
दिल्ली – 2020 – फरवरी का महिना – गुजरात विहार जैन संघ में मेरी शिविर थी। ‘Picture of the Picture’ Topic पर मेरा प्रवचन था। उस प्रवचन में मैंने आज-कल के पिक्चर्स का पोस्टमार्टम किया था। प्रवचन सुनने के बाद कुछ युवा लड़के-लड़कियाँ मेरे पास जिज्ञासावश आये।
एक युवा ने भूमिका बनाते हुए कहा, ‘साहेबजी! आप युवाओं के टोपिक्स पर प्रवचन करते हो इसलिए आप हमारे जैसे युवाओं की समस्याओं को अच्छी तरह से समझ पायेंगे ऐसा हमारा विश्वास है, हमारी एक उलझन का सोलुशन लेने के लिए आपके पास हम आये है। महाराज साहेब! आप ही बताइयें हमारें जैन धर्म में पुरूष-महिलाओं के बीच भेदभाव क्यों किया जाता है? विशेष रूप से महिलाओं के प्रति अन्याय किसलिए?
मैंने कहा, हमारे जैनशासन में भेदभाव को कोई अवकाश नहीं है, विशेष रूप से श्वेताम्बर सम्प्रदाय में पुरुष-महिला को समान माना जाता हैं। यहाँ जैसे पुरुष साधु बन सकता है, वैसे ही स्त्री भी साध्वी बन सकती है जैसे पुरुष मोक्ष में जा सकता है, स्त्री भी केवलज्ञान पाकर मोक्ष में अवश्य जा सकती है। यहाँ पर पुरुष को ही मोक्ष में जाने का कोई ठेका नहीं दे रखा है।’
अपने साथ आयी लड़कियों के सामने उँगली करते हुए उस युवा ने सीधा ही पूछा लिया। ‘हमारे बहनों को पीरियड के तीन दिन के समय में अपने जिनालयों में प्रवेश क्यों नहीं करने देते है? जब कि पीरियड तो एक नेचुरल प्रोसेस है।’
मैं पूरी बात समझ गया। आज की नई पीढी जिस स्कूल में पढ़ाई कर रही है या तो जिस मोबाइल में से आज ज्ञान ले रही है उसे वहाँ से बार-बार एक ही संदेश मिल रहा है कि, परिपक्व उम्र में आने वाले पीरियड्स नोर्मल एवं नेचुरल है। ऐसी अवस्था में सारा कार्य कर सकते हैं, जैसे कि स्कूल में पढ़ने के लिए भी जा सकते है, जॉब के लिए भी जा सकते हैं, रसोई भी बना सकते है, यहाँ तक कि मंदिरों में भी दर्शन करने के लिए ख़ुशी से जा सकते है। ऐसे पीरियड के समय में आपको रोकनेवाले आपके दुश्मन है। भेद-भाव करने वालों में से है। पुरुषसत्ताक समाज के प्रतिनिधि है, जो हमेशा महिलाओं को अपने पैर की जूती समझकर व्यवहार करते आये है। उन लोगों के कारण ही महिलाओं की प्रगति रुंध गई है, महिलाओं को अबला माना जाता है या महिलाओं को पीछड़ा माना जाता रहा है। ये नेचुरल बोडी प्रोसेस है, इसमें महिलाओं ने ऐसा क्या अपराध कर लिया कि उन्हें ऐसे पवित्र स्थानों से भी वंचित रखा जाता है? ऐसी बेडियों को तोड़ना ही सच्चा पराक्रम है, पीरियड के समय में तो खास मंदिर में जाना चाहिए ताकि पुरानी दकियानूसी सोच को बदला जा सके, ऐसी-ऐसी बातों से आज बहनों के दिमाग भरे जा रहे है। महिला सशक्तिकरण के नाम से ऐसी बातों का फीडिंग किया जा रहा है।
