“पर्वाणि सन्ति प्रोक्तानि, बहुनि श्री जिनागमे ।

पर्युषणां समं नान्यत, कर्मणां मर्मभेदकृत् ।।“

 

भूमिका :- वर्षमें (सालमें) बारह मास होते है । प्राय: ऐसा कोई महिना नही जिसमें कोई पर्व न आता हो । पर्व आत्मा के परिणामों को ऊँचाई पर पहुँचाने वाला श्रेष्ठ आलंबन है । तीर्थस्थान पर जाने के बाद जैसे कितना भी लालच दे किंतु हम पाप प्रवृत्ति नही करते है वैसे पर्व के दिनों में भी हमें पाप से निवृत्ति लेनी चाहिए। आत्मा को सदा शुभ अध्यवसाय में रमण करने पर्व के दिनों में वह विशेष धर्मप्रवृत्ति करने का लक्ष रखना है ।

 

ज्ञानी भगवंतोने पर्युषण पर्व के पाँच कर्तव्य बताये है । कर्तव्य = फर्ज. जिसे अवश्य करना है उसे कर्तव्य कहते है ।

 

संसारी जीवों को सांसारीक कर्तव्यों में जितना इन्ट्रेस्ट है, उसके दसवें भाग का भी धर्म के कर्तव्यों में इन्ट्रेस्ट है क्यां ? बच्चो को व्यवहारिक शिक्षण देना, युवा होने के बाद उनकी शादी करवाना, उनको व्यवसाय में स्थापित करना, यह सब कार्य कंपलसरी और नेससरी लगते है, वैसे ही पर्व के कर्तव्यों का पालन भी कंपलसरी करना चाहिए । इस जिनशासन के प्रत्येक जैनी नें पर्व के दिनों में कर्तव्यों का पालन किया तो विश्व में बहोत सारे पापस्थान घट जाएगें ।

 

★ सब जैनीयों यदि अमारी प्रवर्तन करने लगे तो सबसे पहले हॉटेल, रेस्टाँरंट और झोमेटो, स्वीगी, फुडपांडा, उबेर इट्स आदि ऑनलाईन फुड डिलीवरी कंपनीओं को नुकसान होगा ।

 

★ सब जैनी अगर अपने साधर्मिक भाईयों को संभाले तो जो जैन गलत धंधा करके सलाखों के पिछे सड़ रहे है अथवा जो जैनी अशोभनीय कार्य कर रहे है ऐसे साधर्मिक को वक्त पर सहायता मिले तो वह ऐसा कार्य नही करेगे । उसके गलत काम बंद होंगे और वह अपना समय धर्म कार्य में व्यतित करेंगे ।

 

★ परस्पर मैत्री रखी जाए तो कितने ही कोर्ट के मामले रफादफा हो जाएगे । सर्वत्र आनंद छा जाएगा ।

 

★ उपवास, छट्ठ, अट्ठम ऐसी तपस्या करते रहे तो शरीर भी स्वस्थ रहता है । किसी बिमारी के चपेट में भी नही आते है । डॉक्टर, दवाई, क्लीनीक, हॉस्पिटल तथा सर्जरी वगैरे की जरूरत भी नही पडती है ।

 

★ अगर चैत्यपरिपाटी में मन लग जग जाए तो वर्ल्ड टुर पर होनेवाला व्यर्थ खर्चा और वेस्ट ऑफ टाईम भी बच जाएगा ।

 

★ पाँच कर्तव्यों के पालन से ऐसे भौतिक लाभ कई तरह के होते है और आध्यात्मिक लाभ का तो कोई पार ही नहीं है ।

 

1) अमारी प्रवर्तन :-

 

मारी = मारना अमारी = नही मारना ।

मारी = हिंसा अमारी = अहिंसा ।

 

इस जगत में कौन मरना चाहता है ? कोई भी नही । मक्खी गुड के पीछे, चींटी शक्कर के पीछे, सुअर विष्ठा के पीछे, गाय घास के पीछे, मानव पैसे के पीछे भाग रहा है । हर एक की वासना ( इच्छा ) भले ही अलग-अलग है किंतु हर जीव में जीने की कामना एक समान होती है । यही जीजीविषा है । मरना तो चींटी भी नहीं चाहती और मनुष्य भी । इस जगत में सबकी जीने की इच्छा समान है ।

 

श्री आचारांग सूत्र का एक सुंदर सूत्र है…

 

सव्वे जीवा न हंतव्वा ।। किसी भी जीव का हनन नही करना है ।

 

यह सूत्र भले ही साधु महात्माओं के लिए है किंतु गृहस्थों को हिंसा करने की छुट नहीं मिलती ।

 

त्रसजीवों की तो श्रावकों को भी हिंसा नहीं करनी है । स्थावर जीवों की भी यतना रखनी जरूरी है । अगर हम अपनी लाइफस्टाईल के साथ इस बात को जोड दे को कितने जीवों की विराधना से हम बच जाएंगे ।

 

याद आती है, तीन खंड के अधिपति श्री कृष्ण महाराज और 18 देश के महाराजा कुमारपाल । चातुर्मास के दिनों में जीवो की विराधना न हो इसलिए द्वारिका तथा पाटण के बाहर भी नहीं जाते थे । जगद्गुरु श्री हीरविजयसूरि महाराज के सत्संग से अहिंसक बनने वाले अकबर ने आजीवन मांसाहार का त्याग किया था । अपने राज्यमें छः महीने तक अमारी प्रवर्तन लागू कीया था और नये जीवों की हिंसा पर प्रतिबंध लागू किया था ।

 

योगशास्त्र में कलिकाल सर्वज्ञ श्री हेमचन्द्राचार्यजी ने हिंसा के त्याग से होनेवाले लाभ का वर्णन करते हुए कहा है ।

 

चित्त की प्रसन्नता बढ़ती है ।

रोगरहित काया मिलती है ।

सुंदर देह की प्राप्ति होती है ।

दीर्घ आयुष्य प्राप्त होता है ।

अनुकूल परिवार मिलता है ।

परलोक में सुख-सामग्री मिलती है ।

अंत में परमपद (मोक्ष) की प्राप्ति होती है ।

 

वर्तमान समय में जीवदया की बातों का महत्व नहीं रहा, ऐसे बोलने के पूर्व चिंतन करे ।

 

मुंबई में एक व्यक्ति की पत्नी पियर गई हुई थी, वह अकेला था । रात में जब वह सोने की फिराक में था तब उसे खटमल काटनें लगे, उससे यह सहन नहीं हुआ, रातभर लायटर लेकर ढुंढ-ढुंढ के खटमलों को खत्म किया । रातभर जागरण हुआ, सुबह जैसे ही पानी गरम करने के लिए गॅस शुरू किया तो सिलेंडर फट गया, उसका चेहरा जल गया, उसे हॉस्पीटल ले गए, सर्जरी भी की गई किंतु जीवनभर के लिए चेहरा विकृत हो गया । इस भव में की हुई हिंसा का फल इसी भव में मिला ।

 

पर्युषण के दिन शुरू हुए है। हर जैन का यह कर्तव्य है कि पाप के साधनों का उपयोग कम से कम हो। भूतकाल में इन दिनों में कपडे़ धोना, अनाज पिसना आदि कार्य नहीं होते थे । ज्यादा से ज्यादा समय धर्म की आराधना में समय व्यतीत करते थे ।

 

याद करो उन पूर्व के महापुरूषों को जिन्होंने एक जीव के प्राण बचाने के लिए अपने/खुद के प्राणों का बलिदान दे दिया।

 

आओ, इस वर्ष से हम यह पक्का वादा करते है की पर्युषण में जो कर्तव्य हम पालन करने वाले है वो हम आजीवन कर दे। जैसे पानी छानकर ही उपयोग में लेना है । गॅस-चुल्हा शुरू करने के पहले पुंजके लेना है। स्नान के लिए बैठने से पहले स्टुल को चेक कर लेना है । कपडे धोने के पहले जेब चेक करे (पैसो के लिए नही)। गाडी स्टार्ट करने से पहले व्हील के आसपास चेक करलो, कहीं कोई कुत्ते का पिल्ला तो नहीं है ।

 

यह वाक्य भूलना नहीं,

 

जो जीव को जीवन देता है उसे समाधि मिलती है, जो जीव को मौत देता है उसे मौत की परंपरा मिलती है ।

 

2. साधर्मिक भक्ति :-

 

जिनका धर्म समान होता है वो साधर्मिक कहलाते है । शास्त्र में साधर्मिक का महत्व लिखा है – “साधर्मिकना सगपण समु, अवर न सगपण कोय” जीव को अनंतकाल में अनेक बार माता / पिता / भाई / बहन / पत्नी / पुत्र के रूप में अन्य जीवों से संबंध प्राप्त हुए है । परंतु इन संबंधों के केन्द्र में स्वार्थ और ममत्व भाव था । साधर्मिक के साथ जो सगाई होती है उसके केन्द्र में धर्म और धर्म की आराधना होती है ।

 

स्व. पू. गच्छाधिपति श्री जयघोषसूरीश्वरजी महाराजजीने साधर्मिक वात्सल्य का महत्व बताते हुए कहा है की ‘एक बाजु सभी धर्म और दूसरी बाजू साधर्मिक वात्सल्य’.. तब साधर्मिक भक्ति का पलडा भारी होता है। इसका कारण क्या है ? ऐसा प्रश्न पूछने पर पूज्यश्री समाधान देते है, “जीव कीतनी भी पराकाष्ठा की साधना कर ले फिर भी सभी गुणों का अधिकारी नहीं बन सकता है, किसी भी जीव में इतनी शक्ति नहीं होती है कि वह सभी शुभ क्रिया की साधना कर सकें। किंतु वह साधर्मिक भक्ति कर ले तो उसकी आराधना, उसके गुण आत्मसात कर सकते है । श्री संघ रत्नों की खान है, सिद्धत्व का मूल है, अरिहंत का उत्पत्तिस्थान है, संघ में सभी गुण अवस्थित है, इसलिए खुद की आराधना को गौण कर श्री संघ की भक्ति करनी चाहिए ।”

 

वर्तमान, जगत में सबसे ज्यादा नुकसान साधर्मिक का हुआ है । नौकरी छुट गई, इनकमिंग बंद और आऊटगोइंग (खर्च) हो रहा है । 4 से 5 लोगो का परिवार हो, जरूरतें पूरी कर सके उतनी पूंजी न हो तब साधर्मिक क्या करेगा ? याद रखना एक साधर्मिक को उपर उठाने से केवल साधर्मिक ही उपर नही उठता बल्की धर्म भी उपर उठता है । क्योंकि धर्म का आधार संघ है, अगर संघ ही नहीं होगा तो धर्म कैसे बचेगा ।

 

आओ, पर्युषण पर्व के निमित्त से संभव हो उतनी साधर्मिक को सहायता करनी चाहिए । विवाह, बर्थ डे पार्टी, रीसेप्शन, गेट टु गेदर, पार्टी वगैरे में लाखों रूपयों का व्यय करनेवाले अमीर लोग अगर एक टका रकम वर्ष में साधर्मिक को दे तो मेरा मानना है निर्धन-दुःखी साधर्मिक ढुंढने से भी नही मिलेगा ।

1600854118792 3 medium3. क्षमापना :-

 

क्षमापना दो चीजे मांगती है, 1) विस्मरण 2) विसर्जन । याद रखना हमें क्रोध की भूल का विस्मरण नहीं करना है बल्की साथ ही विसर्जन भी करना है । क्योंकि विस्मरण में अभी तक मन के कंप्युटर में Feed है। जबकि विसर्जन में Delete हो जाता है।

 

मिच्छा मि दुक्कडम् मांगने / देने के बाद भी अपराध अपने स्मरणपथ में रहता है तो समजना क्षमापना हुई ही नहीं । बिल में रहा हुआ सांप बीन की आवाज सुनते ही बाहर आ जाता है। वैसे ही हमें निमित्त मिलते ही अपराध स्मरण में आ जाता है।

 

एक कहावत है, ‘अच्छी याददाश्त बड़ी ताकत है, किंतु भूल जाना ईश्वरीय वरदान है ।’

 

हमें कल की हुई गाथा याद नहीं रहती परंतु 10 साल पहले क्रोध में किसी ने गाली दी हो तो वह हमें याद रह जाती है।

 

किसी की भूल का मन में संग्रह करके रखते हो तो मन में इतना कचरा जमा करते हो, यदि शरीर में इतना कचरा जमा हो तो मौत नजदीक आ सकती है। और मनमें कचरा पड़ा हो तो दुर्गति नजदीक आ सकती है ।

 

एक दिन भी घर में झाडु नहीं लगाया तो घर गंदा हो जाता है, कपड़े में पानी रह जाए तो कपड़ा सड़ जाता है । वैसे हि मन में क्रोध रहा तो वैर में कन्वर्ट हुए बिना नहीं रहता ।

 

प्रश्न – क्रोध बड़ा या वैर ?

