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 सद्बुद्धि से सन्मार्ग की प्राप्ति, सन्मार्ग से सद्गति की प्राप्ति

संस्कृत का एक सुंदर सुभाषित है ।

 

विपत्तिकाले समुत्थाने, बुद्धिर्यस्य न हीयते ।

स एव दुर्गतिं तराति, जलस्थो वानरो यथा ।।

 

इस सुभाषित का कथा वस्तु इस तरह :

 

एक बंदर जब दरिया में तैर रहा था, तब एक मगरमच्छ ने अचानक आकर पैर से पकड़कर मुँह में ले लिया । बंदर तैरते-तैरते अटक गया । कंधे पर बैठे बंदर ने पूछा… क्या हुआ! तैरते हुए रूक क्यों गया ?

 

यह सुनकर पहले बंदर ने कहा… एक मगर लकड़े को पकड़कर यह समझ रहा है की बंदर को पकड़ लिया… यह भ्रम है इसलिए तैरते हुए अटक गया हूँ… और कोई कारण नहीं…

 

मगरमच्छ ने जब यह बात सुनी तो उसे लगा, “सचमुच बंदर का पैर न पकड़कर लकडे के टुकडे को पकड़ा है” ऐसा सोचते ही उसने बंदर के पैर को छोड़ दिया… और बंदर वहाँ से तैरता हुआ चला गया ।

 

दुःख के अवसर पर कैसे एक बंदर ने अपनी विवेक बुद्धि का उपयोग करके, समता रखके, मौत के मुँह से बच निकला ।

 

सुभाषित का शब्दार्थ इस प्रकार है :

 

विपत्ति काल में जब दुःख का अवसर आता है तो जिसकी बुद्धि नाश न हो, अथवा भ्रष्ट न हो वो ही दुर्गति=दुःख अवस्था को पार कर जाता है ।

 

इस सुभाषित का प्रथम संदेश :

 

दुःख में धीर बनो… हीन नहि…अर्थात् दुःख में सद्बुद्धि को स्थिर रखो । जो दुःख के अवसर पर बुद्धि को समतोल रखे, बावरे नहीं बनते, स्वस्थ रह सके, उन्हें ही सन्मार्ग=सुंदर उपाय मिल सकता है और उसी से वे दुर्गति=दुःखी अवस्था को तैर जाते है । यह बात ध्यान में रखना के दुःखी अवस्था को तरना मतलब दुःख मुक्त होना, अथवा दुःख में समाधियुक्त होना, कर्मो के उदय से दुःख आ सकते है… पर उन दुःखो को दूर करने के लिए… जो-जो योग्य उपाय करने से… वो… दुख से मुक्त हो सकते हैं । कदाचित निकाचित कर्म के उदय से दुःख की मुक्ति न हो पर अभ्यंतर उपाय – धर्म आराधना से दुःख समाधियुक्त हो ही सकता है ।

 

सामान्य से संसारी जीव दुःख आने पर सद्बुद्धि खो बैठते है, खो (भटक) जाते है, जैसे तैसे उपाय आज़माते है, और इसी की वज़ह से और दुःखी हो जाते है । बुद्धि भ्रष्ट होने से दुःख को दूर करने के लिए गलत – खराब उपाय आज़माते है, हो सकता है, क्षणभर के लिए कुछ समय तक दुःख से दूर हो जाए पर… इस कर्मबंधन की वजह से भविष्य में नए-नए दुःखों का सर्जन होता है । हमेशा के लिए दुःख से मुक्त होना हो तो अभ्यंतर उपाय के स्वरूप में धर्म आराधना को जीवन में अपनाना चाहिए ।

In Short : दुःख के अवसर पर –

 

सद्बुद्धि से सन्मार्ग – सुंदर उपाय की प्राप्ति और सन्मार्ग से सद्गति=दुःखरहित सुखमय अवस्था अथवा दुःख में समाधियुक्त अवस्था की प्राप्ति ।

 

महादरिया में छोटी सी लाइफ एक नाव है… चारो और जलराशि है… दृष्टी की मर्यादा से सिर्फ पान ही पानी है । नाव में 70 दिन तक रहनेवाले इंसान की बात है… नाम… लेनु ल्युइस झेम्टोरी… महादरिया में इतने दिन रहने का विश्व रिकॉर्ड है । 70 घंटे भी रहना पड़े… उस कल्पना से ही हम घबरा जाते है… दिन में गोरी चमड़ी को जला दे वैसी सूर्य किरणें… और रात को हड्डीया थरथराये ऐसी ठंडी… ओढने के लिए कुछ भी नहीं… इतना ही नहीं… कभी भी सागर में तूफान का आना… Unbroken… ल्यूइस… विश्व में सबसे दृढ-संकल्पी के लिए प्रसिद्ध हुए… पर जब भी भयंकर तूफान आया, क्षणभर के लिए जब उन्होंने हार मानी… तब उन्हे परमात्मा की याद आई… उन्होंने प्रार्थना की हे परमात्मा! आप ने जो रास्ता दिखाया उसे ही अपना जीवना का पथ बनाऊँगा… मुझे बचा लिजिए…

 

ल्यूइस की इस प्रार्थना से, तूफान रातभर में थम गया । पार उतर गया ।

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प्राचीन साहित्यों में तीन चीजों को रत्न की उपमा दी गई है, जल, अन्न और सुभाषित। इनमें से सुभाषित रत्न का जगमगाता प्रकाश पू. मुनि भगवन्त हमारे समक्ष लेखमाला के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। संस्कृत से संस्कृति का सन्देश देने वाला यह लेख युवावर्ग बड़े चाव से पढ़ेगा।

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