मैंने उस युवा को जवाब देना शुरू किया। देख... अपने शरीर में से जब अशुचि बहती है, तब हम शुचिमय (पवित्र) स्थान में नहीं जाते हैं। चाहे वह पुरुष हो या महिला, इसमें कोई भेदभाव नहीं है। पसीने जैसी सामान्य अशुचि में जा सकते हैं, मगर मल-मूत्र जैसी या रक्त बहने जैसी विशेष अशुचि में जाना प्रतिबंधित हो, तो इसमें प्रश्न ही कहा है? मम्मी डायपर जैसी कुछ चीज पहनाकर जैसे अपनी संतानों को मंदिर में ले जाया करती है, वैसे यहां पर पॉसिबल नहीं है क्योंकि छोटे बच्चों को शुचि-अशुचि का ज्ञान नहीं है, लेकिन बड़ी हो गई बहनों को इसका स्पष्ट बोध है। बच्चा पहले से ही मल-मूत्र से लिप्त हो तो डायपर पहनाकर भी नहीं ले जा सकते हैं, यहाँ तो अशुचि का पता चलने के बाद मंदिर में घुसाने के लिए ही कुछ दुष्टों के द्वारा महिलाओं के प्रेरित किया जा रहा है।
और, बात सिर्फ़ अशुचि को रोकने तक सीमित नहीं रहती है, पीरियड में मंदिर नहीं जाने के पीछे का रहस्य कुछ अलग ही है।
5 अगस्त – 2022 के दिन रिलीज़ हुई पिक्चर ‘मासूम सवाल’ इसी विषय पर बनी थी।
एक छोटी बेटी प्रतिदिन दादीमाँ के साथ उँगली पकड़कर मंदिर जा रही थी, लेकिन जैसे ही वो छोटी बेटी बड़ी हुई, उसके पीरियड की शुरुआत हुई, दादीमाँ ने उसे मंदिर जाने से रोक दिया।
पिक्चर में बेटी को रोता दिखाया है, एक ऐसा इमोशनल सीन क्रिएट किया जाता है, मानो यह प्रतिबंध एक अत्याचार हो। मासूम बेटी पर किए गए अत्याचार (?) में न्याय दिलाने हेतु एक लेडी वकील आगे आती है, कोर्ट में कैस दायर करती है, OMG - 1 की तरह केस में जीत हांसिल करके बेटी को ऐसी पीरियड वाली अवस्था में मंदिर में प्रवेश दिलवाने में सफलता पाती है। लेकिन पिक्चर को OMG की तरह सफलता प्राप्त नहीं हुई है, निष्फलता ही मिली है, Thanks to Indian Culture...
भारतीय संस्कृति को तहस-नहस करने के लिए कितने खतरनाक दुष्प्रचार हो रहे है, इस की यह एक बानगी मात्र है। ‘मासूम सवाल’ पिक्चर के पोस्टर के ऊपर ही एक खतरनाक सीन है। सेनेटरी पेड के बीच श्री कृष्ण का फोटो चिपकाया गया है, भगवान की इससे ज्यादा गंदी मज़ाक़ और क्या हो सकती है भला?
एक लड़की इंस्टाग्राम में एक वीडियो बनाकर विकृति की सारी हदें पार करती है। मेन्स्ट्रुअल ब्लड तुलसी के पौधे में डालकर बोलती है, देखिए, इस तुलसी के पौधे को कुछ नहीं हुआ, इसलिए पीरियड के दिन में तुलसी को नहीं छूना चाहिए ऐसी सारी बातें बकवास है।
कोई दूसरी लड़की घर में बनाये पापड़ या अचार को छूकर बोलती है, ‘देखिए, मैं पीरियड में हूं और इसे छू रही हूँ फिर भी इस पर कोई गलत असर नहीं दिख रही है। हमारी संस्कृति में बताई गई सारी की सारी बातें बकवास है।’
ऐसा कहने वाली बेचारी लड़कियों को पता ही नहीं है, ऐसे वीडियो बनाकर हमारी संस्कृति की गहरी जड़े आप उखाड़ने का कितना भी प्रयास करो, उखड़ने वाली नहीं है।
मैं उन लड़कियों को पूछता हूं, वीडियो बनाते वक्त आप सच बोल रही हो या झूठ कौन चेक कर सकता है?
1. आप पीरियड में ना भी हो और झूंठ बोल रही हो कि मैं पीरियड में हूँ तो?
2. एक या दो मिनट में कोई चीज ना बिगड़े इसका अर्थ यह थोड़ी ना होता है कि से चीज पर कोई असर नहीं हुई है।
जो पापड़ लम्बे अरसे तक टिकने वाला हो वह थोड़े ही दिनों में बिगड़ने लगे या जो अचार सालभर तक टिक सकता है, वो दो-चार महीने में ही सड़ने लगे तो इसका अर्थ क्या हुआ?