 

जवाब – एक दिन तक मन में रहे वह क्रोध, वर्षो तक मन में रहे वो वैर होता है ।

 

क्रोध सब्जी जैसा है, वैर मुरब्बा जैसा होता है । आज की सब्जी, ज्यादा से ज्यादा शाम तक चल सकती है, बाद में उसे गाय-कुत्ते को देनी पडती है । मुरब्बा तो सालभर चलता है । इस अपेक्षा से वैर, क्रोध से बढ़कर है । कमठ और अग्निशर्मा के जीवन में भव-भव से जो वैर चल रहा था उसके दुखद अंजाम उन्हे भूगतने पडे ।

 

एक महत्व की बात समझने जैसी है, वैर के मूल में क्रोध है तो क्रोध के मूल में अहंकार है । मनुष्य के अहंकार को चोट लगती है तब उसे क्रोध आता है ।

 

चंडकौशिक की आत्मा पूर्वभव में साधु थी, साधु बनने के पहले गरीब ब्राह्मण था । गर्भवती पत्नी को छोडकर कमाने के लिए परदेश निकला । रास्ते में विद्यासिद्ध पुरूष मिला, उसने इस ब्राह्मण को परस्त्री के साथ भोगसुख की व्यवस्था की। परंतु ब्राह्मण ने उस स्त्री को समझाकर वापस भेज दिया । उसने जैन धर्म अपनाया आगे जाकर दीक्षा ग्रहण की । दीक्षा के बाद एक बार उनके पैर के नीचे आकर मरे हुए मेंढक का प्रायश्चित करने के लिए बालमुनि ने कहा तब मुनि को क्रोध आया । क्रोध ही क्रोध में न करने जैसा काम कर बैठे । जिसने कंदर्प को जीत लिया था वो दर्प के आगे हार गये । बालमुनि द्वारा प्रायश्चित की बात से उनके अहं को चोट पहुंची । जिसका परिणाम क्रोध था । अंत में सर्प की योनि में अवतार लेना पडा ।

 

और एक अति महत्व की बात ।

 

पेट में से मल निकलता है तो आनंद होता है। पैर में से काँटा निकले तो आनंद मिलता है। आँख में से कचरा निकले तो आनंद मिलता है। गले से कफ निकलता है तो आनंद मिलता है। शरीर से कचरा निकल जाए तो आनंद मिलता है। ठीक वैसे ही हृदय से क्रोध और वैर निकल जाए तो कितना आनंद प्राप्त हो सकता है? ।

 

आओ, इस वर्षे में संवत्सरी प्रतिक्रमण करने से पूर्व अंतर को कषायों से साफ कर सच्चे अर्थ में संवत्सरी प्रतिक्रमण की आराधना करें ।

 

4. अट्ठम तप :-

 

अनादिकाल से आत्मा का कर्म के साथ संयोग है । उसे तोडने का श्रेष्ठ उपाय है ‘तप’ ।

 

तत्त्वार्थ सूत्र कहता है “तपसा निर्जरा च।”

तप से कर्मनिर्जरा होती है । सर्व कर्म का क्षय होने पर आत्मा मोक्ष में जाती है ।

 

मैले शरीर को शुद्ध करने के लिए जैसे स्नान करते है वैसे कर्म से मलीन आत्मा की शुद्धिकरण के लिए तप करते है । संवत्सरी पर्व के प्रसंग पर शक्ति हो तो अठ्ठम नहीं तो आयंबिल आदि तप को पूर्ण करने की कोशिश करें । यह भगवान की आज्ञा है ।

 

5. चैत्य परिपाटी :-

 

चैत्य अर्थात् जिनालय, परिपाटी अर्थात् क्रमशः गाँव के जिनालय / चैत्यो में इन दिनों में एक बार दर्शन के लिए जाना चाहिए । इससे सम्यग्दर्शन का निर्माण होता है ।

 

लाखो-करोडों रूपये लगाकर जिनालय बना सकते है तो कम से कम हम जिनमंदिरों के दर्शन तो कर सकते है ना ?

 

पर्युषण पर्व के दिनों में इन पाँच कर्तव्यों का पालन कर सच्चे अर्थ में पर्युषण मनाये। यही शुभेच्छा ।

 

After studying the first study called Pap-Vipak, God Veer Prabhu started the second study. In the Bharata region of this Jambudweep there was a town called Vyaparigram. The people of this city were very prosperous and lived in skyscrapers. Everyone had a treasure of wealth and food. Everyone was happy.

 

The king’s name was Mitra. He was very brave and mighty. He had many queens. The Queen’s name was Shri. Shri Rani was not only beautiful but was also modest and virtuous. In the same city, Vijayamitra used to live. His wife’s name was Subhadra. Subhadra was beautiful. While enjoying worldly pleasures, Subhadra gave a birth to a good looking Son, named – Ujjhitak.

 

Once upon a time. We (Vardhamana Swami) while visiting the Vihara visited a garden called Duteepalash, located in the northeast of the Vanijyagram. In one corner of the garden was the Yakshayatana (temple) of Sudharma Yaksha. Here the deities composed the embellishment. The kings along with the people also came to listen to the sermon and everyone was pleased to hear it.

 

Midday was the time of alms. After receiving my permission, Indrabhuti Gautam, who did the penance of Chhata (2 upwas) , went out to take alms. On the way, he saw strange scenes. On the highway, contingents of elephants, horses and soldiers were seen ready for any fierce battle.

 

When Gautama moved forward, a strange man appeared among those soldiers. His nose and ears were severed. Hands were tied backwards. There was a garland of red flowers around his neck. The whole body was smeared with oil and the powder of ocher was added. That person was very afraid. The indomitable craving to live was visible in his eyes. The elders appointed by the king were constantly mutilating him and throwing small pieces of his body in front of him and throwing them on the highway in front of him, which were being eaten by birds like eagles and crows.

 

As this pain was incomplete, hundreds of people were beating him with stones and whips. In such a situation, he was surrounded by thousands of people, was being taken in the streets of the city. At each crossroad, the announcement was made by the announcer – “O citizens! King Or Prince are not responsible for this plight of Ujjhitaka. It is sad because of the deeds done by ourselves.

Gautam’s mind got overwhelmed after seeing this scene. There was a thought in his psyche that this man is experiencing so much anguish.

 

Gautam returned after receiving alms from Vyapargram, his mind was furious. They were thinking what such deeds this man has done, which is suffering so much? Gautam asked me, “O God! Today, a man who has experienced the pangs of hell, what kind of karma led to this odd condition from which he is suffering ?

 

A2 medium

To address the question I described his earlier life precisely. There was a city called Hastinapur in the Bharat region of the Jambudweep. It’s king was Sunand. Sunand’s greatness was as amazing and unshakable as that of the Himalayan Mountains. In the central part of this city, there was a huge gaushala with hundreds of columns. It was beautiful and pleasing to the mind. Thousands of cows, buffaloes, calves and bulls lived in this cowshed. There was a good arrangement of grass and water for their fodder.

 

Animals did not have any kind of fear in this gaushala. There was no possibility of any disturbance. All kinds of facilities for animals were available there. The biggest feature of this Gaushala was that the animals of the people used to come here, as well as other animals which were not owned and used to roam around here and there.

 

In the town of Hastinapur, there lived a great man named Bhima. He was a master of terrible elusion, false-propaganda and fraudulent policy. Unrighteousness was his nature. It was his religion to torture others and to experience joy in it.

 

Bhima’s wife was Utpala. At one time Utpala was pregnant. Three months of gestation were completed. At such a time, she had a twitch – ‘Those women, those mothers are blessed, fortunate, their life is successful, who are fed fried, roasted or miscellaneous of various parts of different kinds of animals like cow. Cooked meat made with spices is available for feeding. Along with it, drinking beverages like Sura, Madhu, Asava, Kadambari, Draksha are also available.

 

Truly blessed are those women, who get fulfilled such a plea. I am also twitched. Hopefully! Somehow it can be completed.’

 

Utpala had such twitch which remained in her mind only. She could not speak her mind to her husband. Her pleadings were not getting complete, so she started to feel anxious. This made her body dry up. The flesh of the body melted and the skeleton just started appearing. The body started to look like a patient.

 

The glow of the face disappeared. She used to stay sad. Body became pale. The sharp eyes disappeared. Lotus kind of face withered away. She stopped dressing with fragrance, beautiful clothes, gold jewelery and delicate flowers. The conscience of the decisiveness was destroyed. She became completely zero minded.

 

These changes in Utpal’s body could not remain hidden. Seeing weaker wife, Bhima asked- ‘Dear! What is the reason for this change in your body? You are always mourning, while these are the days of your celebration. Why are clouds of concern appearing at such a time? Seeing your sorrow, my heart is crumbling. ‘

 

Hearing this, Utpala said- ‘Swaminath! My womb is about three months old. I am struck by how blessed those women are, who fulfill their desire with a variety of non-vegetarian and varied types of drinking. What do I get? How will my prayer be fulfilled? Praneshwar! This desire of mine is not getting fulfilled, so the happiness of my mind is gone. My mind has become impatient. I live constantly into it.

 

Hey dear I feel that as long as I do not get this fulfilled, there will be no difference in my body and enthusiasm. ‘

 

Hearing this, Bhima told his wife- ‘Dear! Now you are free from worry. I will surely fulfill your desire.’

 

Utpala was convinced after hearing Bhima’s words like this. The day was over. Evening cloudy Night arrived. At midnight, Bhima exited his bedroom. He wore thick armor on the body and bow-arrow on the shoulder. Several other big and small arms came out of the house and reached the Gaushala located in the central part of the town of Hastinapur.

 

Nobody could see, thus Bhima entered the gaushala. Even animals do not know, so cleanly they started cutting their eyes, ears, tail, udder, etc. His weapon was so sharp that parts of animals like cows would be cut apart at once. Thus he collected meat and came out of the cowshed with blood dripping limbs and reached home in hiding. With a lot of love cows etc. animals were handed over to wife Utpala. Knowing my wish was fulfilled, Utpala was very happy. She went to the kitchen with blood meat and baked it, roasted it, cooked it and ate it with alcohol.

 

In this way Utpala’s plea was completed and she began to bear the womb happily. At the completion of nine months of pregnancy, Utpala gave birth to a son. As soon as he was born, the child started screaming horribly. The ear curtain started bursting with his scream. Hearing this scream, cows, bulls, calves etc. animals living in the cowshed got frightened and broke the bond and started running here and there. Seeing this, the parents thought that the cows were also angry because of its scream, so it should be named Gotras.

 

Thus the son was named – Gotras. Gotras’s childhood was spent in sports. He was young. One day, suddenly Gotras’ father Bhima died. Gotras got nervous due to this sudden objection. Family members came and consoled. He wept with his heart while weeping with relatives, friends, etc. and performed the last rites of the father and completed many deeds (Shraddha Karma).

 

King Sunand of Hastinapur got the assurance of Gotras when he got the news. Not only this, the king appointed Gotras to the post on which Bhima was employed. Gotras was not like his father. Bhima had some difficulty in explaining, but Gotras was not ready to understand anything under any circumstances.

 

Once gotras wanted to eat the flesh of cows and animals like dohad which came to mother before her birth. He disguised as a soldier like his father and reached the Gomandap at midnight. There he cut the ingredients of eyes, ears, nose, tail, udder, etc. of other animals, such as cows, and brought them home and roasted, cooked and consumed it with liquer. After this it became his routine. He started consuming meat and liquor in the same way every night. While doing this, he did the terrible sins.

 

A2 P1 mediumAfter completing the age of five hundred years, at the end of time, he was suffering from extreme fear, anxiety, sorrow. After getting death in time, he became a Naraki of a superior age in the second hell. There he endured many grief-sorrows.

 

★★★

 

Hey Gautam! This town has a Sartavaha superior named Vijayamitra. His wife’s name is Subhadra. Every time Subhadra did maternity due the rise of earlier deeds, every time a child was born. Vijayamitra and Subhadra started feeling sad and upset.

 

Here, the living creature of Gotras continued to endure the terrible sufferings conferred by the divine gods for innumerable times in hell. In due course of time, the age of hell was fulfilled and was born in the ill-treatment of Subhadra, the wife of Vijayamitra. She was born on completion of nine months of pregnancy. Every time a child was born he died. This time it did not happen. The parents, overwhelmed with this fear, felt that this child would live. This made him very happy.

 

The child became longevity, for this purpose Subhadra threw him on a stare outside the city and then picked him up. He brought home a beautiful child care.

 

According to ritual, the parents spent generously and happily in the work of congratulating the son’s birth, sun-moon darshan, Jagran Utsav, etc. Thus eleven days were completed. On the occasion of naming on the twelfth day, the parents urged the boy to be named Ujhhitak, because she had thrown him on the stare at birth. All the present relatives supported it and accepted it with joy.

 

Laughing and playing in the lap of five-five goddess mothers, he grew-up gradually. One day Vijayamitra contemplated that Ujhhitak had become quite big and sensible. In trust, leaving home, I can go abroad for business. Thinking this, Vijayamitra took permission from wife and son.

 

Vijayamitra filled ghee, oil, jaggery, sugar, coconut, cloth, diamonds, emeralds, rubies etc. in his ship for sale in abroad. Departed at Lavanasamudra with the good wishes of wife and son in a good muhurta. Vijayamitra, dreaming of gold, was constantly moving with his ship into the sea.

 

Destiny’s games are unique. Vijayamitra’s fate was also damaged. The ship collided with an invisible sea rock before breaking ashore. All the goods merged into the sea. Passengers and sailors who walked together all drowned along with the ship. Trying desperately to escape, Vijayamitra went down the water in a state of helplessness. He died.

