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Blood Group : See Positive

एक गिलास में थोड़ा पानी डालकर गुरु ने दो शिष्यों को बुलाया, और पूछा कि इसमें क्या दिखता है?

एक शिष्य ने कहाँ, ‘गुरुजी! यह गिलास आधा खाली है।’ 

दूसरे शिष्य ने उत्तर दिया, ‘गुरुजी! यह गिलास आधा भरा हुआ!’ 

 

यह प्रसंग तो अत्यंत प्रसिद्ध है, पर :

 

“Unity” के एक-एक अक्षर की व्याख्या में आज ‘N’ की व्याख्या समझनी है। 

संघ, शासन, समुदाय, समाज, संस्था में जो अत्यंत महत्व की अँकुड़ी (कड़ी) साबित हो जाये ऐसी बात हमें यह ‘N’ बताता है। 

 

N for No Negativity. 

 

दृश्य एक का एक ही हो, पर नजरिया बदल जाये तो नजारा बदल जाता है। 

 

दृश्य, संगीत, चित्र, रसोई, संबंध, घटना आदि ऐसी चीजें है कि आप उसे किस तरह से समझते हैं? किस तरह उसका मूल्यांकन करते हैं? उसी के ऊपर उसका आधार रहता है। 

 

व्यक्ति की अपनी पॉजिटिविटी ही उसे हर जगह आनंद का अनुभव करवाती है, और व्यक्ति की अपनी नेगेटिविटी ही उसे सभी में आकुलता का अनुभव करवाती है। 

 

For Ex., मित्र ने बाहर जाने के लिए गाड़ी माँगी, तब यदि मन नेगेटिविटी से घिरा होगा तो यह विचार आयेगा कि, “कैसा आदमी है ये? माँगते हुए शर्म भी नहीं आती है?” पर मन यदि पॉजिटिविटी से भरा होगा तो विचार आयेगा कि, “कितना अच्छा का मित्र है, मैत्री बाँध ली है, इसलिए हक से माँग रहा है, मुझे पराया नहीं समझता है।”

 

आप के सकारात्मक विचार, शासन, संघ, समुदाय, समाज, संस्था आदि में प्रेम और प्रसन्नता का माहौल बनाते हैं। 

 

और नकारात्मक विचार आपको उद्वेग, निरुत्साह और हताशा में घसीटकर ले जाते हैं।

 

एक बात समझ लीजिए, 

गाँव होगा वहाँ कचरे का ढेर और गटर रहेगा ही,

गेहूँ की बोरी में कंकर भी रहेंगे ही। 

 

पर,

 

जो व्यक्ति आबू हिल पर जाकर यदि वहाँ की गंदगी को देखकर वापस आयेगा वह मूर्ख कहलायेगा, वहाँ तो देरासरो की नक्काशी देखनी होती है। 

 

गेहूँ साफ करने को बैठी हुई स्त्री को इतना अवश्य पता रहता है, कि गेहूँ रखने हैं, और कंकर निकालकर फेंकने हैं। इसलिए वह नजर में आये हुए कंकर का संग्रह नहीं करती, बल्कि फेंक देती है। 

 

अब हम अपने खुद के विचारों का एनालिसिस करते हैं, कि हमारे विचार, हमारा दृष्टिकोण कैसा है?

 

संघ और शासन में हो रही घटनाओं में, या संघ और शासन की वर्तमान परिस्थिति में हमारा व्यू कैसा है? 

 

दानवीरों या सक्रिय शासन सेवकों के प्रति हमारा ऐंगल क्या है? 

 

भव्यातिभव्य अंजनशलाका और प्रतिष्ठा के महोत्सव, नूतन जिनालयों का निर्माण, बढ़ती जा रही दीक्षायें, उपधान, छ’री पालित संघ, नव्वाणुं, भव्य चातुर्मास, बड़ी संख्या में तपस्यायें, उनके महोत्सव, बड़ी पत्रिकायें, स्वामीवात्सल्य, सामैया वगैरह-वगैरह में आप को अनुमोदना का भाव जगता है, या ‘यह अयोग्य है’ ऐसा भाव जगता है?

 

भाग्यशाली !

 

वर्तमान में मिले हुए शासन की तुलना में भूतकाल के इतिहास को देखेंगे तो ऐसा लगेगा कि, हमें वर्तमान में जो शासन मिला है, वह बहुत भव्य ही है। क्योंकि,

 

पहले वर्ष में एक-दो अंजनशलाका या प्रतिष्ठा होती थी, अब रोज एक-दो होती है। (वर्ष में हो रही अंजनशलाका और प्रतिष्ठा की संख्या की एवरेज में समझना है।)

 

पहले वर्ष में 50 दीक्षायें भी नहीं होती थी, अब एक दिन में 50 दीक्षायें हो रही हैं। 

 

पहले अट्ठाई तप करने वाले अल्प संख्या में मिलते थे, और अब मासक्षमण करने वाले तपस्वी भी हजारों की संख्या में है।

 

पहले पतासे की प्रभावना करने वालों की वाह-वाही होती थी, और अब साधर्मिक भक्ति में विविध और विशिष्ट व्यंजनों से भक्ति की जाती है। 

 

पहले पूजायें भी कभी-कभी ही करायी जाती थी, अब भव्य महापूजन अद्भुत और ठाठ-बाठ से रचाये जाते हैं। 

 

ऐसे उदाहरण तो आप ढूंढोगे तो बहुत मिल जायेंगे। 

 

अब यह देखते है कि Negative को Positively कैसे ले सकते हैं?