पीरियड वाली महिलाओं के छूने से यह सब होता है और यह सारा देखा हुआ सच है। पापड़ बनाने वाली फैक्ट्रीयों में जाकर चेक कीजिए तो पता चलेगा।
अमेरिका में रहने वाले मूल भारतीय कार्डियोलोजीस्ट Dr. श्री निशा पिल्लइ ने वीडियो जारी करके एक अद्भुत रहस्य खोला है। पीरियड में हिन्दू धर्म के मंदिरों में क्यों बहनों को प्रवेश नहीं? इसका वैज्ञानिक कारण बताया है।
डॉ. निशा पिल्लइ केराला की कोट्टायम मेडिकल कोलेज की डीग्री लेकर USA गये और उन्होंने न्यूयोर्क में अपनी फेलोशिप पूरी की थी। अभी वो न्यूयोर्क के प्रतिष्ठित लोंग आइलेण्ड ज्यूइश मेडिकल सेन्टर में कार्डियोलोजीस्ट के रूप में सेवा दे रहे है।
डॉ. निशा पिल्लइ अपने वक्तृत्व (संभाषण) में आधुनिक विज्ञान एवं आधुनिक मेडिकल सायन्स की मर्यादाओं को भी खुलकर बताते है।
मुस्लिम धर्म की मस्जिद या क्रीश्चन धर्म के चर्च हो, हिंदु मंदिरों से बहुत ही अलग है, दोनों के बीच में (हिंदु मंदिर एवं मस्जिद-चर्च के बीच में) बहुत बड़ा अंतर होता है। चर्च या मस्जिद सिर्फ़ प्रार्थना करने के स्थान है (Worshiping Place), लेकिन हिंदु मंदिरों में उनके अधिष्ठायक देवी-देवताओं का वास (निवास) होता है। हिंदु मंदिरों में मूर्ति को जीवंत व्यक्ति माना जाता है और मंदिरों को उनका निवासस्थान माना जाता है।
मोबाइल फोन में जैसे
1. हार्डवेयर
2. सोफ्टवेयर और
3. बेटरी
इस प्रकार तीन चीज महत्त्वपूर्ण होती है, ठीक उसी तरह अपने शरीर में भी
1. भौतिक (बाह्य) शरीर
2. मन
3. उर्जा
इस प्रकार तीन महत्त्वपूर्ण है।
वर्तमान विज्ञान सिर्फ और सिर्फ शरीर को ही मानता है। मन और उर्जा के बारे में उसे ज़्यादा गहराई में पता ही नहीं है।
मनुष्य के शरीर में जो उर्जा है, वो 72,000 नाडियों में बहती है। जिसे आधुनिक विज्ञान ज्ञानतंतुओं के साथ जोड़कर देखता है।
सात चक्रों में जो मूलाधार नाम का चक्र है वो अपनी स्पाइनल कोड के सबसे नीचे के हिस्से में रहा हुआ चक्र है। उस मूलाधार चक्र में भारी मात्रा में उर्जा का संग्रह होता है।
आयुर्वेद की दृष्टि में शरीर के अंदर पांच प्रकार के वायु रहते हैं, जिसके नाम है
1. प्राण
2. समान
3. व्यान
4. उदान
5. अपान
बहनों को जो लेबर पेन (प्रसूति की पीड़ा) होती है, या फिर माहवारी के दिनों में अशुद्ध रक्त निकलता है, उसके लिए अपान वायु जिम्मेदार है। अपान वायु का मुख्य कार्य है शरीर के अंदर जमा हुए कचरे को मल-मूत्र इत्यादि माध्यमों से बाहर निकाल देना।
अपान वायु पुरुष के गुप्त अंग या महिलाओं के बच्चेदानी इत्यादि प्रजनन अंगों में से बहता है। जब किसी महिला को बच्चा पैदा होने वाला हो या तो जब कोई महिला पीरियड में आई हो तब उनके शरीर की ऊर्जा का चक्र नीचे की ओर बहना शुरू कर देता है। उर्जा के साथ-साथ अपान वायु भी एक्टिवेट (गतिशील) हो जाता है।
यदि माहवारी के तीन दिनों में महिलाएं मंदिर में प्रवेश करती है तो मंदिर में उपस्थित उर्जा महिला के शरीर में स्थित उर्जा को ऊपर की दिशा में धकेलने की कोशिश शुरू कर देती है, क्योंकि मंदिर का माहौल ही ऐसा है, जहां उर्जा का ऊर्ध्वीकरण होने लगता है।