 

Within a few days, news of Vijayamitra and his ship’s accident spread in the town. There was no end to the Subhadra and Ujjitka’s suffering. ‘My husband drowned in the sea with salt and ships worth crores of rupees.’ While contemplating this idea, Subhadra drowned in an ocean of grief. She was out of her mind.

 

Just as the Champak tree collapses with one blow of the axe, similarly Subhadra fell to the ground with a bang. Relatives, friends and neighbors splashed water, fans fanned. Her consciousness returned after one hour. Everyone tied her up.

 

But thanks to the strangeness of this selfish world! Whatever material, jewelery, etc. kept by the trustworthy officers, nobles and sarthavas of the city, they all took their goods and went to some unknown place outside the town.

 

Subhadra performed her husband’s temporal-deceased work with her family. After completion of all the work, relatives went to their respective homes. But, the ocean of tears coming out of Subhadra’s eyes were unstoppable. Many days passed while remembering her husband, but Subhadra could not accept the truth.

 

She would remember her husband who had gone abroad, remembered the money of crores of rupees, remembered the strait of the ship, then the memory of her husband’s premature death would have been refreshed. Thus, one day crying, she went on her husband’s path. Subhadra died.

 

News of Subhadra’s death spread throughout the city with the speed of wind. When the city guards got this news, they entered Subhadra’s house. They first drove Ujjitka out of the house. After that they called all the creditors of the Vijaymitra from whom he had borrowed money and handed over the house in exchange for money.

 

In this way, the Ujjhitaka became completely orphaned. First, father died. A great deal of money went with the father. Then mother also left. Whatever was left with the mother, the house etc., all of that also went away. Now it has become like earth below, sky above. In these circumstances neither the relatives supported him nor the friends.

 

Lonely, orphaned, destitute, helpless, the ardent wanderer wandered the streets and squares of the town. Sometimes in shelters and sometimes on highways. Just as a house without a roof is not safe, in the absence of parents, the child becomes autocratic. There was no one to stop even the Ujjitak. He became completely free. After this, he found bitter friends.

 

Due to all these reasons he became fully involved in the miseries like theft, gambling, prostitution, adultery. Whatever money he got from theft and gambling, he would rob him of prostitution. Because of this, he had become an insane lunatic behind the prostitute named Kamadhwaja of the city.

 

Kamadhwaja was a very beautiful courtesan of the city of Vyaparigram. She was replete with 72 arts of femininity and 64 qualities of courtesan. Every element of her body was attractive. When she entered her building with sixteen adornments, the arrival of Rati, the wife of the dejected Cupid, would be felt. There was no other court in the entire town equaling her form, beauty, dance and song.

 

A high flag keeps waving at her building, which was a silent invitation to thousands. The value of spending a night with it was one thousand gold-currency. Kamadhwaja had a chariot named Karnarath with beautiful figurative horses for movement in the city. There were thousands of courtesans under her patronage, who worked under the direction of Kamadhwaja. The king of the city was pleased and presented her with umbrella, etc. In short, Kamadhwaja was a royal courtesan.

 

Ujjitaka remained mad at the feet of this Kamadhwaja prostitute, day and night. He could not live a single moment without her. He used to keep enjoying the joys of divine happiness while living in the human world with Kamadhwaja. For this, the public had spent thousands of gold coins.

 

★★★

 

Vijayamitra was the king of this town. King Vijayamitra was a powerful and rich. His wife’s name was Sridevi. Sridevi was a renewable store of form and beauty in itself. There was an infinite amount of love between the king and queen. Thus, time was passing in the joy of enjoyment.

 

The predestined Asata Vedani Karma emerged. Rani Sridevi suffered from a vaginal disease. She started living in constant pain due to the disease. He could not enjoy any happiness in the world. In this state of anguish, King Vijayamitra could not have sex with the queen. The king was not even disinterested with worldly pleasures, but his desire for pleasures was becoming stronger. It was impossible for him to get pleasure from Rani Sridevi.

 

Hence, the king was determined to go to Kamadhwaja court for work.

 

While entering the Ganika Bhavan, Raja got the news that Ujjitak remains mad after Kamadhwaja day and night. The king thought that this person would be a hindrance to my happiness. On the orders of the king, the bodyguards humiliated and drove him out of the building. The king felt peace when Ujithak left. He became relaxed with Kamadhwaja and started enjoying the excellent enjoyment of human beings.

 

In this way, the Ujjhitaka got away from the body from the Kamadhwaja, but the mind always continued to delight in Kamadhwaja. Day and night, he kept provoking the thoughts of Kamadhwaja. Without that Kamdhwaja, a single moment of life seemed worth 100 years to him. He lost his peace of mind in the face of Kamadhwaja. Like a madman, he would continue to grumble with the name of ‘Kamadhwaja’. It means that he was devoted to Kamadhwaja by mind, speech, body.

 

In such a situation, the same thought kept going in his mind, that what should I do, so that I can revive the subject-pleasures with Kamadhwaja again. He kept wandering around the Ganika Bhavan, hoping that the address would find a secret passage to enter the building and he could enter.

 

Finally one day he got the secret gate to enter the Ganika Bhavan of Kamadhwaja. When he entered the building from secret door, Kamadhwaja greeted him with a sweet gesture. Ujjitak again indulged in the enjoyment of subject-pleasures with Kamadhwaja.

 

When a person becomes blind in lust, he forgets his sorrows, enemies and even death. Big knowledgeable ascetics also become slaves to the subject-pleasures. Then what is the status of a foolish human! Staying here at Kamadhwaja, while enjoying the subject and happiness, the same was the situation of the Ujjhitaka.

 

Once upon a time. When Ujjitaka was busy with Kamadhwaja at Kamakrida, at the same time King Vijayamitra also arrived there. Vijayamitra’s wrath reached the seventh sky after seeing Ujjitak with his beloved courtesan together. His face turned red. Fuming with rage, he threw him outside the court house with the help of bodyguards. The king’s soldiers did not stop on this only.

 

They beat him fiercely with sticks and punches. Every element of the body became loose. The bones of the body started making noise. The soldiers tied both his hands behind and took him to the slaughter.

This was the same occasion when you saw him. Gautam! This is the sad story of him. Seeing this harsh culmination of the deeds of the benefactor, Gautam was filled with wonder.

 

★★★

A2 P2 mediumGautam asked- Bhagwant! Where will the Ujjhitaka die from here? And where will he born again? I said – Gautam! He will be dead today evening at the age of twenty-five. From here he will be born as Naraki in the first Ratnaprabha hell. After the Naraka-Ayushya, he will be born as a monkey at the foothills of the Vaithadya mountain.

With the arrival of puberty, the rites of previous occupation will rekindle in it. He will indulge in sexual conduct with the young monkeys. He will kill those who have children. In this way, he will get death by bonding with inauspicious karma while continuously committing misdeeds. He will be born again as a son in the house of a courtesan in Indrapur city of Jambudweep. With birth, parents will make him impotent. His name will be- Priyaseen.

 

With attaining youth, he will improve as a Priyaseen. He will be full of form, youth and beauty. Will become stunning with your intelligence and knowledge. Going forward, the king of Indrapur will subdue the superiority, commander, family, etc. through his knowledge and the inviting power, by subjugating them through invisibility, captivating, praising, and that man will spend his life enjoying all the material pleasures of the world. .

 

In this way, the life of Priyasena will be born in the first hell by completing the age of 121 years. From here, the reptile will be born many times in the form of a snake. Thereafter he will go to the seventh hell like Mrigaputra. After leaving from there, he will be born millions of times in the fish etc.

 

Then in Ursarisarp, Bhujparisarp, Khecher, etc. and will also be born millions of times in various forms. After leaving from there, that life of Priyasen will be attained many millions of times in the five types of single cell organism.

 

After repeated visits to numerous hells and Tiryanchagati, Priyasena’s life will be born as a cow in Champanagari in the Bharat region of Jambudweep. A circle of friends of that city will kill that cow. After getting death from it, he will be born in the same city as the son of a rich.

 

After entering into puberty, he will attain the right to a specific restrained stable monk and adopt an all-round life. From there, he will be born as a god in the first heaven. After fulfilling the life of god, he will take birth in a wealthy family in Mahavideh region and follow the Charitra Dharma and will go to Moksha only after attaining knowledge.

 

In the thick black night of Amavasya, the entire assembly was frightened by the sin-vipak while listening to the sin-vipak of the Ujjitaka mentioned by Lord Mahavira.

पाप विपाक नामक प्रथम अध्ययन पर देशना फरमाने के उपरान्त परमात्मा वीर प्रभु ने द्वितीय अध्ययन का प्रारंभ किया।

 

इस जम्बू द्वीप के भरत क्षेत्र में वाणिज्यग्राम नामक एक नगर था। इस नगर के प्रजाजन अत्यंत समृद्ध व गगनचुम्बी महलों में निवास करते थे। सभी के घर में धन-धान्य के भण्डार थे। सभी लोग सुखी थे।

 

नगर के राजा का नाम मित्र था। वह बहुत शूरवीर और पराक्रमी था। उसकी अनेक रानियां थीं। राजा की पटरानी का नाम श्री था। श्री रानी रूपवती तो थी ही, शीलवती व गुणव्रती भी थी।

 

इसी नगर में विजयमित्र नाम के अतिश्रीमंत सार्थवाह रहते थे। उनकी पत्नी का नाम था सुभद्रा। सुभद्रा सर्वांग सुन्दर थी। सांसारिक भोगों का आनंद वर्तन करते हुए सुभद्रा को रूप-रंग से परिपूर्ण एक पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। पुत्र का नामकरण हुआ- उज्झितक।

 

एक दिन की बात है। विहार करते हुए हम (वर्धमान स्वामी) वाणिज्यग्राम के ईशान कोण में अवस्थित द्यूतिपलाश नामक उद्यान में पधारे। उद्यान के एक कोने में सुधर्मा यक्ष का यक्षायतन (मंदिर) था। यहाँ देवताओं ने समवसरण की रचना की। नगरजनों के साथ राजा भी देशना सुनने के लिए आए और देशना सुनकर सभी प्रसन्न हुए।

 

मध्याह्न भिक्षाचर्या का समय था। मेरी अनुज्ञा प्राप्त कर छट्ठ के पारणे छट्ठ की तपस्या करने वाले इन्द्रभूति गौतम वाणिज्यग्राम के घरों से भिक्षा लेने हेतु निकले। मार्ग में उन्हें विचित्र दृश्य देखने को मिले। राजमार्ग पर हाथी, घोड़े और सैनिकों की टुकड़ियां किसी भीषण युद्ध के लिए उद्यत दिखाई दे रही थीं।

 

गौतम कुछ और आगे बढ़े तो उन सैनिकों के बीच में एक विचित्र पुरुष दिखाई दिया। उसके नाक-कान कटे हुए थे। हाथ पीछे की ओर बंधे थे। उसके गले में लाल रंग के पुष्पों की माला थी। पूरे शरीर को तेल से स्निग्ध कर गेरू का चूर्ण डाला हुआ था।

 

वह व्यक्ति बहुत ही भयभीत था। उसकी आंखों में जीने की अदम्य लालसा दिखाई दे रही थी। राजा द्वारा नियुक्त बधिक निरंतर उसका अंग-भंग कर रहे थे और उसके शरीर के छोटे-छोटे टुकड़े कर उसके सामने ही राजमार्ग पर फेंक रहे थे, जिन्हें खाने के लिए चील-कौवे आदि पक्षी झपट रहे थे।

 

यह पीड़ा जैसे अधूरी सी हो, सो सैकड़ो लोग उसे पत्थर और चाबुक से मार रहे थे।

 

ऐसी स्थिति में हजारों लोगों के जनसमूह से घिरे हुए उज्झितक को नगर के गली-मुहल्लों के बीच घुमाया जा रहा था। प्रत्येक चौक पर उद्घोषक द्वारा घोषणा की जा रही थी- ‘हे नगरजनों! उज्झितक की इस दुर्दशा के पीछे राजा या राजपुत्र कारणभूत नहीं हैं। यह स्वयं द्वारा कृत कर्मों के कारण दुःखी है।’

 

A2 mediumयह दृश्य देखकर गौतम का मन द्रवीभूत हो उठा। उनके मानस में विचार आया कि यह पुरुष कितनी नरकतुल्य वेदना का अनुभव कर रहा है।

 

वाणिज्यग्राम से भिक्षा ग्रहण कर गौतम लौटे तो उनका मन उद्विग्न हो रहा था। वे विचार कर रहे थे कि आखिर इस पुरुष ने कौन से ऐसे कर्म किए हैं, जो कि इतनी पीड़ा भोग रहा है?

 

मुझे वंदना कर गौतम ने प्रश्न किया- ‘हे परमात्मा! आज जिस पुरुष को नरक की वेदना का अनुभव करते हुए देखा, उसने अपने पूर्वभव में ऐसे कौन से कर्म का बंध किया है, जो उसकी यह विषम दशा हो रही है?’

