अनुमोदना का अपूर्व अवसर
- Sanjay Bhai Vakhariya
- Sep 23, 2020
- 2 min read
Updated: Apr 12, 2024

उच्च शिखरों से सुशोभित मंदिरों के दर्शन से हमारी आत्मा को अतीव आनंद की अनुभूति होती है। परंतु, यह आनन्द उन शिलाओं का आभारी है, जिन्होंने उच्च शिखरों के निर्माण हेतु भूगर्भ में स्थापित होकर अपना बलिदान कर दिया।
समग्र विश्व में आज जिनशासन का डंका बज रहा है, पहले भी बजता था और भविष्य में भी यह प्रवाहमान रहेगा। जिनशासन की इस जाहो-जलाली में अप्रत्यक्ष रूप में श्रमणी भगवंतों का उल्लेखनीय योगदान रहा है।
? श्राविकाओं में संस्कार की स्थापना करने वाली सौम्यशीला हैं श्रमणी !
? घर-परिवार को धर्म की ओर अभिमुख कराने वाली सौम्यशीला हैं श्रमणी !
? स्वयं के तप-त्याग और वैराग्य से अनंत जीवों को भावित कराने वाली सुगंधशीला हैं श्रमणी !
श्रमण प्रधान संघ के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ऐसे अनेक श्रमणी भगवंत हैं, जो कि ‘आधारशिला’ (फाउण्डेशन स्टोन) बन कर जिनशासन के शिखर पर लहराती धर्मध्वजा को अडोल और अकंप रखने हेतु अपना मूक बलिदान दे रही हैं; और जिनशासन व जिनमंदिर को स्थायित्व प्रदान कर रही हैं।
आज हम अनुमोदना कर रहे हैं एक श्रमणी भगवंत की। नाम नहीं बता रहा हूँ। कारण, श्रमणी भगवंत स्वयं नाम के प्रचार-प्रसार से निर्लिप्त रहते हैं। परंतु, उनकी गुप्त साधना के कारण मैं हृदय से उनको अभिवंदन करता हूँ।
पालीताणा मे… शत्रुंजय गिरिराज की पावन छत्र-छाया में वर्षों से विराजमान इन श्रमणी भगवंत ने तीस वर्ष की आयु में दीक्षा अंगीकार की थी। तभी से तप की धूनी रमाये हुए अपने बीस वर्ष के दीक्षा पर्याय में लगभग सभी प्रकार के तप पूर्ण कर लिये हैं। मासखमण, सिद्धितप, सिंहासन तप आदि तमाम तपस्याओं की लम्बी श्रृंखला अनवरत रूप से गतिमान है।
हम एक दिन आयंबिल या एकासना कर लेते हैं तो दूसरे दिन सुबह नवकारसी में ही खाने के लिए बैठ जाते हैं। जबकि यह श्रमणी भगवंत मास-खमण का पारणा भी एकासना से करते हैं और साथ में यह भी संकल्प होता है कि एकासना के साथ पुरिमड्ढ का भी पच्चक्खाण लेना है।
आप श्रमणी भगवंत 17 बार गिरिराज की नव्वाणु यात्रा हो चुके हो । प्रत्येक यात्रा सूर्योदय के पश्चात उजाले में ही प्रारंभ की है।
दादा आदिनाथ के ऐसे परम भक्त है कि यदि पालीताणा में है तो निश्चित रूप से दादा के दर्शन किये बिना पच्चक्खाण नहीं पारते।
(अपवाद: चातुर्मास में यात्रा नहीं करते, सर्दियों में कुहरा छाया हुआ हो तो यात्रा नहीं करते, किंतु योग्य लगे तो धूप निकलने के बाद दोपहर में यात्रा करते, परंतु इन आठ महीनों में जिस दिन यात्रा न कर सके तो उपवास करते हैं ।)
आप श्री ने तो स्वाद पर इतनी विजय प्राप्त कर ली है कि पालीताणा में जहां उपधान, चौमासा, नव्वाणु आदि के बड़े-बड़े रसोड़े चलते हैं, परंतु आप श्री वहां से गोचरी ग्रहण नहीं करते। निर्दोष गोचरी ग्रहण करने के प्रति आप काफी चुस्त रहते हो ।
आप के पास उपधि के नाम पर दो जोड़ी वस्त्र और दो-चार पात्र के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार का परिग्रह नहीं।
इस प्रकार उत्तम जीवन जीने वाले श्रमणी भगवंत के अद्भुत संयम जीवन की हृदय की अतल गह-राइयों से अनुमोदना करना भी प्रचण्ड पुण्यबंधी पुण्य का हेतु है।
कहा भी गया है-
श्रेष्ठ आत्मगुणों का गुणानुवाद करने से वे गुण अपने जीवन में भी प्रतिष्ठित होते हैं।
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