जीवन की बारहखड़ी
- Aacharya Shri Abhayshekhar Suriji Maharaj Saheb
- Apr 11, 2021
- 7 min read
Updated: Apr 12, 2024

पिछले लेख में हम अनीति को टालने की बातों के बारे में सोच रहे थे। अनीति के विषय में एक अन्यधर्मी मेगेज़ीन में पढ़ी हुई कथा याद आ रही है।
एक अरबोंपति-खरबोंपति धनाढ्य श्रीमंत था। पूरा आस्तिक था। पुण्य, पाप, परलोक आदि सभी में दृढ़ श्रद्धावान था। यहाँ की विपुल संपत्ति का खुद को उतना उपयोग नहीं था। यह बहुत समझने जैसा है कि, खुद इतना हाथ-पैर मारकर कमा-कमाकर जो इकट्ठा करते हैं, उसमें से खुद के उपयोग में कितना आने वाला है? जीवन के लिए पैसा नहीं, पर पैसे के लिए जीवन है; ऐसा समझकर 25 करोड़, 50 करोड़, 100 करोड़; बढ़ाते ही जाओ, बढ़ाते ही जाओ; जैसे कि जीवन इसके लिए ही है। नया-नया बढ़ाने के प्लानिंग में ही रचे-पचे रहते हैं। इस तरह पैसे के पीछे जमकर पड़े हुए लोगों को यह जरूर सोचना चाहिये कि इस धन से मेरे उपयोग में कितना आयेगा ?
संतानों को बारहखड़ी सिखायी जाती है। क से कमल, ख से खरगोश, ग से गणेश; पर पैसे के लिए जीने वाले इन भाग्यशालियों को खुद फिर से इस तरह सीखना चाहिये कि क से कमाई, ख से खाना और ग से गँवाना।
ठहरो ! क से कमाई का मतलब पैसे की कमाई नहीं है। पैसे तो कमा लिए हैं। इन कमाये हुए पैसों के लिए मालिक के पास यह क, ख और ग ये तीन विकल्प हैं। या तो कमाये हुए पैसे से सुकृत की कमाई कर लें, या ‘ख’ से कमाये हुए पैसों से खा लें, यानी अपने उपयोग में लें। और यदि इन दोनों में से कुछ भी नहीं किया, तो ‘ग’ यानी पड़े हुए पैसों को गँवा दो। पैसों के लिए इन तीनों के सिवाय चौथा कोई विकल्प नहीं होता है।
क, ख और ग, इन तीन में से ‘ख’ का क्षेत्र बहुत ही मर्यादित है। 10 करोड़ कमाने वाला 1 रोटी खाता है, 20 करोड़ का मालिक 2 रोटी खाता है, 30 करोड़ का मालिक 3-3 रोटी खाता है – ऐसा कोई नियम नहीं है। कईं बार तो इससे उलटा ही होता है। गुजराती भाषा में दो तरह से वाक्य प्रयोग किया जाता है। जो लोग खर्चे के जितना, या उससे सामान्यत: ज्यादा कमाते हों, उनके लिए कहा जाता है कि खा-पीकर सुखी हैं। पर जो लोग खर्च से कईं गुना ज्यादा कमाते हैं, उनके लिए कहा जाता है कि पैसे-टके से सुखी हैं, उनके लिए खा-पीकर सुखी हैं, ऐसा नहीं कहा जाता। इसका मतलब ऐसा हुआ कि वे खा-पीकर सुखी नहीं होते हैं।
वे अपनी संपत्ति का सौवां नही, हजारवां हिस्सा भी खा-पी नहीं सकते।
लियो टोल्स्टोय एक तत्व विचारक थे। लोगों को बोध मिले इस हेतु से उन्होंने बहुत साहित्य की रचना की। उनमें से एक कथा इस प्रकार है:
एक किसान था। उसके छोटा सा खेत था। जितनी पैदाइश होती थी उसमें से वर्ष भर का खर्चा निकल जाता था, पर बचता कुछ भी नहीं था। एक बार उसको योगानुयोग से बचपन का एक पुराना मित्र मिल गया। उसने इस किसान से पूछा:
‘दोस्त ! क्या करते हो?’ किसान ने सारी बात बताई। किसान संतोषी था, इसलिए उसे शिकायत या दीनता जैसा कुछ भी नहीं था। पर मित्र ने उसके लोभ को उकसाया। ‘अरे! कोई बचत भी करेगा या नहीं? ऐसा कैसे चलेगा? कल को हाथ-पैर अटक जायेंगे तब क्या खायेगा ?’
‘पर यार! ज्यादा कुछ पैदा ही नहीं होता है। भूखे थोड़ी ही रह सकते है?’