 

गौतम के प्रश्न के समाधान हेतु मैंने विस्तार पूर्वक उज्झितक के पूर्व भव का वर्णन इस प्रकार किया-

 

जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में हस्तिनापुर नामक नगर था। उसका राजा सुनंद था। सुनन्द की महानता हिमालय पर्वत जैसी अद्भुत और अडिग थी।

 

इस नगर के मध्य भाग में सैकड़ों स्तम्भों से युक्त सुन्दर, मनोहर एवं चित्त को प्रसन्न कर देने वाली विशाल गौशाला थी। इस गौशाला में हजारों गाय, भैंस, बछड़े, बैल और सांड़ रहते थे। उनके भोजन के लिए घास-पानी की उत्तम व्यवस्था थी। इस गौशाला में उन्हें किसी भी प्रकार का भय नहीं था। किसी उपद्रव की कोई आशंका नहीं थी। पशुओं के लिए सभी प्रकार की सुविधाएं वहां उपलब्ध थीं। इस गौशाला की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यहां पर प्रजाजनों के पशु तो आते ही थे, साथ ही ऐसे दूसरे पशु भी बहुतायत संख्या में थे, जिनका कोई मालिक या स्वामी नहीं होता था और वे इधर-उधर आवारा घूमते रहते थे।

 

इसी हस्तिनापुर नगर में भीम नामक एक महाक्रूर व्यक्ति रहता था। वह भयंकर मायावी, झूठ-प्रपंच व कूट-कपट नीति में निष्णात था। अधर्म उसका स्वभाव था। दूसरों को प्रताड़ित कर उसमें आनंद का अनुभव करना उसका धर्म था।

 

भीम की पत्नी का नाम उत्पला था। एक समय उत्पला गर्भवती थी। गर्भ के तीन महीने पूर्ण हो चुके थे। ऐसे समय में उसे एक भयानक दोहद उत्पन्न हुआ- ‘वे स्त्रियां, वे माताएं धन्य हैं, सौभाग्यशाली हैं, उनका जीवन सफल है, जिन्हें गाय आदि विविध प्रकार के प्राणियों के विविध अंगों का सिंका हुआ, तला हुआ, भुना हुआ अथवा विविध प्रकार के मसालों से आविष्ट पका हुआ मांस खाने और खिलाने को मिलता है। साथ में सुरा, मधु, आसव, कादम्बरी, द्राक्षा आदि पेय पदार्थ भी पीने-पिलाने को मिलते हैं। सचमुच वे नारियां धन्य हैं, जिन्हें ऐसे दोहद की पूर्ति होती है। मुझे भी दोहद हुआ है। काश! किसी प्रकार यह पूर्ण हो सके।’

 

उत्पला के मन में ऐसे भाव जगे तो, लेकिन वे मन के मन में ही रह गये। वह अपने पति से मन की बात न कह सकी। उसका दोहद पूर्ण नहीं हो रहा था, अतः वह क्षुधातुर व चिंतातुर रहने लगी। इससे उसका शरीर सूखने लगा। शरीर का मांस गल गया और कंकाल मात्र दिखने लगी। शरीर रोगी जैसा दिखाई देने लगा। चेहरे की चमक गायब हो गई। वह हमेशा दीन-हीन सी रहने लगी। देह फीकी और पीली पड़ गई। आंखों का तेज गायब हो गया। कमलिनी जैसा चेहरा मुरझा गया। सुगंध, सुन्दर वस्त्र, स्वर्णाभूषण, सुकोमल पुष्प से उसने बनाव-श्रृंगार करना बंद कर दिया। करणीय-अकरणीय का विवेक नष्ट हो गया।  वह सम्पूर्णतः शून्य मनस् हो गई।

 

उत्पल के शरीर में आने वाले ये परिवर्तन छुप न सके। कृषकाय पत्नी को देखकर भीम ने पूछा- ‘प्रिये! तुम्हारे शरीर में आने वाले इस बदलाव का क्या कारण है? तुम हमेशा शोकमग्न रहती हो, जबकि यह तो तुम्हारे उत्सव के दिन हैं। ऐसे समय में चिन्ता के बादल क्यों दिखाई दे रहे हैं? तुम्हारा दुःख देखकर मेरा हृदय टुकड़े-टुकड़े हो रहा है।’

 

यह सुनकर उत्पला ने कहा- ‘स्वामीनाथ! मेरे गर्भ को लगभग तीन महीने पूरे हो रहे हैं। मुझे इस प्रकार का दोहद आया है कि वे स्त्रियां कितनी धन्य हैं, जो भांति-भांति के मांसाहार और विविध प्रकार के मदिरापान से अपना मनोरथ पूरा करती हैं। मुझे इनमें से क्या मिलता है? मेरा दोहद कैसे पूरा होगा? प्राणेश्वर! मेरा यह मनोरथ पूरा नहीं हो रहा है, इसलिए मेरे चित्त की प्रसन्नता चली गई है। मेरा मन उत्साहहीन हो चुका है। मैं सतत आर्तध्यान में रहती हूं। हे प्रियतम! मुझे लगता है कि जब तक मेरा यह दोहद पूर्ण नहीं होगा, तब तक मेरे शरीर और उत्साह में कोई फर्क नहीं पड़ेगा।’

 

यह सुनकर भीम ने अपनी पत्नी से कहा- ‘प्रिये! अब तुम चिन्तामुक्त हो जाओ। तुम्हें आर्तध्यान करने की कोई जरूरत नहीं है। तुम्हारा दोहद, तुम्हारा मनोरथ मैं अवश्य पूर्ण करूंगा।’

 

भीम के इस प्रकार के वचनों को सुनकर उत्पला आश्वस्त हुई।

 

दिन पूरा हुआ। संध्या ढली। रात्रि का आगमन हुआ। मध्यरात्रि में भीम अपने शयन-कक्ष से बाहर निकला। उसने शरीर पर मोटा कवच धारण किया और कंधे पर धनुष-बाण। हाथ में अन्य कई छोटे-बड़े शस्त्र लेकर घर से बाहर निकला और हस्तिनापुर नगर के मध्य भाग में अवस्थित गौशाला में जा पहुंचा।

 

कोई देख न सके, इस प्रकार भीम ने गौशाला के अंदर प्रवेश किया। पशुओं को भी पता न लगे, इतनी सफाई से उनके आंख, कान, पूंछ, थन, डील आदि काटने लगा। उसका हथियार इतना तीक्ष्ण था कि गाय आदि पशुओं के अंग एक ही बार में कट कर अलग हो जाते। इस प्रकार उसने मांस एकत्र किया और खून टपकते अंगों को लेकर गौशाला से बाहर निकल आया और छुपते हुए घर पहुंच गया। उसने प्रेम के साथ गाय आदि पशुओं के ये अंग पत्नी उत्पला को सौंप दिया। मेरी इच्छा पूर्ण हुई, यह जानकर उत्पला एकदम प्रसन्न हो गयी। रक्ताभ मांस को लेकर वह रसोई में गयी और अपनी इच्छानुसार उसे सेंका, भूना, पकाया और मद्यपान के साथ भोजन किया।

A2 P1 mediumइस प्रकार उत्पला का दोहद पूर्ण हुआ और वह सुखपूर्वक गर्भ का वहन करने लगी। गर्भ के नौ माह पूर्ण होने पर उत्पला ने एक पुत्र को जन्म दिया। जन्म लेने के साथ ही बालक ने भयंकर रूप से चीखना शुरू कर दिया। उसकी चीख से कान के पर्दे फटने लगे। यह चीख सुनकर गौशाला में रहने वाले गाय, बैल, बछड़े आदि पशु भयभीत हो गये और बंधन तोड़ कर इधर-उधर भागने लगे। यह देखकर माता-पिता ने विचार किया कि इसकी चीख से गायों को भी त्रस हुआ, अतः इसका नाम गोत्रास रखा जाये।

 

इस प्रकार पुत्र का नाम पड़ा- गोत्रास। गोत्रास का बचपन खेलकूद में बीत गया। वह युवा हुआ। एक दिन अचानक गोत्रास के पिता भीम का देहावसान हो गया। अचानक आने वाली इस आपत्ति से गोत्रास घबरा गया। परिवारजनों ने आकर सांत्वना दी। स्वजनों, ज्ञातिजनों, मित्रें आदि के साथ रोते-कलपते हृदय से उसने पिता का अग्नि संस्कार किया और अनेक मृतक कार्य (श्राद्ध कर्म) को पूर्ण किया।

 

हस्तिनापुर के नरेश सुनंद को जब समाचार मिला तो उन्होंने भी गोत्रास को आश्वासन दिया। इतना ही नहीं, राजा ने भीम जिस पद पर कार्यरत था, उसी पद पर गोत्रास की नियुक्ति कर दी। गोत्रास अपने पिता जैसा नहीं था। भीम को समझाने में थोड़ी मुश्किल होती थी, पर गोत्रास किसी भी स्थिति में कुछ समझने को तैयार नहीं था।

 

एक बार गोत्रास को अपने जन्म से पूर्व माता को आये दोहद की तरह गाय आदि पशुओं का मांस खाने की इच्छा हुई। वह अपने पिता की तरह सैनिक का वेश धारण कर मध्यरात्रि में गौमण्डप में पहुंच गया। वहां उसने गाय आदि अन्य पशुओं के आंख, कान, नाक, पूंछ, थन, डील आदि अवयवों को काट कर घर ले आया और भून कर, पका कर मदिरा के साथ उसका सेवन किया। इसके बाद तो यह उसका नित्यक्रम हो गया। वह प्रत्येक रात्रि इसी प्रकार मांसाहार और मद्यपान करने लगा। यह करते हुए उसने भयानक पापकर्म का बंध कर लिया।

 

कुल पांच सौ वर्ष की आयु पूर्ण कर अंत समय में वह अत्यंत भय, चिन्ता, दुःख से पीड़ित हो गया। कालान्तर में मृत्यु को प्राप्त कर दूसरी नरक में उत्कृष्ट आयु वाला नारकी बना। वहां उसने अनेक प्रकार से दारूण-दुःख सहन किए।

 

★★★

 

हे गौतम! इस वाणिज्यग्राम ने विजयमित्र नाम के एक सार्थवाह श्रेष्ठि रहते हैं। उनकी पत्नी का नाम सुभद्रा है। पूर्व कर्मों के उदय से सुभद्रा ने जितनी बार भी प्रसूति की, हर बार मृत संतान पैदा हुई। विजयमित्र और सुभद्रा इससे दुःखी, उदास व खिन्न रहने लगे।

 

इधर गोत्रास का जीव द्वितीय नरक में असंख्य काल तक परमाधामी देवों द्वारा प्रदत्त भयंकर पीड़ाओं को सहन करता रहा। कालान्तर में नरक का आयुष्य पूर्ण कर विजयमित्र की पत्नी सुभद्रा की कुक्षि में उत्पन्न हुआ। नौ माह का गर्भकाल पूर्ण होने पर उसका जन्म हुआ। हर बार बालक के जन्म लेने के बाद उसकी मृत्यु हो जाती थी। इस बार ऐसा नहीं हुआ। इस भय-भार से दबे हुए माता-पिता ने अनुभव किया कि यह बालक जीवित रहेगा। इससे उन्हें अपार प्रसन्नता हुई। बालक दीर्घायु बने, इस उद्देश्य से सुभद्रा ने उसे नगर के बाहर घूरे पर फेंक दिया और फिर उठा लाई। घर लाकर बालक का सुन्दर लालन-पालन आरंभ किया।

 

कुल मर्यादा के अनुसार माता-पिता ने पुत्र जन्म की बधाई, सूर्य-चन्द्र दर्शन, जागरण उत्सव आदि कार्यों में उदारता व प्रसन्नता पूर्वक व्यय to किया। इस प्रकार ग्यारह दिन पूरे हुए। बारहवें दिन नामकरण के अवसर पर माता-पिता ने बालक का नाम उज्झितक रखने का आग्रह किया, कारण कि जन्म के साथ ही उसे घूरे पर फेंक दिया था। सभी उपस्थित बंधु-बांधवों ने इसका समर्थन किया और हर्षपूर्वक स्वीकार किया।

 

पांच-पांच धाय माताओं की गोद में हंसते-खेलते-कूदते उज्झितक धीरे-धीरे बड़ा हो गया।

 

एक दिन विजयमित्र ने विचार किया कि उज्झितक अब काफी बड़ा और समझदार हो गया है। इसके भरोसे घर छोड़कर मैं व्यापार हेतु विदेश जा सकता हूं। ऐसा विचार कर विजयमित्र ने पत्नी और पुत्र से अनुमति ली।

 

विजयमित्र ने परदेश में बिक्रय हेतु घी, तेल, गुड़, शक्कर, नारियल, वस्त्र, हीरा, पन्ना, माणिक आदि अपने जहाज में भर लिया। एक अच्छे मुहूर्त में पत्नी और पुत्र की शुभकामनाओं के साथ लवणसमुद्र में प्रस्थान किया। सुनहरे सपने देखता हुआ विजयमित्र अपने जहाज के साथ समुद्र में लगातार आगे बढ़ता जा रहा था।

 

भाग्य के खेल तो निराले ही होते हैं। विजयमित्र का भी भाग्य फूटा हुआ था। जहाज किनारे लगने से पूर्व ही एक अदृश्य समुद्री चट्टान से टकरा कर टूट गया। सभी सामान समुद्र में समा गया। साथ में चलने वाले यात्री और नाविक, सभी जहाज के साथ ही डूब गये। बचने का भरपूर प्रयत्न करते हुए विजयमित्र ने निरूपाय व असहाय अवस्था में जलसमाधि ली। वह मृत्यु को प्राप्त हुआ।

 

