अनीति से पैसा मिलता है या पुण्य से?
- Aacharya Shri Abhayshekhar Suriji Maharaj Saheb
- Oct 31, 2021
- 8 min read
Updated: Apr 7, 2024

अनीति से अंतराय बँधता है यह जिनोक्त बात हमने पिछले लेख में बैंक के दृष्टांत से देखी। इस लेख में हम इसे शास्त्रीय तर्क के द्वारा देखेंगे।
श्री बृहत्कल्पसूत्र की 1049 वीं गाथा की टीका में Reference के रूप में दी गई गाथा में कहा है कि:
दरव्वं खेत्तं कालं भावं च भवं तहा समासज्ज।
तस्स समासुदिट्ठो उदओ कम्मस्स पंचविहो॥
अर्थात्, द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव और भव के अनुसार उन कर्मों का पांच प्रकार से हो रहे उदय को संक्षिप्त में बताया गया है।
अर्थात्, हमारे कर्मों पर द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव और भव, इन पांचों का प्रभाव होता है। जो इस तरह है:
? द्रव्य : अस्थमा के Patient को फिलहाल अच्छा है, कोई तकलीफ नहीं है, शाता वेदनीय का उदय चल रहा है। पर जैसे ही वह दही या केला खाएगा तो यह द्रव्य शाता के उदय को स्थगित कर देगा। अशाता का उदय चालू हो जाएगा। साँस की तकलीफ चालू हो जाएगी। फिर जैसे ही वह योग्य दवाई लेगा तो इस द्रव्य के कारण, फिर से अशाता के उदय को रोककर शाता का उदय चालू हो जाएगा। साँस फिर से नोर्मल हो जाएगा।
श्री अरिहंत परमात्मा रूपी द्रव्य के सान्निध्य में आये हुए जीवों पर उनकी ऐसी असर होती है कि, वैरी जीवों के वैरजनक कर्म शांत पड़ जाते हैं। वासनातुर जीवों के वासनाजनक कर्म शांत पड़ जाते हैं। इसे द्रव्यों का कर्मों पर हो रहा असर कहते हैं।
? क्षेत्र : अस्थमा का Patient मुंबई में आये तो अशाता का उदय चालू रहता है। साँस लेने की तकलीफ चालू रहती है। मारवाड़ में जायेगा तो शाता का उदय हो जाता है, साँसे नोर्मल हो जाती हैं।
बाजार से दूर के एरिया में मात्र एक चौथाई पैसा खर्च करके भी बढ़िया शो रूम बन सकता हो तो भी व्यापारी नहीं बनाता, क्योंकि वहाँ पैसा कमाने वाले पुण्य को उदय में नहीं लाया जा सकता है। अपने जीवन में चालू दिनों में दानांतराय के उदय वाले जीवों को भी हम तीर्थक्षेत्र में उदारता से दान देते हुए देखते हैं। तो यह हुआ क्षेत्र का असर।
? काल : गर्मियों में दमे के रोगी को राहत मिलती है। पर चौमासे में या सर्दियों में तकलीफ हो जाती है। जिन्हें रोज नवकारशी करना भी मुश्किल लगता है; वैसे लोग पर्युषण में अट्ठाई कर लेते है। पूरे वर्ष में जितनी कमाई ना हुई हो उतनी कमाई सीजन के मात्र 15 दिनों में ही हो जाती है, ऐसा कईं व्यापारियों का अनुभव है। यह है काल का कर्मों पर होता असर।
? भाव : हम नये साल के पहले दिन मांगलिक क्यों सुनते हैं ? घर से बाहर जाते समय 3 नवकार क्यों गिनते हैं ? क्योंकि इस मांगलिक श्रवण या नवकार का स्मरण करने से जो शुभ भाव प्रगट होते हैं, उसका असर हमारे जीवन में विघ्न लाने वाले पापकर्मों पर पड़ता है। वे कर्म या तो निर्मूल हो जाते हैं, या फिर उनका पावर नष्ट हो जाता है।