एक ओर शरीर में प्रवृत्त अपान वायु कचरे को बाहर फेंकने के लिए नीचे की और गतिशील होता है और दूसरी ओर मंदिर का एटमॉस्फेयर (वातावरण) उर्जा को ऊपर की ओर धकेलने लगता है, इस घर्षण में महिलाओं को भयंकर स्वास्थ्य हानि का सामना करना पड़ सकता है। यदि मंदिर की उर्जा के प्रभाव से महिला का रक्त यूटरस (बच्चेदानी) की ओर चढ़ने लगे तो उनकी रक्तवाहिनियों का ब्लॉक हो जाने का जोखिम है। रक्तवाहिनियों के ब्लॉक होने से युटरस को नुकसान भी हो सकता है, वह महिला जीवन भर के लिए वंध्या (unfertile) भी बन सकती है। ऐसा भयानक नुकसान ना हो इसलिए हमारी बहन-बेटियों को पीरियड के दौरान मंदिर में जाने का निषेध किया जाता है। मंदिर जाने पर परमात्मा की पवित्रता जोखिम में आ जाने की बात बाद में है, सबसे पहले तो उन महिलाओं का स्वास्थ्य ही जोखिम में आने की संभावना है। महिलाओं को भविष्य में नुकसान होने की बात बाद में है, वर्तमान में ही नुकसान होने की संभावना है, क्योंकि कई सारी बहनों को ऐसा अनुभव हो चुका है कि जब वह पीरियड के दौरान मंदिर में घुसने गइ तो उन्हें भयंकर पेटदर्द का सामना करना पड़ा।
अमेरिका के एयरफोर्स की पायलट के भी यहां पर अनुभव आपको बता देते हैं। एन्डोमेट्रीयोसिस नाम के रोग की शिकार आज अनेक महिलाएं बनती है, उसमें अमेरिका लेडी पायलट भी है। ये एक ऐसा रोग है, जिसमें पीरियड का ब्लड बॉडी के ऊपर के पार्ट में ट्रेवल करना शुरू कर देता है, कई जगह तो पीरियड ब्लड के क्लोट्स हृदय तक भी पहुंचे हुए मिले हैं।
अमेरिकन पायलट जब पीरियड के दौरान हवाई जहाज उड़ाती है, ऊपर ले जाती है तो उसे पेट में भयंकर ऐंठन (Cremp) महसूस होने लगते हैं, इसका कारण तो उन्हें पता नहीं लग पाया लेकिन हकीकत यही लग रही है कि, पीरियड के दौरान रक्त का गमन जब नीचे की ओर हो तब हवाई जहाज को ऊपर ले जाने पर उस रक्त के गमन की दिशा बदल जाती होगी या उस प्रक्रिया में अवरोध आता होगा। जो नास्तिक लड़कियां हो वो इसे स्वीकार ना करें तो भी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है, क्योंकि कई सारी रिसर्च और सर्वे के आधार पर यही प्रतीत हुआ है, कि जो भी महिला पीरियड के दौरान मंदिर में गई है उसे भयानक नुकसान ही हुआ है।
जो मर्यादाएँ है, उसकी कुछ लोग हंसी उड़ाते है, लेकिन मेरा उन लोगों को एक मासूम सवाल है, (आधुनिक विज्ञान के अंधभक्तों को मेरा एक मासूम सवाल है) कि, यदि आधुनिक विज्ञान की विभिन्न खोजों से मेंन्स्ट्रुएशन हेल्थ इम्प्रूव हुई हो तो PCOD – PCOS – ओवरी केन्सर – IVF सेन्टर्स, माहवारी में गड़बड़ी, इन्फ़र्टिलिटी इत्यादि (महिलाओं की) समस्या क्यों बढ़ रही है?
कोई मुझे जवाब ढूंढकर लाये, जवाब ना दे पाये तो भगवान की बातों पर कम से कम जनाब! थोड़ी श्रद्धा लाये...
[ लेख में उपयुक्त सामग्री के लिए आभार – डॉ. निशा पिल्लइ, श्री वीरेन्द्र सिंह, संजय वोरा पत्रकार... ]
શું ન કરવું તે બરાબર, સમાઈક ન કરવી,વગેરે નહીં કરવું, પરંતુ શું કરવું તે કોઈ મહાત્મા કેતા નથી.
This blog is very insightful.
A big thanks to Sahebji for writing it. It's crucial for the current youth to understand, who either don't believe in this or struggle to explain it to others due to a lack of knowledge.
Keep sharing such insightful blogs👍🏻