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अतिथि देवो भव

Updated: Apr 7, 2024




छगनभाई के घर के आंगन में मधुमक्खी का छत्ता लगा हुआ देखकर मगनभाई ने कहा, ‘भाई! आपके तो आंगन में ही मधुमक्खी का छत्ता है, तो आपको तो मुफ्त में शहद मिल जाता होगा ना?’

यह सुनकर छगनभाई ने जवाब दिया कि, ‘नहीं, शहद तो नहीं मिलता, पर भिखारियों और मेहमानों से अवश्य राहत मिलती है।’

जिसके घर के द्वार पर मीठा मधुर शहद लगा हुआ है, उसका दिल कितना कड़वा? ऐसी भावना में मानवता बची ही कहाँ है? जो दूसरों का तिरस्कार करते रहते हैं, वे स्वयं भी तिरस्कृत हुए बिना नहीं रहते।

उत्तम दिल के मनुष्य तो दान, पूज्य और अतिथि के सत्कार के अवसर की राह तककर ही बैठे होते हैं। आकस्मिक आने वाले अतिथि के कदमों से कृत्य-कृत्य बन जाते हैं। हमारी भारतीय संस्कृति में अतिथि सत्कार की भावना का बड़ा ही महत्व है। इसीलिए कहा गया है, “अतिथि देवो भव” अतिथि भगवान का रूप होते हैं।

गुजराती कहावत भी है कि,

“चढ़ता दिननुं पारखुं, नित आवे मेहमान; 

उतरता दिननुं पारखु, घर ना आवे श्वान”

यदि हमारे घर रोज मेहमान आए, तो समझ लेना – चढ़ती (उन्नति के) सौभाग्य के दिन चल रहे हैं। और यदि हमारे घर पर श्वान (कुत्ता) भी नहीं आता हो, तो समझ लेना कि, हमारी पड़ती (दुर्भाग्य) के दिन चल रहे हैं।

जैनशासन को नयसार, धन सार्थवाह के किए गए अतिथि सत्कार से क्रमशः श्रमण भगवान महावीर, और प्रभु श्री ऋषभदेव की प्राप्ति हुई है। तो संगम और सुरुचि के किए गए अतिथि सत्कार से शालिभद्र और धन्नाजी की जोड़ी प्राप्त हुई है।

आज अगर आपके घर पर अतिथि, मेहमान, या साधु-संत पधारते हैं, तो क्या आपके दिल में आनंद होता है?

आज तो पूरा विपरीत तंत्र चल रहा है। आपके घर ऐसे टॉवर बन गए हैं, कि जिस में कोई कुत्ता, बिल्ली, गाय को तो Entry ही नहीं है, गरीब और भिखारियों को भी Entry ही नहीं है। यहाँ तक कि पूज्य साधु-साध्वीजी भगवंत को भी Direct Entry नहीं है। आपने ऐसी Lifestyle को अपना लिया है जिससे जीवदया, अनुकंपा, साधर्मिक भक्ति या सुपात्रदान रूप अतिथि सत्कार आपके लिए बहुत दुर्लभ हो गए हैं। यह दर्शाता है कि आपके परम दुर्भाग्य के दिन चल रहे हैं।

बाकी, श्रमण भगवान महावीरस्वामी के समय में पुणिया नामक श्रावक था। वह अत्यंत अल्प परिग्रही और दिन-रात सामायिकादि धर्मक्रिया में रत रहता था। उसकी पत्नी भी ऐसी ही भावनाशील थी। दोनों के सामायिक की तो भगवान श्री महावीरदेव ने भी प्रशंसा की थी। उनका अतिथि सत्कार भी उतना ही जबरदस्त था। एक दिन पुणिया श्रावक उपवास करके मेहमान को भोजन कराता था, और दूसरे दिन उसकी पत्नी उपवास करके अतिथि को खाना खिलाती थी। अतिथि सत्कार की भावना तो ऐसी होनी चाहिए कि देवों को भी उसका आस्वाद लेने का मन हो जाए।

पर शहरी जीवन दिन-प्रतिदिन संस्कृति से दूर होता जा रहा है। रविशंकर महाराज ने बताया है कि:

“इकट्ठे मिलकर खाना गांव की संस्कृति है, 

और इकट्ठा करके खाना शहर की संस्कृति है”

“जहां कुत्ता मर जाए तो भी पता चल जाए वह गाँव, और जहाँ इंसान मर जाए फिर भी पता नहीं चले वह शहर।”

कौआ भी भोजन मिलने पर काँव-काँव करके सभी कौओं को इकट्ठा करके खाता है। क्या आज का मानव कौए से भी गया-गुजरा हो गया!!!

चलो, हम संकल्प करते हैं कि :

अब इकट्ठा करके नहीं, इकट्ठे मिलकर खायेंगे।

अपना भोजन किसी साधु, संत, साधार्मिक या अतिथि को देकर उसे अमृत भोजन बना देंगे।

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