तीव्र क्रोध से अशाता का उदय होता है जो B.P. आदि की तकलीफों को बढ़ा देता है। यह भावों का कर्मों पर होता असर है।
? भव : देव और नारकी के भव ऐसे हैं कि जहाँ अवधि ज्ञानावरणीय कर्मों का क्षयोपशम हो ही जाता है। और चारित्र मोहनीय पर ऐसा असर पड़ता है कि, देव चाहे कितना ही प्रचंड वैरागी या तीव्र अनासक्त हो, पर चारित्र मोहनीय का क्षयोपशम होता ही नहीं है।
हमारे यहाँ अषाढ़ाभूति आचार्य की बात आती है। वे अपने शिष्यों को आगाढ़ जोग (ऐसे जोग कि जिसको बीच में नहीं छोड़ सकते है) करा रहे थे। पर एक रात्रि को अचानक उनका कालधर्म हो गया। मृत्यु उपरांत वे देव हुए। तुरंत ही अवधिज्ञान का उपयोग रखा। क्रिया कराने वाले वे सिर्फ एक ही थे। और अब खुद काल कर चुके थे, तो शिष्यों का क्या होगा ? इस चिन्ता से शिष्यों के प्रति की करुणा से उन्होंने अपने ही शरीर में दिव्य शक्ति से प्रवेश कर लिया। शिष्यों को इस बारे में कोई कल्पना तक नहीं थी। वे देव अब साधुवेश में आ गए। साधुत्व की सारी क्रियाएँ एकदम शुद्ध तरीके से करते थे, फिर भी सर्वविरति के परिणाम नहीं आए।
पक्षी को उड़ने की कला का, मछली को तैरने की कला का क्षयोपशम हो ही जाता है। यह सब भव का कर्मों पर हो रहा असर है।
इस प्रकार इन द्रव्यादि पांच चीजों की असर हमारे कर्मों पर होती है। इसीलिए जब किसी मुमुक्षु को दीक्षा लेनी हो तो स्थिरहस्त, लब्धिसंपन्न आचार्यभगवंत के हाथों से रजोहरण मिले, जहाँ अशोक वृक्ष आदि की उपस्थिति हो ऐसे प्रशस्त क्षेत्र में दीक्षा मिले, मंगल दिन, मंगल घड़ी, मंगल मुहूर्त पर संयमवेश और रजोहरण की प्राप्ति और लोच एवं ‘करेमि भंते’ का उच्चारण होता है। खुद के उछलते भाव हो, आस-पास की हजारों की मेदनी का शुभ भाव हो, शुभ आशीर्वाद हो, उन भावों में ज्यादा शुभता घुलती जाये, उसके लिए देववंदन, नंदीसूत्र श्रवण यानी कि शुभ भावों की तीव्रता के अनुभव के साथ सर्वविरति की प्राप्ति हो। इन सभी बातों को महत्व दिया जाता है।
और हाँ! यह सब कुछ सिर्फ मानव भव में ही सम्भव है, अन्य किसी भी गति में नहीं! इन सभी की मुमुक्षु के प्रत्याख्यानावरण कषाय रूप चारित्र मोहनीय कर्म पर ऐसी असर पड़ती है कि जिससे उसका क्षयोपशम होता है। (मुमुक्षु को भावचरित्र की प्राप्ति होती है।) यह क्षयोपशम स्थिर हो जाता है, निर्मल हो जाता है, आजीवन टिके रहता है, और मुमुक्षु अपनी अंतिम साँस तक सुंदर संयम का पालन कर सकता है।
हमें इन पांचों में से मुख्यतया भावों का कर्मों पर जो असर होता है, उसे देखना है।
जब हम शुभभावों में झूल रहे होते है, तब उन शुभभावों का हमारे कर्मो पर मुख्य 8 प्रकार से असर पड़ता है:
नये-नये पुण्यकर्मों का बंध होता है।
पुराने बाँधे हुए और वर्तमान सत्ता में जो पापकर्म होते हैं उनके थोड़े अंश का नये बंध रहे पुण्य में संक्रमण (transfer) होता है।
जो पुण्यकर्म बँधते हैं; वे और ज्यादा पावर वाले बँधते हैं।
कुछ पाप ऐसे होते हैं कि जो पुण्यकाल में भी साथ-साथ बँधते ही रहते है, पर वे मंद रस वाले बँधते हैं।