थोड़े ही दिनों में विजयमित्र और उसके जहाज की दुर्घटना का समाचार वाणिज्यग्राम में फैल गया। सुभद्रा और उज्झितक की पीड़ा का कोई पार नहीं था। ‘मेरा पति करोड़ो रूपये मूल्य के द्रव्य व जहाज के साथ लवण समुद्र में डूब गया।’ इस विचार पर चिंतन करते हुए सुभद्रा शोक के महासागर में डूब गई। उसका मस्तिष्क शून्यवत् हो गया। जिस प्रकार चम्पक वृक्ष कुल्हाड़ी के एक वार से धराशायी हो जाता है, उसी प्रकार सुभद्रा धड़ाम से भूमि पर गिर पड़ी। सगे-संबंधी, मित्रें व पड़ोसियों ने पानी के छींटे दिये, पंखा झलते रहे। एक घड़ी बाद उसकी चेतना लौटी। सभी ने उसे ढाढ़स बंधाया।

 

पर वाह रे इस स्वार्थमयी संसार की विचित्रता! नगर के विश्वासी अधिकारियों, श्रेष्ठियों और सार्थवाहों का जो कुछ द्रव्य-आभूषण आदि विजयमित्र ने रखा था, वे सब अपना सामान लेकर वाणिज्यग्राम से बाहर किसी अज्ञात स्थान पर चले गये।

 

अश्रुपूरित सुभद्रा ने अपने परिवार के साथ पति के लौकिक-मृतक कार्य किए। सभी कार्य पूरे होने के बाद नाते-रिश्तेदार अपने-अपने घर को चले गये। परंतु, सुभद्रा की आंखों से निकलता आंसुओं का महासागर रूकने का नाम ही नहीं ले रहा था। पति को याद करते हुए कितने ही दिन बीत गये, पर सुभद्रा सत्य को स्वीकार नहीं कर पा रही थी। उसे परदेश गये पति की याद आती, करोड़ो रूपयों के द्रव्य याद आते, जहाज की जलसमाधि याद आती, तो कभी पति की अकाल-मृत्यु का स्मरण ताजा हो जाता। इस प्रकार रोते-कलपते एक दिन वह अपने पति के मार्ग पर चली गई। सुभद्रा मृत्यु को प्राप्त हुई।

 

सुभद्रा की मृत्यु का समाचार पवन वेग से पूरे नगर में फैल गया। जब नगर-रक्षकों को यह समाचार मिला तो वे सुभद्रा के घर में घुस आये। सबसे पहले उन्होंने उज्झितक को घर से निकाल बाहर किया। उसके बाद उज्झितक के पिता विजयमित्र ने नगर के जिन लोगों से रूपया उधार लिया था, उन सभी लेनदारों को बुलाकर रूपयों के बदले घर सौंप दिया।

 

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इस प्रकार उज्झितक पूरी तरह अनाथ हो गया। पहले पिता मृत्यु को प्राप्त हुए। पिता के साथ धन का एक बड़ा हिस्सा चला गया। फिर मां भी चली गई। मां के साथ जो कुछ भी बचा था घर आदि, वह सब भी चला गया। अब तो उसके लिए नीचे धरती, ऊपर आकाश जैसी स्थिति हो गई। इन परिस्थितियों में न तो स्वजनों ने उसका साथ दिया, न ही मित्रें ने।

 

अकेला, अनाथ, निराधार, असहाय बन चुका उज्झितक वाणिज्यग्राम के गलियों और चौराहों पर भटकने लगा। कभी आश्रयगृहों में तो कभी राजमार्गों पर। जिस प्रकार बिना छत के घर सुरक्षित नहीं होता, उसी प्रकार मां-बाप की अनुपस्थिति में बालक निरंकुश बन जाता है। उज्झितक को भी कोई रोकने-टोकने वाला नहीं था। वह पूरी तरह से स्वच्छंद हो गया। इस पर भी कड़वा करेला नीम पर चढ़ने सदृश गलत मित्रें का साथ। इन सभी कारणों से वह चोरी, जुआ, वेश्यागमन, परस्त्रीगमन जैसे कुव्यसनों में पूरी तरह लिप्त हो गया। चोरी और जुए से जो भी धन प्राप्त होता, उसे वह वेश्यागमन में लुटा देता। कारण, नगर की कामध्वजा नामक वेश्या के पीछे वह अनहद पागल बन चुका था।

 

कामध्वजा वाणिज्यग्राम नगर की अत्यंत रूपवती गणिका थी। वह नारी की 72 कलाओं और गणिका के 64 गुणों से परिपूर्ण थी। उसके शरीर का प्रत्येक अवयव सुडौल और आकर्षक था। जब वह सोलह श्रृंगार कर अपने भवन में प्रवेश करती तो साक्षात कामदेव की पत्नी रति के आगमन का आभास होता। इसके रूप, सौंदर्य, नृत्य और गीत की बराबरी करने वाली पूरे वाणिज्यग्राम में दूसरी गणिका नहीं थी। उसके विलास भवन पर ऊंची ध्वजा लहराती रहती है, जो हजारों काम-रसिकों को मौन आमंत्रण देती है। इसके साथ एक रात्रि व्यतीत करने का मूल्य एक हजार स्वर्ण-मुद्रा थी।

 

नगर में गमनागमन के लिए कामध्वजा के पास सुन्दर लाक्षणिक अश्वों से युक्त कर्णरथ नामक रथ था। उसके संरक्षण में हजारों गणिकाएं थीं, जो कामध्वजा के निर्देश पर काम करती थी। नगर के राजा ने प्रसन्न होकर उसे छत्र, चंवर आदि भेंट किया था। संक्षेप में कहें तो, कामध्वजा राजमान्य गणिका थी।

 

उज्झितक इस कामध्वजा वेश्या के रूप के पीछे पागल बना हुआ दिन-रात उसके पैरों में ही पड़ रहता था। वह उसके बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता था। वह कामध्वजा के साथ मनुष्य लोक में रहते हुए दिव्य सुखों के आनन्द का आस्वादन करता रहता। इसके लिए उज्झितक हजारों-लाखों स्वर्णमुद्रायें खर्च कर चुका था।

 

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विजयमित्र इस वाणिज्यग्राम नगर का राजा था। राजा विजयमित्र बलवान और रूपवान श्रीमंत था। उसकी पत्नी का नाम था श्रीदेवी। श्रीदेवी अपने आप में रूप और सौंदर्य का अक्षय भंडार थी। राजा और रानी के बीच अनहद प्रेम था। इस प्रकार भोग-सुखों के आनन्द में समय बीत रहा था।

 

पूर्वकृत असाता वेदनीय कर्म का उदय हुआ। रानी श्रीदेवी योनिशूल नामक रोग से ग्रस्त हो गई। रोग से वह सतत पीड़ा में रहने लगी। संसार के किसी भी सुख में उसे रस नहीं रहा। पीड़ा की इस अवस्था में राजा विजयमित्र रानी के साथ भोगोपभोग नहीं कर सकता था। राजा को सांसारिक भोगों से वैराग्य भी नहीं था, अपितु भोग सुखों के लिए उसकी कामना तीव्रतर होती जा रही थी। रानी श्रीदेवी से उसे भोग सुख मिलना असंभव था। अतः राजा कामपूर्ति के लिए कामध्वजा गणिका के यहां जाने के लिए उद्यत हुआ।

 

गणिका भवन में प्रवेश करते समय राजा को समाचार मिला कि उज्झितक दिन-रात कामध्वजा के पीछे पागल बना पड़ा रहता है। राजा ने विचार किया कि यह व्यक्ति मेरे सुख में बाधक बनेगा। राजा के आदेश से अंगरक्षकों ने उज्झितक को अपमानित कर भवन से निकाल बाहर किया। उज्झितक के जाने पर राजा को शांति का अनुभव हुआ। वह कामध्वजा के साथ निश्चिंत होकर मनुष्य लोक का उत्कृष्ट भोग-सुख का उपभोग करने लगा।

 

इस प्रकार निकाले जाने पर उज्झितक शरीर से कामध्वजा से दूर हो गया, किन्तु मन तो सदैव कामध्वजा में ही रमण करता रहा। उसे दिन-रात कामध्वजा के ही विचार उद्वेलित करते रहते। उस कामध्वजा के बिना एक क्षण का जीवन उज्झितक को 100 वर्ष के बराबर लग रहा था। कामध्वजा के विरह में उसके मन की सुख-शान्ति खो गई। किसी पागल की भांति वह ‘कामध्वजा’ का नाम लेकर बड़बड़ाता रहता। तात्पर्य यह कि वह मन, वचन, काया से कामध्वजा के प्रति समर्पित हो चुका था।

 

ऐसी स्थिति में उसके मन में एक ही विचार चलता रहा कि मैं क्या करूं, जिससे कि मैं पुनः कामध्वजा के साथ विषय-सुखों का वर्तन कर सकूं। वह गणिका भवन के आसपास चक्कर लगाता रहता, इस उम्मीद के साथ कि क्या पता, भवन में प्रवेश का कोई गुप्त मार्ग मिल जाए और वह अंदर प्रवेश कर सके।

 

आखिर एक दिन उसे कामध्वजा के गणिका भवन में प्रवेश का गुप्तद्वार मिल ही गया। उसने गुप्तद्वार से भवन में प्रवेश किया तो कामध्वजा ने मीठी मनुहार के साथ उसका स्वागत किया। उज्झितक फिर से कामध्वजा के साथ विषय-सुखों के भोग में लिप्त हो गया।

 

व्यक्ति जब काम-वासना में अंधा हो जाता है तो वह अपने दुःख, शत्रु और यहां तक कि मृत्यु को भी विस्मृत कर देता है। बड़े-बड़े ज्ञानी तपस्वी भी विषय-सुखों के दास बन जाते हैं_ फिर मूढ़ मानव की क्या बिसात! कामध्वजा के यहां रहकर विषय-सुख भोगते हुए उज्झितक की भी यही स्थिति थी।

 

एक दिन की बात है। जिस समय उज्झितक कामध्वजा के साथ कामक्रीड़ा में व्यस्त था, ठीक उसी समय राजा विजयमित्र भी वहां आ पहुंचा। अपनी प्रिय गणिका के साथ उज्झितक को कामक्रीड़ा में रत देखकर विजयमित्र का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया। उसका चेहरा लाल हो उठा। भृकुटी चढ़ गई। क्रोध से तमतमाते हुए उसने अंगरक्षकों द्वारा उज्झितक को गणिका भवन के बाहर फिंकवा दिया। राजा के सैनिक इतने पर ही नहीं माने। उन्होंने डंडे और मुक्के से उसकी जम कर पिटाई कर दी। शरीर का एक-एक अवयव ढीला पड़ गया। शरीर की हड्डियां बजने लगीं। सैनिकों ने उसके दोनों हाथ पीछे बांध दिये और वधस्थल पर ले गये। यह वही अवसर था, जब तुमने उसे देखा।

 

गौतम! विषयांध उज्झितक की यही करुण-कथा है।

 

उज्झितक के कर्मों की यह कठोर परिणति देख कर गौतम आश्चर्य से भर गये।

A2 P2 medium★★★

गौतम ने पूछा- भगवंत! उज्झितक यहां से मर कर कहां जायेगा? कौन सी गति में उत्पन्न होगा?

 

मैंने कहा- गौतम! शूली पर चढ़ा हुआ उज्झितक आज ही संध्याकाल में पच्चीस वर्ष की आयु पूर्ण कर मृत्यु को प्राप्त होगा। यहां से वह प्रथम रत्नप्रभा नरक में नारकी के रूप में उत्पन्न होगा। परमाधामी देवों द्वारा भयंकर पीड़ा सहन करते हुए नारक-आयुष्य पूर्ण कर जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में वैताढ्य पर्वत की तलहटी में वानर के रूप में जन्म लेगा। यौवन काल के आगमन के साथ ही उसमें पूर्वभव के कामभोग के संस्कार फिर से जागृत हो जायेंगे। वह युवा वानरियों के साथ कामक्रीड़ा में लिप्त होगा। जो बच्चे होंगे, उनको वह मार डालेगा। इस प्रकार निरंतर कुकर्म करते हुए अशुभ कर्म का बंध कर मृत्यु को प्राप्त होगा। वह पुनः जम्बूद्वीप के इन्द्रपुर नगर में एक गणिका के घर पुत्र रूप में जन्म लेगा। जन्म के साथ ही मां-बाप उसे नपुंसक बना देंगे। उसका नाम होगा- प्रियसेन।

 

युवा-वय को प्राप्त करने के साथ ही प्रियसेन के रूप में निखार आयेगा। वह रूप, यौवन व लावण्य से भरपूर होगा। अपनी बुद्धि और ज्ञान से तेजस्वी बनेगा। आगे जाकर इन्द्रपुर नगर के राजा, श्रेष्ठि, सेनापति, कौटुम्बिकों आदि को अपनी विद्या व अभिमंत्रित चूर्ण के माध्यम से अदृश्यीकरण, वशीकरण, प्रसन्नीकरण से पराधीन कर अपने वश में कर लेगा_ और वह मनुष्य लोक के सभी भौतिक सुखों का उपभोग करते हुए जीवन व्यतीत करेगा।

 

