द-भेद संभव है, क्यों कि ये बाह्य परिबल हैं।

कल्पसूत्र का एक सूत्र है- चइस्सामित्ति जाणइ, चयमाणे न जाणइ, चुएमित्ति जाणइ। बहुत से भाग्यशालियों ने इन शब्दों का श्रवण किया होगा। इनका सामान्य अर्थ है-

प्रभु देवभव के अंतिम क्षणों में ‘मेरा च्यवन होगा’, यह जानते थे। ‘मेरा च्यवन हो रहा है’, यह नहीं जानते थे, किन्तु ‘मेरा च्यवन हो गया है’, यह जानते थे।

यह सामान्य अर्थ है, जिसका गूढार्थ श्रोताओं की समझ में नहीं आता है। परंतु इसमें प्रभु की साधक-भूमिका का उत्कृष्ट चित्र उपस्थित होता है।

अवधिज्ञान से पौद्गलिक घटनाओं का ज्ञान होता है। परंतु यह घटना यदि अनेक समय की है, तो पौद्गलिक घटना भी अवधिज्ञान से नहीं जाना जा सकता है।

देवभव से च्यवन करने वाले प्रभु च्यवन के पूर्व, च्यवन के समय और च्यवन के उपरांत भी अखण्ड अवधिज्ञान के धारक होते हैं।

च्यवन के समय की घटना से प्रभु को कोई प्रयोजन नहीं, परंतु घटना के समय जो अघटित है, वही प्रभु का प्रभुत्व है। प्रभु भूत, भविष्य और वर्तमान को जानना, न जानना, इन सब से परे अविचल प्रतिष्ठित हैं।

‘मैं च्यवन कर रहा हूं’, यह जानते हुए भी हृदय में कोई उथल-पुथल नहीं, कोई हर्ष नहीं, कोई उद्वेग भी नहीं। मात्र जानते हैं, वह भी इसलिए कि ज्ञान होता है।

‘मैं च्यवन कर रहा हूं’, यह जानते हुए भी कोई व्याकुलता नहीं। कुछ छूट रहा है, उसकी विह्वलता नहीं। नहीं जानते हैं, वह भी इसलिए कि ज्ञान नहीं हो रहा है।

‘मेरा च्यवन हो चुका है’, यह जान कर कोई कठिनता या उत्सुकता नहीं। अनुकूलता या प्रतिकूलता का भी अनुभव नहीं करते। मात्र जानते हैं, क्योंकि ज्ञान हो रहा है।

इन तीनों घटनाओं में जानना और न जानना, दोनों स्थितियां हैं।

प्रभु इनमें से किसी में भी नहीं हैं। तो फिर प्रभु कहां हैं?

जानना, न जानना, ऐसा साक्षी रूप में जानना है। प्रभु इस ज्ञान स्वरूप में एकाकार होते हैं।

अवधिज्ञान में घटना जानते या नहीं जानते, उससे जागृति का कोई प्रश्न नहीं उठता। उस क्षण (जब च्यवन हो रहा है), तब प्रभु अजाग्रत अवस्था में हैं। ऐसा आरोप क्या कोई ज्ञानी पुरूष प्रभु के ऊपर लगा सकता है? नहीं। क्योंकि जागृति का संबंध जानने या न जानने से नहीं, अनुभव के साथ है। प्रभु घटना को केवल जानते हैं, अनुभव तो स्वरूप का करना है। उसी प्रकार जब घटना को वे नहीं जानते, तब भी अनुभव तो स्वरूप का ही करते है।

प्रभु सदैव जागृत रहते थे। हां, तब भी जब एक समय में वे च्यवन कर रहे होते हैं, वे अपने अस्तित्व में लीन थे।

हम कितने पामर जन्तु हैं कि सूक्ष्म घटनाओं को नहीं जानते हुए भी केवल घटनाओं को जीते हैं। असत् में जीते हैं।

प्रभु सत् को जीते हैं। सत् अर्थात् ध्रुव—-।

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बाल्यकाल में दीक्षा लेने के पश्चात् ज्ञान-ध्यान की अलख जगाई और वर्तमान में युवावस्था होने पर भी जिनका हृदय अध्यात्म से सराबोर है, ऐसे पू. पंन्यास भगवन्त प्रभु वीर की साधना को मात्र उपसर्ग या परिषह सहन करने की सहिष्णुता में ही नहीं देखते, बल्कि इस साधनाकाल के भीतर गहराई में जाकर हमें भी साधना का स्पर्श करवाएँगे।यह लेखमाला अध्यात्म रसिकों के लिए अमृत भोजन की भूमिका निभाएगी, ऐसी आशा है।

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