पुण्यकर्म उदय में आते हैं, आने की सम्भावना बढ़ती है।
जो पुण्यकर्म उदय में हैं और जो नये आ रहे हैं उन पुण्यकर्मों का पावर बढ़ जाता है।
पापकर्मों का उदय स्थगित हो जाता है, होने की सम्भावना बढ़ती है।
जिन पापकर्मों का उदय चालू है उनका पावर घट जाता है।
इसी तरह अशुभ भावों का भी हमारे कर्मों पर मुख्य 8 प्रकार से असर होता है:
? नये-नये पाप कर्म बँधते हैं।
? पुराने बाँधे हुए और वर्तमान में सत्ता में जो पुण्यकर्म होते है; उनके थोड़े अंश का नये बँध रहे पाप में संक्रमण होता है, अर्थात उतना हिस्सा अब पाप रूप बन जाता है।
? जो पापकर्म बँधते हैं, वे और ज्यादा पावर वाले बंधते हैं।
? कुछ पुण्य ऐसे होते हैं कि जो पापकाल में भी साथ-साथ बँधते ही रहते है, पर वे मंद रस वाले बँधते हैं।
? पापकर्मों का उदय होता है, होने की सम्भावना बढ़ती है।
? जो पापकर्म उदय में हैं, और जो नये आ रहे हैं, उन पापकर्मों का पावर बढ़ जाता है।
? पुण्यकर्मों का उदय स्थगित हो जाता है।
? जिन पुण्यकर्मों का उदय चालू है उनका पावर घट जाता है।
? तो शुभ भावों में ही रहने जैसा है ना! अशुभ भाव करने जैसे नहीं हैं ना !
हम सभी को संकल्प करना चाहिए कि,
परिस्थिति चाहे जो भी आ जाये, मैं मेरे भावों को ‘शुभ’ रखने के लिए जी जान लगा दूँगा, पर अशुभ नहीं बनने दूँगा।
इस प्रकार, हमने कर्मों पर द्व्यादि पांच चीजों की और मुख्यतया भावों की जो असर होती है उसे देखा।
अब हम हमारे विषय पर बात करते हैं।
लोगों का अनुभव है कि अनीति करने से पैसा मिलता है, और प्रभु कहते हैं कि अनीति से अंतराय खड़े होते हैं। तो इन दोनों में सच क्या है?
एक बात फिर से याद कर लेते हैं, कि:
‘सुखं धर्मात् दु:खं पापात्’
अनीति तो पाप है, उससे पैसे का सुख मिल सके, यह कदापि संभव नहीं है। पैसा तो पुण्य से ही मिलता है। इसीलिए अनीति करके पैसा मिल जाता है, ऐसे अनेक अनुभव अवश्य होते हैं, किन्तु जब ऐसे आदमी का पुण्य खत्म हो जाता है, तब वह अनीति पैसा नहीं दिलाती, पर जेल की सलाखें दिलाती हैं।
जब तक पुण्य बैलेन्स में है, तब तक जीव उसे किस तरह उदय में लाता है? यह महत्वपूर्ण है। नीति, प्रामाणिकता को बरकरार रखकर भी (व्हाईट चैक से भी) उसे उदय में लाया जा सकता है। और अनीति से भी (ब्लेक के पैसे से भी) उदय में लाया जा सकता है। वह पुण्य जब उदय में आता है तब जीव को पैसा मिलता है। नीति-प्रामाणिकता के लिए धैर्य रखना पड़ता है। अनीति से काम तत्काल हो जाता है। (यह पंचमकाल का दुष्प्रभाव है) पर अनीति अशुभ भाव है। वह उदय में आये हुए पुण्य के पावर को तोड़ देती है। मतलब कि यदि किसी व्यक्ति को ऐसा पुण्य उदय में आया है कि, यदि उसे अनीति, विश्वासघात आदि का अशुभ भाव नहीं होता तो उसे 10 लाख रुपये मिल सकते थे। पर जीव ने अनीति की, इसलिए पुण्य की हानि हुई, पुण्य का पावर टूट गया। इसलिए जीव को सिर्फ 1 लाख मिले, पर उसके पुण्य के बैलेन्स से 10 लाख का पुण्य खर्च हो गया / debit हो गया। बाकी के 9 लाख की प्राप्ति होने में अंतराय हुआ ना ? पर पुण्य की बैलेन्स से 10 लाख का पुण्य debit हो गया है।