इस प्रकार पूरे जीवन भर दुष्कर्म करते हुए, जीवन को पापमय बनाते हुए भारी कर्म बांधता हुआ 121 वर्ष की आयु पूर्ण कर प्रियसेन का जीव प्रथम नरक में उत्पन्न होगा। यहां से निकल कर वह सरीसृप योनि के सर्प आदि के रूप में अनेक बार जन्म लेगा। तदुपरांत वह मृगापुत्र की तरह सातवीं नरक में जायेगा। वहां से निकल कर वह मत्स्य आदि जलचर योनि में लाखों बार जन्म लेगा। फिर उरसरिसर्प, भुजपरिसर्प, खेचर आदि में तथा विकलेंद्रिय में भी लाखों बार जन्म लेगा। वहां से निकल कर वह प्रियसेन का जीव एकेन्द्रिय के पांचो प्रकार में कई लाख बार जन्म-मरण को प्राप्त होगा।

 

अनेकानेक नरक एवं तिर्यंचगति में बार-बार भव-भ्रमण करने के उपरांत प्रियसेन का जीव जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र की चम्पानगरी में पाड़ा के रूप में जन्म लेगा। उस नगर के मित्रें का एक मण्डल उस पाड़े की हत्या कर देगा। इससे मृत्यु को प्राप्त कर वह उसी नगर में श्रेष्ठिपुत्र के रूप में उत्पन्न होगा। बाल्यावस्था को पार कर युवावस्था में आते हुए विशिष्ट संयमी स्थविर के पास सम्यक्त्व प्राप्त कर चारित्र जीवन अंगीकार करेगा। वहां से काल कर प्रथम देवलोक में देव रूप में उत्पन्न होगा। देवायुष्य पूर्ण कर महाविदेह क्षेत्र में धनाढ्य कुल में जन्म लेकर चारित्र धर्म का पालन करेगा और केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्ष में जायेगा।

 

अमावस्या की घनी काली रात में प्रभु महावीर द्वारा वर्णित उज्झितक का पाप-विपाक श्रवण करते हुए समस्त सभा पाप-विपाक से भयभीत हुई।

 

उज्झितक कथा संपूर्ण

 

 

 

It was a moonless night of the month ‘karti and third ‘aara’ was about to end. When the Lord took a break from the more than 16 prahar (1 prahar = 3 hours) long sermon, it was as if the flow of Ganga stopped, or as if the bells stopped ringing from the temple.

 

The last sermon of the Lord was completed. The Lord got up from the throne of gem, stepped down three stages of ‘Samavasaran’ and entered into the school of King Hastipal. Lord knew it very well that he will be achieving the salvation before the end of the night. He was also aware about Gautam’s infinite love towards him and that love is the only impediment in the way of his salvation. To break that chain of love, the Lord decided to send him to nearby village. Actually he decided to send Gautam away from him at his last moments.

 

Arrival of the Lord in the school of King Hastipal : Thousands of monks were present in front of the Lord there. Gautam swami was sitting in the first row. Lord, the ocean of compassion, looked at Gautam swami and said, “Gautam ! ”

 

That was the last address from the Lord for Gautam swami. Actually those were not just words but actually buzzing of cuckoo. It was like pleasant music of the tides of the ocean. Hearing his name from the Lord made Gautam swami cheerful.

 

Humble Gautam swami was very excited. He folded his hands and reached to the Lord’s feet. Spoke very softly, “Oh God, kindly order”.

 

The Lord replied, ” A brahmin named Devsharma lives in a nearby village, he will be enlightened from you. You have to go there for his betterment. ”

 

Gautam swami left to advice Devsharma :

“Surely, your honour. You have been benevolent to me, I am blessed! ” replied Gautam swami and left the school.The master of 4 Gyan (knowledge), Gautam Swami, forgot that this is his last sight of the Lord. He won’t be able to see such a bright and liberal body of the Lord. Basically Gautam Swami can’t see anything more than following the order of the Lord. 80 years old  Gautam Swami left the town Apapapuri towards Devsharma with an energy like a man of 28, just to follow the words of the Lord.

 

3rd prahar of a moonless night was completed and 4th prahar began. At that time, ‘Swati’ nakshatra (constellation) had a moon in it. The Lord Mahavir had a ‘Chovihar chhath’ (2 upvas without even water) which was his last ‘Tap’ (religious austerity). He had just completed his 16 prahar (48 hours) long sermon but due to ‘Tirthankar naam Karma,’ not a single sign of regret or faintness could be observed from his face. His body was as healthy as sunflower. He was glad and placid. Very few moments were remaining to complete his life. Thousands of monks along with Sudharma swami, vestals like Chandana, 9 Lichhavi kings of Kashi & Kaushal, 9 Mallik kings, in all kings of 18 republics and many Shravakas-Shravikas were present in front of the Lord. Those 18 kings were feudal Lords of King Chetak (Cheda). All were in Paushadh and did a fast on that No moon day.

 

Rebeginning of Sermon of the Lord :

The flow of the speech of the Lord, which was stopped in Samavasaran, again started flowing. An important topic of that sermon was ‘Vipak’ (Result). It actually means consequence of good-bad deeds. It means an aftereffect of saintly or evil deeds. When a soul does a sin, gets sorrow in return and when a soul performs a saintly deed, gets pleasure. Or when you get compatibility by any doings, it’s due to sacraments and when you get unfavorable circumstances by any doing, it’s definitely the result of a sin.

 

Paap Vipak Adhyayan (Sin result study) :

It’s always to be focussed that consequences of any deed have to be faced by everyone in this life or in any of the next. Scholars have always said that

 

‘Kadaan kammaan na mokhha athhi’

 

Without facing the consequences of the deeds, emancipation of the soul is impossible.

 

Basically everyone loves pleasure and nobody likes the sorrow. One who doesn’t want sorrows should not indulge into sins. That’s why one should give up evils like injustice, torture, prostitution, exploitation of the citizens, corruption, violence towards panchendriya (animals), alcholism, astringency, selfishness, indulgence in enjoyment, Yajna (sacrifice), non vegitarianism, ruthlessness, theft, eroticism, etc. One who indulges into such miserable deeds prepares fierce sins. It leads to the birth in the hell or in miserable conditions and have to tolerate the sorrows. Here the case of Mrugaputra is famous. Saying that, the Lord began the formatting of the 55 studies of the ‘Paap Vipak’ (Sin result).

 

Mrugaputra

 

The Lord started explaining the case of Mrugaputra.

 

There was a town called Mrugagram in the Bharata kshetra of this Jambudweep. It was ruled by a Kshatriya king Vijay. Mruga was his beautiful wife. She gave birth to a son, who was named as Mrugaputra. Due to the sins in the previous births, Mrugaputra was blind, dumb, deaf, handicapped and having a disgusting shape. Not a single part of his body was proper. The body didn’t have hands, legs, ears, nose and eyes. There was just a sign of those parts. Blood and pus used to flow continuously from his eyes, ears, nose and arteries of the heart. Also he was suffering from Vayurog. He was taken to an unknown place by his mother and was taken care of.

 

A person, who was blind by birth, used to live in the same town and the one who can see was assisting him. This blind person was very dirty and used to stink a lot. Flies used to buzz around him. He used to beg for his livelihood.

 

Once I came to this town. ‘Samavasaran’ was established outside the town. King Vijay left with his huge family to listen the sermon. Due to lot of movement around the blind person asked his assistant, “May be there is a festivity in the town, otherwise there won’t be such hustle and bustle around. An assistant replied, ” Yes, Lord Mahavir has come to the town and everyone is visiting him for the salutation. Listening to this he said, “Let’s go, we too shall have the same. ”

 

Both reached Samavasaran, completed 3 Pradakshinas (walking in circle around the Lord) and bowed down. Everyone listened to the sermon and went back.

…………………………..

 

Looking a blind person in the Samavasaran, Gautam asked me, “Oh Lord, can a person be blind from the birth? ”

I replied, “Yes Gautam, such people do exist and there is one in this town too. Son of King Vijay and Queen Mrugadevi is blind by birth. And not a single part of his body is proportionate. Queen Mrugadevi is secretly taking care of him.”

 

Listening this, Gautam left to look for Mrugaputra. Mrugadevi was very happy looking at first Ganadhar, Gautam swami, at her door. She folded her hands and asked the motive behind his arrival.

Gautam replied, “Lady, I am here to see your son.

Mrugadevi brought all his 4 sons born after Mrugaputra and said, “Swami, these are my 4 sons.”

 

Gautam said, “No, I am here to see the elder one, who is blind by birth and who has been hidden by you underground.”

Surprised Mrugadevi asked, “Prabhu, how do you know this secret? ” Gautam replied that his preceptor Lord Mahavir told him about this.

 

It was a time of meal for Mrugaputra when this conversation was on. That’s why Mrugadevi asked Gautam swami to wait.

 

Queen went to change her dress and entered the kitchen. From there, she collected huge plenty food in a carriage, brought it towards Gautam swami and asked him to accompany.

 

Both entered the basement. She covered her face and asked Gautam swami to do the same. Gautam swami covered the face with muhpatti. Mrugadevi turned her face backside and opened the door of the room. It started stinking badly immediately after opening the door. How bad it was? It was like a smell of dead carcasses of cow, Buffalo, mouse, cat, which may have so many insects in it and very miserable to watch.

 

The queen fed his son. Mrugaputra was suffering from Bulimia since birth. That’s why food was digested immediately and got converted into blood as well. And immediately after that he puked everything with blood. He didn’t stop at that and started licking that vomit.

 

Looking at that scenario, Gautam swami thought, “Oh, how bad this soul is suffering from his sins of past births. I neither have seen the hell nor have experienced it but definitely the sufferings of Mrugaputra remind me about the suffering of the hell.

 

Soon, Gautam took a leave from Mrugadevi and came back to me. He bowed down and asked, “Oh Lord, what kind of evils of the past birth of that boy are resulting into such sufferings ? ”

 

I told him about the past birth of Mrugaputra.

…………….

 

There was a prosperous city called Shatdwar in the Bharatkshetra of this Jambudweep. A king named Dhanapati ruled there. Close to this city was a city called Vijayavardhamana, where Rathore (representative appointed by the king) ruled as Ikkai. There were five hundred villages under him. He was very unrighteous, and felt pleasure in committing sin. He did these types of Papacharanas(sins) :

 

 

  • Excessive taxation of 500 villages under him.
  • Farmers to get double grain by paying less money.
  • Accumulation of money by paying bribe or taking more interest.
  • To blame people for violence etc.
  • To give high status to unqualified person by taking money.
  • To tolerate thieves by not punishing them.
  • Burning village to village

Distress rather than assisting passersby on the go.

  • Turn people away from religion.
  • Harass rich and make them poor.
  • Turn away from promises given to the big people.
  • Considering that it is his duty to make people suffer.
  • Continuous consumption of illusion, falsehood

Ikai was spending his life, blaming his soul by committing many such sins. One day sixteen maharogas (severe diseases) were born in his body together, which were as follows:

  1. Breathing 2. Cough 3. Fever 4. Dah
  2. malabsorption 6. vaginal 7. wart 8. indigestion
  3. Visual 10. Mastectomy 11. Anorexia 12. Pain of the eye
  4. Ear pain 14. Itching 15. ascites 16. Leprosy

 

These sixteen diseases were terrible, incurable and equivalent to death. These diseases were not being tolerated by him. He called the servants and asked them to call such vaidyas (doctors) who can cure my diseases. Even if sixteen diseases cannot be removed, let’s get rid of one disease and make such a declaration that the person who will remove any disease will get a lot of money.

On the orders of the king, the servants announced. Hearing that many Vaidyas and Vaidyaputras came to cure, a variety of medicines were given. Many types of medical work were done. But not a single one of the sixteen diseases had calmed down, eventually everyone went exhausted.

Ikai Raja, suffering from physical anguish, made a great rant on his kingdom and he died one day. Completing the age of two hundred and fifty years, he went to the first hell called Ratnaprabha, and after suffering a lot of pain there, he completed his Ayushya and became the son of Mrugadevi.

Ever since this child was in the mother’s womb, many anguish also arose in the mother’s body. Not only this, she also became unpleasant to King Vijay. For these reasons the queen decided about miscarriage. They made many efforts for this, but he survived due to the strong age of children.

The child was born, he was very ugly, so Mriga ordered Ghai to throw the child in the garbage. But smart Ghai told the king. The king himself came to the queen and said, “Devnupriya! This is your first pregnancy. If it is thrown in the garbage, then future subjects and descendants also will not remain stable. ” So the queen obeyed the king and started raising the child secretly.

Gautam! The bitter bites of deeds tied up in the former birth are being enjoyed by Mrugaputra in this house.

After knowing the past and present of Mrigaputra, Gautam Swami got curious to know the future of Mrigaputra, so he asked modestly.

***

“Lord ! Where will Mrigaputra originate after receiving death from here? ”

Gautam! Mrigaputra will live in this house for 24 years, after completing Ayushya, he will be born as a lion in the foothills of Vaithadhyagiri in the region of Bharatpur. By committing a lot of sin in the lion’s house, he will commit gross inauspicious deeds. After dying from there, suffering in the first hell till a sagaropam will be born in the cunt of a reptile (animal walking on the arm and chest). There will also earn papakarma by committing violence.

 

After completing the period from there, after suffering the suffering of three sagaropam in the second hell, the bird will be born in the vulva. Here too, by tying many deeds, in the third hell you will suffer seven sagaropam. Will take birth in the lion’s house from there. By killing many creatures as a Leo, its inauspicious deeds will lead it to the fourth hell.