 

पान मसाला, गुटखा खाने वाले व्यक्ति ने अट्ठाई की हो तो ऐसा नहीं बोलना चाहिये कि ,”ये तो पारणे के बाद फिर से खाने वाला ही है, धर्म का दिखावा करता है।“ पर ऐसा सोचना चाहिये कि हमेशा पान मसाला और गुटखा खाने वाले ने भी मन को मजबूत बनाया और अट्ठाई की। 

 

उपधान, नव्वाणुं, मासक्षमण जैसी बड़ी तपस्या के बाद उन लोगों को होटल पर रात को खाते हुए देखा तो – ऐसा नहीं सोचना चाहिये कि, ‘देखो ! धर्म के ढोंग को ! ऐसी बड़ी तपस्या करके बाहर रात को खा रहा है।“ तब ऐसा सोचना चाहिये कि “स्वाद का इतना शौकीन था, फिर भी तप किया।“

 

(अभी-अभी एक युवक को वर्धमान तप का पाया डालने की प्रेरणा की, तो उसने कहा कि, ‘साहेबजी! पाया तो डाल दूँ, पर बाद में मुझसे रात्रि भोजन का त्याग हमेशा के लिए नहीं हो सकेगा। बाद में लोग निंदा करेंगे, कुछ भी कहेंगे, इससे अच्छा है कि मैं करूँ ही नहीं।’)

 

बड़ी-बड़ी रकम लिखाने वालों के लिए ऐसा नहीं बोलना चाहिये कि “दो नंबर के रूपये हैं, क्या करेगा घर पर रखकर?” इसके बदले ऐसा सोचना चाहिये कि, “चाहे कितने भी रूपये हो, पर अच्छे काम में वापरने की भावना तो हुई! वरना पापकार्य में ये रूपये खर्च हो जाते।“

 

 देरासर-उपाश्रय में समय का योगदान देने वालों के लिए “ये लोग तो बिना काम-धंधे के बेकार हैं” ऐसा नहीं सोचना चाहिये, पर “समय है, तो संघ की कैसी अद्भुत सेवा करते हैं।” ऐसा सोचना चाहिये।

 

स्वामीवात्सल्य के आयोजन के समय पर ऐसा नहीं बोलना चाहिये कि “जिनके पेट भरे हुए है उनका भरकर क्या फायदा ?” पर ऐसा सोचना चाहिये कि, “वैसे तो ये साधर्मिक सामने से दिये गये दान को नहीं लेते, पर इसी बहाने सभी की भक्ति करने का लाभ मिलता है।”

 

(सत्य हकीकत यह है कि मीडिल क्लास या लोअर क्लास में जी रहे, बहुत से साधर्मिक ऐसे हैं कि जो कभी भी हाथ लंबा करके माँगते तो नहीं है, लेकिन उनके घर में कभी भी मिठाई नहीं आती है। ऐसे साधर्मिक परिवारों के मुँह से मैंने कानों कान सुना है कि हम सिर्फ स्वामीवात्सल्य में ही मिठाई खा पाते हैं। हमारे बच्चे स्वामीवात्सल्य होता है, उस दिन बहुत खुश हो जाते हैं।)

 

इसलिए,

 

मेरे प्यारो!

संघ के उज्ज्वल भविष्य के लिए, संघ के प्रभाव को मजबूत करने के लिए,

शासन की व्यवस्था को अखंडित रखने के लिए,

जो वर्तमान में हमें प्राप्त हुआ है, उसमें सकारात्मक दृष्टि रखने से अनेकोनेक लाभ हैं। 

 

और एक छोटा सा प्रसंग

 

श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि, ‘हस्तिनापुर में दुर्जन कितने हैं, यह ढूंढकर बताओ।’

और दुर्योधन से कहा कि, ‘हस्तिनापुर में सज्जन कितने हैं, यह ढूंढ़कर बताओ।;

शाम तक दोनों ने पूरा हस्तिनापुर छान मारा, और श्रीकृष्ण के पास आये। 

दोनों का जवाब ‘नहीं’ में था। 

 

युधिष्ठिर ने कहा कि, ‘मुझे कोई भी दुर्जन नहीं मिला।’

दुर्योधन ने कहा कि, ‘मुझे कोई भी सज्जन नहीं मिला।’

 

बस, मुझे इतना ही कहना है कि, आप ही तय कर लो, कि आपको क्या बनना है?

 

युधिष्ठिर या दुर्योधन ! 

 

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नेगेटिव थिंकर : पेड़ पर पत्थर मारेंगे तो ही पेड़ फल देता है।

पॉजिटिव थिंकर : पेड़ पर पत्थर मारते हैं, तो भी वो फल देता है।

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authors@faithbook.in

जिनके प्रवचन और शिविरों में भाग लेने के लिए युवावर्ग दौड़ा चला आता है, साथ काव्य सृजन और लेखन में जिनकी लेखनी सुप्रसिद्ध है, ऐसे मुनिवर के विविध लेख युवाओं की पहली पसन्द बनेंगे, ऐसी श्रद्धा है।

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