अनीति के अशुभ भाव से उसको क्षति पहुँची और उससे उसका पावर टूटकर 1 लाख के जितना ही हो गया। इस हकीकत का जीव को पता ही नहीं चलता, वह तो ‘अनीति करने से उसे 1 लाख रुपये मिले हैं’ इतना ही समझता है, इतना ही देखता है। इसलिए अनीति से पैसा मिलता है ऐसा बोलता है। पर प्रभु अपने केवलज्ञान में ऊपर की सारी हकीकत देखते हैं, जानते हैं, इसलिए प्रभु अनीति से 9 लाख का अंतराय हुआ है ऐसा कहते हैं।
यह तो जो अंतराय तत्काल हुआ, सिर्फ उसकी बात हुई। अनीति के अशुभ भाव से नया पाप, और वह भी ज्यादा पावर वाला पाप बँधता है। कालान्तर में जब वह उदय में आयेगा तब जीव को, यदि उसने लाख रुपये की अनीति की हो तो कम से कम 10 लाख का तो फटका पड़ेगा ही। जीव के अनीति के परिणाम ज्यादा संक्लिष्ट होते हैं। अपने पिता के साथ, सगे भाई के साथ, या किसी भी व्यक्ति के साथ अनीति की हो, तो ज्यादा संक्लेश होने के कारण ज्यादा तीव्र पाप बँधता है। 30-40 लाख का या करोड़ों का भी नुकसान करवा सकता है। यह है अनीति का भावी दुष्परिणाम।
इस प्रकार अनीति से वर्तमान में अंतराय आता है, और भविष्य में दारुण दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं। इसलिए हर आत्मार्थी को अनीति का त्याग करना चाहिये।
जिस तरह अनीति से आत्मा का अहित होता है, उसी तरह नीति से कमायी हुई संपत्ति पर भी मूर्च्छा और ममता करने से भी आत्मा का अहित होता है। मम्मण सेठ के जीवन में हिंसा आदि कोई पाप नहीं थे, कि जो उसे सातवीं नरक में ले जाये। पर अपनी अमाप संपत्ति की अत्यधिक मूर्च्छा उसे सीधे सातवीं नरक में ले गई। संपत्ति को उसने जरा भी भोगा नहीं था फिर भी उसकी दुर्गति हुई।
संपत्ति तो शालिभद्र को भी बहुत मिली थी, उसने तो उसे भोगा भी था। फिर भी उसकी आत्मा का अहित नहीं हुआ। क्योंकि उसने उस संपत्ति में स्वामित्व भाव की कोई मूर्च्छा नहीं रखी थी।
अर्थात्, धन की मूर्च्छा से आत्मा का अहित होता है इसलिए इसे तोड़ने के लिए दानधर्म का उपदेश दिया जाता है। और दान, शील, तप और भाव, इन चारों धर्मों में अपेक्षा से दानधर्म का पालन करना आसान है। धन्ना सार्थवाह आदि की तरह दानधर्म के द्वारा धर्म में प्रवेश करना सुलभ होता है। इस कारण भी महात्मा दानधर्म का उपदेश देते हैं।
हाँ! औचित्य तो सर्वत्र बनाये रखना होता ही है। अपना घर जलाकर दूसरों के घर दिया नहीं जलाना है। खुद निर्धन हो जाये उस तरह से दान देने का किसी ने भी नहीं कहा है। और प्रायः इस तरह से कोई दान देता भी नहीं है।
बाकी तो जो श्रीमंत और धनवान लोग दान नहीं देते, उनके जीवन में या तो मम्मण ब्रांड धन की कातिल मूर्च्छा होती है या भयंकर विषय-विलास होता है। ये दोनों जीव का सत्यानाश करने वाले हैं, इसलिए धनिकों के लिए दानधर्म ही शरण है।
अस्तु।
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