‘देख! तुझे बड़ा खेत दिलाता हूँ। तू साईबेरिया चला जा, वहाँ मेरा एक मित्र जमींदार है। उसके पास बहुत सारी विशाल जमीनें हैं। मैं तुझे चिट्ठी लिखकर देता हूँ। तू चिट्ठी लेकर उसके पास चला जा। तू कहेगा उतनी जमीन वह तुझे दे देगा। उसमें जो ज्यादा पैदाइश होगी, उसकी बचत करना।
(‘जो हमारे कषायों को उत्तेजित करे ऐसी सलाह दे उसे वास्तव में मित्र कहेंगे याँ शत्रु? यह बात सबको शांति से सोचनी चाहिए।’)
किसान का संतोष हिल गया, और लोभ ने मन पर कब्जा कर लिया। मित्र की चिट्ठी लेकर साईबेरिया पहुँच गया, जमींदार से मिला। सारी बात करके चिट्ठी दी। जमींदार ने कहा, ‘देख! मेरे ये बंगले की कम्पाउन्ड वॉल के आगे तेरी नजर जहाँ तक पहुँचेगी, वहाँ तक मेरी ही जमीन है। तू ऐसा कर, कल सूर्योदय होने पर तुझे यहाँ से निकलना है और सूर्यास्त तक वापस इस दीवार पर आ जाना है। उस दरमियान तू जितनी जमीन पर चलेगा, वो सब तेरी।
किसान खुश हो गया। पूरी रात सुनहरे सपने देखने में निकाल दी। सुबह में जल्दी से उठकर तैयार हो गया। एक कंधे पर लगाया चाय का थर्मस और दूसरे कंधे पर लगाया ब्रेड का लंच बॉक्स, और बराबर सूर्योदय पर 6:00 बजे चलना शुरू कर दिया, बल्कि दौड़ने लगा। उसे लगा कि यह लंच बॉक्स घड़ी-घड़ी पैरों के साथ टकराकर दौड़ने में विघ्न पैदा करता है, आज ब्रेड नहीं खाया तो भी चलेगा। उसने वह फेंक दिया। थर्मस भी पैरों के साथ टकरा रहा था, ‘आज बिना चाय के दौडूँगा’ ऐसा मन को समझाकर थर्मस भी रख दिया।
दौड़ता ही रहा, 11:00 बज गये, 12:00 बज गये, शाम को 6:00 बजे सूर्यास्त होने वाला था। ‘अब मुझे return होना चाहिये’ यह खयाल आ गया था। पर ऐसा चान्स फिर से नहीं मिलने वाला था। थोड़ी ज्यादा जगह aquire कर लेता हूँ, वापसी में थोड़ा ज्यादा तेजी से दौड़ूँगा। 5/7 मिनट और आगे दौड़ा (वास्तव में 10-15 मिनट का फर्क हो गया था।) लोभ तो अभी भी आगे बढ़ने को कहता था। पर मन को समझाकर वापस आया, और कंपाउन्डड की वॉल की ओर दौड़ लगायी।
3:00 बज गये, 4:00 बज गये, 5:00 बज गये। बहुत थकान होने लगी, पूरा शरीर दुखने लगा। सांस चढ़ने लगी। उधर गांव के लोगों को सारी बात पता चल गयी थी। यह किसान जमीन ले पाता है? इस जिज्ञासा से दूर-दूर से लोग आने लगे। वे सभी इस किसान को चढ़ाने लगे, ‘भाई ! अब एक ही घंटा बाकी है, अंतर बहुत ज्यादा है, थोड़ी गति बढ़ाओ। किसान ने बची-खुची ताकत भी काम पर लगाकर गति बढ़ाई।
अब आधा घंटा बाकी, अब 15 मिनट बाकी, भाई दौड़ – दौड़, अब सिर्फ पाँच मिनट, अब दो ही मिनट। किसान जान की बाजी लगाकर दौड़ा। अब आधी मिनट, 15 सैंकंड, और ये सूरज डूब गया। उस समय किसान ने एक लंबी छलांग लगायी। पूरा जमीन पर लेट गया। और उसने हाथ की दोनों हथेलियों से कंपाउन्ड वॉल की बोर्ड़र को छू लिया। लोगों ने जय-जयकार किया। जमींदार को बंगले से बाहर बुलाया, ‘देख भाई ! इसने शर्त पूरी कर दी है। यह सारी जमीन आज से इसकी।’ पर जमींदार ने देखा कि किसान के प्राण पखेरू उड़ गए थे। (शत्रु की सलाह मानने पर ऐसा ही अंजाम आयेगा ना?)
लोगों ने जमींदार से पूछा, ‘अब क्या होगा ?’
जमींदार बोला, ‘अब क्या? अब तो ये मर गया ! मैं किसे जमीन दूँगा ?’