 

After suffering extreme and terrible sorrow of hell, will be born as serpent. From there too many sins will lead it to go to the fifth hell.

After suffering many sagaropam, this mrigaputra will be born as a woman. From that life, will go to the sixth hell by tying up karmic karma by various types of subjects.

After suffering from unbearable areas there will be a human being. From there too, sin will  take it in the seventh hell. Even after suffering the terrible miseries of the seventh hell, he will not get rid of it. Will become Aquatic Panchendriya ‘Tiryanch’. There it will get birth and death millions in each of the twelve and a half million total categories.

Similarly, in the form of Uraparisarp and Bhujparisarp, in the Chatrapad animals, in Khechar, in the Chaurindriya, the Teendriya, the Beendriya will also make millions.

Similarly, in eccentricity, vegetative, airborne, teukay, apkaya and prithvakaya will also receive death in every yoni and in each kulakotti by taking birth millions of times.

 

In this way, the soul of Mrigaputra after traveling for a long time, due to slow down of his evil deeds, will arise as an ox in a city called Supratisthapur. At the beginning of the rain, when he is digging the soil on the banks of the Ganges river, he will fall there and die. Will die and be born as a son in the house of the superior of this city.

 

It would be coincidental with Panchamahavratdhari Guru Bhagwant in his youth. He will adopt character after listening to his face. By following the Shramana life for a long time, after criticizing the trespasses at the end, after attaining a period of righteousness, he will be born in the first heaven called Saudharma.

 

Having died from there, in the Mahavideh region, will be born in the house of the superior ‘Shrimant’. There will be salvation by performing deeds, consuming character and finally decaying all actions.

After listening to the present-day misery of Mrigaputra, sins of the past and hearing of future degradation, the sinful persecution of Apapapuri sitting in the court of King Hastipal became more fierce.

कार्तिक अमावस की रात्रि के दो प्रहर बीत चुके थे, तीसरा आरा समाप्ति की कगार पर था, सोलह प्रहर से भी अधिक समय तक समवसरण में लगातार देशना देकर प्रभु ने विराम लिया तो मानो गंगा का प्रवाह थम सा गया, मानो मन्दिर में घण्टनाद रुक गया हो।

 

प्रभु की अन्तिम देशना पूर्ण हुई। रत्न-सिंहासन से प्रभु उठे और समवसरण के तीन गढ़ उतर कर प्रभु राजा हस्तिपाल की शुल्कशाला में पधारे।

 

प्रभु अपने ज्ञान से जानते थे, कि आज रात्रि पूर्ण होने से पूर्व मेरा मोक्ष होगा। गौतम स्वामी का अपने प्रति असीम स्नेह है यह भी प्रभु जानते थे, और यह स्नेह ही गौतम स्वामी के केवलज्ञान में बाधा डाल रहा है, इसलिए ‘मुझे गौतम के इस स्नेह को तोड़ना चाहिए’ ऐसा केवलज्ञान चक्षु से देख कर प्रभु ने गौतम स्वामी को निकट के गाँव भेजने का, अन्त समय में स्वयं से दूर भेजने का निर्णय लिया।

 

हस्तिपाल राजा की शुल्कशाला में प्रभु का आगमन : शुल्कशाला में प्रभु के समक्ष हजारों श्रमण विराजमान थे। गौतम स्वामी अग्रिम पंक्ति में बिराज रहे थे। अनन्त करुणासागर प्रभु ने गौतम स्वामी की ओर दृष्टि स्थिर करते हुए कहा, “गौतम ! (गोयमा !)”

 

प्रभु के मुख से गौतम स्वामी को यह अन्तिम सम्बोधन था, यह सिर्फ शब्द नहीं, अपितु कोयल की मधुर कूज थी,  यह सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि समुद्र की लहरों का संगीत था। प्रभु के श्रीमुख से अपने नाम का सम्बोधन सुनते ही गौतम स्वामी हर्षान्वित हो गए।

 

विनयमूर्ति गौतम स्वामी का रोम-रोम नाचने लगा। दोनों हाथ जोड़कर, मस्तक झुकाते हुए वे प्रभु के चरणों में उपस्थित हुए। अत्यन्त मृदुस्वर में बोले, “भंते ! कृपा कीजिए ! आज्ञा कीजिए !”

 

प्रभु बोले, “समीप के गाँव में देवशर्मा नामक एक ब्राह्मण रहता है, वह तुम्हारे द्वारा बोधि प्राप्त करेगा, अतः उसके कल्याण के लिए तुम्हें वहाँ जाना है।”

 

देवशर्मा को प्रतिबोध देने हेतु गौतम स्वामी की विदाई : “जैसी आपकी आज्ञा प्रभु ! आपने मुझ पर अनन्त कृपा की, मैं धन्य हुआ।” कहते हुए गौतम स्वामी शीश झुकाकर शुल्कशाला से बाहर निकले। चार ज्ञान के स्वामी गुरु गौतम को यह ध्यान भी नहीं रहा कि ये दर्शन अन्तिम दर्शन हैं। अब प्रभु का ऐसा तेजस्वी औदारिक देह पुनः देखने को नहीं मिलेगा। किन्तु प्रभु की आज्ञापालन के अतिरिक्त गौतम स्वामी को और कुछ दिखाई नहीं देता। अस्सी वर्ष के गौतम स्वामी अट्ठाईस वर्ष के युवक जैसी फुर्ती दिखाते हुए देवशर्मा को प्रतिबोध देने हेतु और प्रभु-वचन को सार्थक करने हेतु अपापापुरी से बाहर निकल पड़े।

 

कार्तिक अमावस्या का तीसरा प्रहर पूर्ण हुआ। चतुर्थ प्रहर शुरू हुआ, उस समय स्वाति नक्षत्र में चन्द्र का योग था। प्रभु को चौविहार छठ का तप था, जो उनका अन्तिम तप था। प्रभु की साधना का प्रारम्भ भी छठ से हुआ, और पूर्णाहुति भी छठ से हुई। प्रभु ने सोलह प्रहर की देशना अभी-अभी पूर्ण की ही थी। तीर्थंकर नामकर्म के कारण प्रभु के मुख पर खेद या ग्लानि का तनिक मात्र भी अंश दिखाई नहीं दे रहा था। सूर्यमुखी के फूल की भाँति प्रभु का शरीर अत्यन्त स्वस्थ था, प्रभु के मुख पर सौम्यता एवं प्रसन्नता थी। आयुष्य पूर्ण होने में बस कुछ ही समय बाकी था। सुधर्मा स्वामी आदि हजारों श्रमण, चन्दना आदि अनेक श्रमणियाँ, काशी तथा कौशल देश के लिच्छवी जाति के नौ राजा, तथा मल्लिक जाति के नौ राजा, इस प्रकार अठारह गणराज्यों के राजा तथा अनेक श्रावक एवं श्राविकाएँ प्रभु के सम्मुख उपस्थित थे। ये अठारह राजा चेटक (चेड़ा) राजा के सामन्त थे। अमावस के दिन वे सभी उपवास के साथ पौषध में थे।

 

प्रभु की धर्मदेशना का पुनर्प्रारम्भ : समवसरण में विराम को प्राप्त प्रभु की वाणी का प्रवाह फिर से बहने लगा। प्रभु की इस धर्म-देशना का मुख्य विषय था – ‘विपाक’। विपाक का अर्थ है ‘फल’, विपाक अर्थात् शुभाशुभ कर्म परिणाम, विपाक अर्थात् पुण्य एवं पाप कर्मों का फल। जो आत्मा पाप करती है, उसे दुःख प्राप्त होते हैं, और जो आत्मा पुण्य करती है, उसे सुख प्राप्त होते हैं। या फिर, कर्म के फल के रूप में अनुकूलता प्राप्त हो, तो यह पुण्य का परिणाम है, और प्रतिकूल अनुभव पाप का परिणाम है।

 

पाप विपाक अध्ययन : यह सदैव ध्यान देने योग्य है, कि जीव ने जो भी कर्म बाँधे हैं, उनका फल उसे इसी जन्म या अगले जन्मों में भोगना ही पड़ता है। अनन्तज्ञानियों का वचन है, “कडाण कम्माण  मोक्ख अत्थि।” अर्थात् किए हुए कर्मों का फल भोगे बिना आत्मा की मुक्ति सम्भव नहीं है।

 

समान्यतः सुख सबको प्रिय होता है और दुःख कोई नहीं चाहता। जिसे दुःख नहीं चाहिए उसे पापाचरण नहीं करना अतः इसलिए अन्याय, अत्याचार, वेश्यागमन, प्रजा-पीड़न, रिश्वतखोरी, पंचेन्द्रिय की हिंसा, निरपराधी पशुओं को प्रताड़ना, मद्यपान, कषाय, स्वार्थवृत्ति, भोग-आसक्ति, यज्ञ, मांस-भक्षण, निर्दयता, चोरी, कामवासना आदि अधम कृत्यों का त्याग करना आवश्यक है। जो व्यक्ति ऐसे अधम कार्य करता है, वह घोर कर्म बाँधता है, फलस्वरूप नरक आदि दुर्गति में उत्पन्न होकर भारी दुःख सहन करता है। यहाँ मृगापुत्र का दृष्टान्त प्रसिद्ध है। ऐसा कहकर प्रभु ने पापविपाक के ५५ अध्ययनों की प्ररूपणा प्रारम्भ की।

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मृगापुत्र

 

प्रभु ने मृगापुत्र का दृष्टान्त विस्तार से बताना शुरू किया।

 

इसी जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में मृगाग्राम नामक एक नगर था, वहाँ विजय नामक क्षत्रिय राजा राज्य करता था। उसकी पत्नी का नाम मृगा था। वह अत्यन्त रूपवती स्त्री थी। सांसारिक सुख भोगते हुए उन्हें एक पुत्र हुआ, जिसका नाम रखा गया – मृगापुत्र।

 

पूर्वकृत कर्मों के उदय के कारण मृगापुत्र जन्म से ही अन्धा, गूंगा, बहरा, लूला और जुगुप्सनीय विचित्र आकृति वाला था। उसके शरीर का एक भी अंग ठीक नहीं था। उसके शरीर में हाथ-पैर, आँख, नाक, कान आदि थे ही नहीं। उन अंगों के स्थान पर उनका चिह्न कहा जा सके, सिर्फ ऐसी आकृति थी, वह भी बिना ठिकाने की थी। उसकी आँख, नाक और कान के छिद्रों और हृदय से जुड़ी नाड़ियों में से बार-बार रक्त और मवाद निकलता था, उपरान्त उसे वायु रोग भी था। माता मृगादेवी उस बालक को गुप्त स्थान पर रखकर उसको भोजन आदि देकर उसका पालन करती थी।

 

***

 

उसी नगर में एक जन्माँध व्यक्ति रहता था और एक अन्य दृष्टिवान व्यक्ति उसकी सहायता करता था। यह अन्धा व्यक्ति शरीर से अत्यन्त मैला और दुर्गन्ध वाला था, उसके चारों ओर मक्खियाँ भिनभिनाती रहती थी। यह व्यक्ति मृगाग्राम में घर-घर भीख माँगकर अपना जीवन यापन करता था।

 

एक बार इस नगर में मेरे पगलिए हुए, नगर के बाहर समवसरण की रचना हुई थी। राजा विजय अपने विशाल परिवार के साथ धर्मदेशना सुनने के लिए निकला। हजारों लोगों की चहल-पहल के कारण उस अन्धे व्यक्ति ने अपने सहायक से पूछा, “आज नगर में बड़ा उत्सव लगता है, अन्यथा इतनी चहल-पहल  नहीं होती।” तो उसके सहायक ने कहा, “हाँ ! आज श्रमण भगवान महावीर हमारे नगर में पधारे हैं, उनके दर्शन-वन्दन के लिए सब लोग जा रहे हैं” यह सुनकर उस अन्धे व्यक्ति ने कहा, “चलो ! हम भी प्रभु के पास चलते हैं।”

 

दोनों समवसरण में पहुँचे, तीन प्रदक्षिणा दी, वन्दन और नमस्कार किया। तत्पश्चात् पूरी सभा ने धर्मश्रवण किया, और अन्त में सब यथास्थान चले गए।

 

***

 

समवसरण में जन्माँध व्यक्ति को देखकर गौतम ने मुझसे प्रश्न किया, “भगवन् क्या ऐसे भी लोग होते हैं, जो जन्म से अन्धे हो?”

 

मैंने कहा, “हाँ गौतम ! ऐसे लोग होते हैं, और ऐसा एक व्यक्ति इसी नगर में है। इस नगर के राजा विजय और रानी मृगादेवी का पुत्र जन्म से अन्धा है, और उसका कोई भी अंग प्रमाणयुक्त नहीं है। रानी मृगादेवी गुप्तरूप से उसका पालन कर रही है।”

 

यह सुनकर गौतम मेरी अनुमति से मृगापुत्र को देखने के लिए उसके घर गए। प्रथम गणधर गौतम स्वामी को साक्षात् देखकर मृगादेवी अत्यन्त आनन्दित हुई। वह हाथ जोड़कर बोली, “भगवन्त ! आप अभी यहाँ किस प्रयोजन से आए ?”