लोग, ‘पर वह इतना दौड़ा, फिर भी कुछ नहीं दोगे ?’
जमींदार, ‘नहीं, इसी जमीन में, मैं उसे पाँच फीट जगह दूँगा और उसमें उसकी कब्र बनाऊँगा।’
इतनी कथा सुनाकर लियो टोल्स्टोय ने सभी को पूछा,
“How much land does a man require?”
Family members – 3. बंगला 2,500 sq ft का, उसमें से परिवार के उपयोग में सिर्फ 500-700 sq ft आते हैं, बाकी के 2000 sq ft में ego रहता है।
विवाह प्रसंगों में खाने की dish 2000 रु. की होती है, मेहमान 200 की भी नहीं खाते होंगे। बाकी का रसोईया, महाराज, वेईटरो के परिवारों को जाता है, यानी ego खाता है।
एक बहुत ही बड़े उद्योगपति की श्राविका के अत्यंत आग्रह के कारण उनके farm house पर जाना हुआ। परिवार के सदस्य सिर्फ पाँच, खुद, श्राविका, बेटा-बहू और उनकी एक संतान। लेकिन इतना बड़ा area, सैंकड़ों नारियल, सुपारी, बादाम आदि के वृक्ष, विराट-विशाल निवासस्थान, विशाल farm house के maintenance के लिए नौकर-चाकरों का विशाल काफिला, B.M.W., लेम्बर्गिनी, रोल्सरोयस, फरारी, रेन्जर, अमर, मर्सिडीज, पोर्श – बड़ी-बड़ी महँगी 50 से ज्यादा गाड़ियाँ, इनमें से कुछ तो ऐसी कि उसे रोज drive करनी ही पड़े, वर्ना बिगड़ने लगे। ड्राइवरों को उस कार में रोज सैर करने को मिलता था।
इतनी सारी समृध्धियों का उपयोग मालिक को कितना? और नौकर-चाकर ड्राइवरों को कितना?
कितने सारे श्रीमंतो के farm-house, बंगले आदि हिलस्टेशनों पर होते हैं। खुद तो साल में दो-चार बार मुश्किल से जाते होंगे। वहां की शुद्ध हवा का आस्वाद लेने वाले तो नौकर-चाकर ही होते हैं। कभी-कभी weekend आदि में स्वजन मित्र होते हैं।
In short ‘ख’ का क्षेत्र बहुत ही limited है। बाकी के दो ‘क’ और ‘ग’ का क्षेत्र unlimited है। जो multi-millionaires अपनी संपत्ति से सुकृतों को नहीं साध लेते हैं, उनके ‘क’ का क्षेत्र भी बहुत limited या nil जैसा हो जाने से ‘ग’ का ही दबदबा रहता है। या तो संपत्ति उनको छोड़ के चली जाती है, या तो खुद संपत्ति को छोड़कर परलोक में रवाना हो जाते हैं।
पर जो लोग जरूरतमंद आदि में अपनी संपत्ति दे-देकर सुकृत साध लेते हैं, ‘क’ को बढ़ाते ही जाते हैं, उनकी वह ‘क’ संपत्ति अनेक गुना बढ़कर परलोक में Transfer हो जाती है।
वह आस्तिक धनाढ्य भी अपनी ज्यादा से ज्यादा संपत्ति को ‘क’ में डालना चाहते थे। वहाँ इतने गरीब लोग तो आते नहीं थे, इसलिए इस श्रीमंत में एक नई Scheme राजा के समक्ष प्रस्तुत की।
जितनी भी लोन चाहिये हो, उनको उतनी लोन देंगे, शर्त सिर्फ इतनी है कि, लोन लेने वालों को इस भव में लोन वापस नहीं चुकानी है, लेकिन परलोक में इसकी पाई-पाई का ब्याज सहित सब कुछ भरपाई कर देना है। इस प्रकार का सत्तावार लिखाई पत्र भी कर देना है। उस जमाने के लाख रूपये की लोन देनी होती तो भी, वो लोन लेने वाला कौन है? कहाँ का रहने वाला है? लोन वापस कर सकेगा कि नहीं? इत्यादि कोई भी जाँच यह श्रीमंत नहीं करते थे। उनको उसकी जरूरत ही नहीं थी। इसलिए लुच्चे- लफंगे लोग भी आ-आकर लोन ले जाने लगे।
(इस प्रकार से आप लोन लोगे कि नहीं लोगे? ये अपने आपसे पूछ लेना। यदि जवाब में ‘हाँ’ आये तो समझ लेना कि होंठों पर आस्तिकता होने पर भी हृदय में तो नास्तिकता है।)
उनकी इस scheme की बात दूर-दूर तक के शहरों में फैलने लगी अब आगे क्या होता है? यह बात आगामी लेख में…
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