 

गौतम ने कहा, “देवानुप्रिये ! मैं तुम्हारे पुत्र को देखने के लिए आया हूँ।”

 

यह सुनकर मृगादेवी, मृगापुत्र के बाद उत्पन्न हुए अपने चार पुत्रों को सुन्दर वस्त्र-अलंकार पहनाकर गौतम के पास लेकर गई, और बोली, “ये चारों मेरे पुत्र हैं, आप देख लीजिए।”

 

तो गौतम बोले, “मृगादेवी ! मैं इन्हें नहीं, तुम्हारे ज्येष्ठ पुत्र को देखने के लिए आया हूँ, जो जन्म से अन्धा है और जिसे तुमने तलखाने में छिपाकर रखा है।”

 

यह सुनकर मृगादेवी आश्चर्य से बोली, “भगवन्त ! आपको इस गुप्त रहस्य की जानकारी कैसे हुई?” तो गौतम बोले, “मेरे धर्माचार्य श्रमण भगवान महावीर ने मुझे बताया।”

 

जब यह संवाद चल रहा था, उस समय मृगापुत्र के भोजन का समय हो गया था, अतः मृगा रानी ने गौतम से कहा, “प्रभु ! आप यहीं रहिए, मैं अभी मेरे ज्येष्ठ पुत्र के दर्शन आपको करवाती हूँ।”

 

यह कहकर रानी वस्त्र परिवर्तन करके भोजनशाला में गई, वहाँ छोटी बैलगाड़ी के आकार की गाड़ी में विपुल मात्रा में अनेक प्रकार के भोजन के बर्तन लिए और गाड़ी खींचते हुए गौतमस्वामी के पास आई, और बोली, “प्रभु आप मेरे साथ चलिए।”

 

दोनों तलगृह में पहुँचे, रानी ने अपना मुख चार परत वाले वस्त्र से ढका, और गौतम स्वामी को भी अपना मुख ढकने की विनती की। गौतम स्वामी ने भी मुँहपत्ती बाँधी। तलभँवरे का कक्ष निकट आते ही मृगा रानी ने मुँह उल्टा करके कक्ष का द्वार खोला। द्वार खुलते ही जोर से दुर्गन्ध आई। कैसी दुर्गन्ध थी? कोई गाय, भैंस, बिल्ली, कुत्ता, चूहा, हाथी, घोडा, शेर, बाघ, बकरे आदि की सड़ी-गली लाश, जिसमें असंख्य कीड़े सड़ रहे हों, जो अत्यन्त अशुचिमय और विकृत हो, दिखने में जो अत्यन्त जुगुप्सनीय हो, ऐसी दुर्गन्ध से भी अनेक गुना अनिष्ट, अमनोहर, अप्रिय और अमनोज्ञ दुर्गन्ध थी।

 

रानी मृगा ने साथ लाया हुआ भोजन अपने पुत्र को खिलाया। उसे जन्म से ही भस्मक रोग था, इसलिए भोजन उदर में जाते ही तुरन्त पच गया, और वह रक्त और मज्जा में परिवर्तित हो गया। फिर तुरन्त ही उसे उस रक्त और मवाद का वमन भी हो गया, और इतना ही नहीं, वह अपने ही वमन को खुद चाट गया।

 

यह देखकर गौतम को विचार आया, “अहो ! यह जीव पूर्व जन्मों के कैसे घोर पापों का फल इस भव में भुगत रहा है। नरक और नारकी जीवों को तो मैंने नहीं देखा, किन्तु इस मृगापुत्र की वेदना सच में नरक की वेदना याद दिला रही है।”

 

तत्पश्चात् गौतम मृगा रानी से अनुमति लेकर वहाँ से निकले, और मेरे पास आए, वन्दन करके मुझसे पूछा, “प्रभु ! पिछले भव में इस बच्चे ने कौनसे ऐसे कर्म बाँधे, कि इस भव में वह ऐसे घोर दुःख भुगत रहा है?”

मैंने गौतम को मृगापुत्र के पूर्वभव की बात कही।

 


 

इसी जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में शतद्वार नामक समृद्ध नगर था। वहाँ धनपति नामक राजा राज्य करता था। इस नगर के निकट विजयवर्धमान नामक एक नगर था, वहाँ इक्काइ नामक राठौड़ (राजा द्वारा नियुक्त प्रतिनिधि) राज्य करता था। उसके अधीन पांच सौ गांव थे। वह अत्यन्त अधर्मी था, और पाप करने में ही मौज का अनुभव करता था। उसने इस प्रकार के पापाचरण किए:

 

  • अपने अधीन पांच सौ गांवों पर अत्यधिक कर लगाना।
  • किसानों को कम पैसे देकर दोगुना अनाज लेना।
  • रिश्वत देकर या अधिक ब्याज लेकर धन का संचय करना।
  • लोगों पर हिंसा आदि के गलत इल्जाम लगाना।
  • पैसे लेकर अयोग्य व्यक्ति को उच्च पद देना।
  • चोरों को दण्ड न देकर उनका पालन करना।
  • गाँव के गाँव जला देना
  • राह चलते राहगिरो को सहायता करने की बजाय परेशान करना।
  • लोगों को धर्म से विमुख करना।
  • श्रीमन्तों को परेशान करके गरीब बनाना।
  • बड़े लोगों के सामने वादा करके मुकर जाना।
  • प्रजा को पीड़ा देने को ही कर्तव्य मानना।
  • माया, झूठ प्रपंच का लगातार सेवन करना

 

ऐसे अनेक पाप करके अपनी आत्मा को कलुषित करते हुए इक्काइ अपना जीवन व्यतीत कर रहा था। एक दिन उसके शरीर में एक साथ सोलह महारोग उत्पन्न हुए, जो इस प्रकार थे:

 

1. श्वास 2. खांसी 3. बुखार 4. दाह
5. कुक्षिशूल 6. भगंदर 7.  मस्सा 8. अजीर्ण
9. दृष्टिशूल 10. मस्तकशूल 11. अरुचि 12. आँख की वेदना
13. कान की पीड़ा 14. खुजली 15. जलोदर 16. कुष्ठ

 

ये सोलह रोग भयानक, असाध्य और मृत्यु के समकक्ष थे। इक्काइ से ये रोग सहन नहीं हो रहे थे। उसने सेवकों को बुलाकर कहा, कि मेरे रोग दूर कर सके, ऐसे वैद्यों को बुलाकर मेरी चिकित्सा करवाओ। सोलह रोग भले ही दूर न कर सके, लेकिन एक रोग तो दूर करवाओ और ऐसी घोषणा करवाओ कि जो ये रोग दूर करेगा, उसे बहुत अधिक धन मिलेगा।

 

राजा की आज्ञा से सेवकों ने घोषणा करवाई। सुनकर अनेक वैद्य और वैद्यपुत्र उपचार करने के लिए आए, विविध प्रकार की औषधियाँ दी गई। अनेक प्रकार के चिकित्साकर्म किए गए। किन्तु सोलह में से एक भी रोग शान्त नहीं हुआ, अन्ततः सब लोग थक-हार कर चले गए।

 

शारीरिक वेदना से पीड़ित इक्काइ राजा ने अपने राज्य आदि पर अत्यधिक राग-मूर्छा की, और एक दिन उसकी मृत्यु हो गई। दो सौ पचास वर्ष की आयु पूर्ण करके वह रत्नप्रभा नामक पहली नरक में गया, और वहाँ घोर पीड़ा भोगकर अपना आयुष्य पूर्ण करके मृगारानी का पुत्र बना।

 

यह बालक जब से माता के गर्भ में था, तब से माता के शरीर में भी अनेक वेदनाएँ उत्पन्न हुई। इतना ही नहीं, वह राजा विजय की भी अप्रिय बन गई। इन कारणों से रानी ने गर्भ गिराने का निर्णय किया। इस हेतु उसने अनेक प्रयास किए, किन्तु सन्तान का आयुष्य प्रबल होने के कारण वह जीवित रहा।

 

बालक का जन्म हुआ, वह बहुत कुरूप था, इसलिए मृगा ने घाई को आदेश दिया, कि बच्चे को कचरे में फेंक दो। किन्तु चतुर घाई ने राजा को बता दिया। राजा स्वयं चलकर रानी के पास आया और कहा, “देवानुप्रिये ! यह तुम्हारा प्रथम गर्भ है। यदि इसे कचरे में फेंक दिया तो भावी प्रजा और सन्तति भी स्थिर नहीं रहेगी।” इसलिए रानी ने राजा की बात मानी और बालक को गुप्त रूप से पालने लगी।

 

गौतम ! पूर्व भव में बाँधे कर्मों का कटु विपाक इस भव में मृगापुत्र साक्षात् भोग रहा है।

 

मृगापुत्र का भूत और वर्तमान जानने के बाद गौतम स्वामी को मृगापुत्र का भविष्य जानने की जिज्ञासा हुई, इसलिए उन्होंने विनयपूर्वक प्रश्न किया।

***

 

“प्रभु ! मृगापुत्र यहाँ से मृत्यु प्राप्त करके कहाँ उत्पन्न होगा?”

 

“गौतम ! मृगापुत्र इस भव में २६ वर्ष तक जिएगा, आयुष्य पूर्ण करके वह जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र के वैताढ्यगिरि के तलहटी में सिंह के रूप में उत्पन्न होगा। सिंह के भव में अत्यन्त पाप करके वह घोर अशुभ कर्म बाँधेगा। वहाँ से मरकर पहली नरक में एक सागरोपम तक पीड़ा भोगकर सरीसृप ( भुजा एवं छाती के बल  चलने वाले पशु ) की योनी में उत्पन्न होगा। वहाँ भी हिंसादि करके पापकर्म उपार्जित करेगा।

 

वहाँ से काल पूर्ण करके दूसरी नरक में तीन सागरोपम की  पीड़ा भोगकर पक्षी योनी में उत्पन्न होगा। यहाँ भी अनेक कर्म बाँध कर तीसरी नरक में सात सागरोपम की पीड़ा भोगेगा। वहाँ से सिंह के भव में जन्म लेगा। सिंह के भव में अनेक जीवों को मारकर अशुभ कर्म बाँधते हुए चौथी नरक में उत्पन्न होगा।

 

नरक के घोर-अतिघोर दुःख सहन करके वहाँ से च्यवन करके सर्प के भव में उत्पन्न होगा। वहाँ भी अनेक पाप करके पांचवी नरक में जाएगा।

 

अनेक सागरोपम दुःख सहन करके यह मृगापुत्र काल करके स्त्री के रूप में उत्पन्न होगा। उस भव में अनेक प्रकार के विषय कषायों द्वारा क्लिष्ट कर्म बाँध कर वह छठी नरक में जाएगा।

 

वहाँ असह्य क्षेत्रज वेदनाएँ भोगकर वहाँ से निकल कर मनुष्य बनेगा। वहाँ भी पापकर्म करके सातवीं नरक में उत्पन्न होगा। सातवीं नरक के भयंकर दुःख भोगकर भी उसे छुटकारा नहीं मिलेगा। वहाँ से निकलकर जलचर पंचेन्द्रिय तिर्यंच गति में मछली, मगर, ग्राह, सुंसुमार आदि जाति की समस्त योनियों और साढ़े बारह लाख कुल कोटियों में प्रत्येक में लाखों बार जन्म-मरण को प्राप्त करेगा।

 

इसी प्रकार चतुष्पद पशुओं में, उरपरिसर्प और भुजपरिसर्प के रूप में, खेचर में, चउरिन्द्रिय, तेइन्द्रिय, बेइन्द्रिय में भी लाखों भव करेगा।

 

इसी प्रकार एकेन्द्रिय में वनस्पतिकाय, वायुकाय, तेउकाय, अप्काय और पृथ्वीकाय में भी प्रत्येक योनी में और प्रत्येक कुलकोटि में लाखों बार जन्म लेकर मृत्यु को प्राप्त करेगा।

 

इस प्रकार दीर्घकाल तक भव-भ्रमण करने के बाद मृगापुत्र की आत्मा, कुछ कर्म हल्के होने के कारण सुप्रतिष्ठपुर नामक नगर में एक बैल के रूप में उत्पन्न होगा। वर्षाऋतु के प्रारम्भ में वह गंगा नदी के किनारे वह जब मिट्टि खोद रहा होगा, वहीं गिरकर उसकी मृत्यु होगी। मरकर इसी नगर के श्रेष्ठी के घर पुत्र के रूप में जन्म लेगा।

 

उसका युवावस्था में पंचमहाव्रतधारी गुरु भगवंत के साथ संयोग होगा। उनके मुख से धर्म-श्रवण करके वह चारित्र अंगीकार करेगा। दीर्घकाल तक निरतिचार श्रमण जीवन का पालन करके अन्त में अतिचारों का आलोचन – प्रतिक्रमण करके समाधिपूर्वक कालधर्म प्राप्त करके वह सौधर्म नामक प्रथम देवलोक में उत्पन्न होगा।

 

वहाँ से मृत्यु पाकर महाविदेह क्षेत्र में श्रीमन्त श्रेष्ठी के घर जन्म लेगा। वहाँ कलाभ्यास करके, चारित्र ग्रहण करके अन्त में सभी कर्मों का क्षय करके मोक्ष जाएगा।

 

मृगापुत्र के वर्तमान काल का दुःख, भूतकाल के पाप एवं भविष्य की दुर्गति का श्रवण करके राजा हस्तिपाल की शुल्कशाला में बैठी अपापापुरी की पापभीरु पर्षदा अधिक भीरु बनी।7

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