देवद्रव्य की रकम से समाज सेवा के कार्य करने चाहिए?
- Aacharya Shri Abhayshekhar Suriji Maharaj Saheb
- Apr 13, 2023
- 7 min read
Updated: Apr 7, 2024

बैंकों में देवद्रव्य के करोड़ों रूपये ऐसे ही निष्क्रिय पड़े रहते हैं, तो उसका उपयोग दुष्काल राहत में, या भूकंप पीड़ितों के लिए, या अनाथ बच्चों के लिए, या गरीबों के एजुकेशन के लिए, या गरीबों को मेडिकल सहायता के लिए नहीं करना चाहिये? मतलब, कि बचे हुए देवद्रव्य से समाज सेवा के काम नहीं कर लेने चाहिये? आखिर जन सेवा यही प्रभु सेवा ही है ना! इस प्रकार के प्रश्न का उत्तर हमने पिछले लेख में थोड़ा देखा था इस लेख में विस्तार से देखते हैं।
सर्वप्रथम बात यह है, कि बैंक में जो करोड़ों रूपये पड़े हैं, वे बैंक में ऐसे ही पड़े रहते हैं, या बैंक उस रकम को अलग-अलग कंपनियों को, इंडस्ट्रीज़ को, लोन के रूप में देखकर हर साल करोड़ों का ब्याज कमाती है। और वे कंपनियाँ भी उस रकम के आधार पर अपनी इंडस्ट्री चलाकर करोड़ों रूपयों की कमाई करती है। देश की जी-डी-पी में वृद्धि करती हैं। हजारों लोगों को रोजगार मिलता है। उन कंपनियों के शेरहोल्डर्स को भी इससे लाभ होता है। यदि यह सब होता हो, तो देवद्रव्य के करोड़ों रूपये निष्फल पड़े रहे, ऐसा कैसे कह सकते हैं? इसलिए इस प्रश्न की बुनियाद ही गलत है, ऐसा नहीं लगता है?
और मान लो कि इस रकम से समाज सेवा के कार्य करने हैं, तो यह काम कौन करेगा? रकम किसे देनी चाहिए?
यह रकम सरकार को देने का कोई विशेष मतलब है? खुद राजीव गांधी का स्टेटमेंट था कि सरकार लोक कल्याण के लिए 1 रूपया मंजूर करती है, तो उसमें से लोगों के पास मुश्किल से पंद्रह पैसे पहुँचते हैं। (और यदि कोई बड़ा घोटाला हो गया तो उस पंद्रह पैसों का भी…)
हमारी किसी संस्था को समाज सेवा करनी हो तो, ‘मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना’ कोई कहेगा कारगिल युद्ध के शहीदों के लिए दो, कोई कहेगा अकाल राहत में दो, कोई कहेगा अनाथ आश्रम में दो, कोई गरीबों के एजुकेशन इत्यादि तरह-तरह का सुझाव आएँगे। कहीं पर इसके नाम पर झगड़े हो जाएँ तो भी आश्चर्य नहीं है। इससे अच्छा, शास्त्रों में जब स्पष्ट मार्गदर्शन दिया ही है तो व्यर्थ में नए विकल्प बड़े करने में कोई भी समझदारी नहीं है।
हकीकत यह है कि इस रकम को अन्य किसी भी उद्देश्य में डाइवर्ट करने का अधिकार सरकार को नहीं है, ना किसी संस्था को, ना ही श्रावकों को, ना ही ट्रस्टियों को, और ना ही गुरु भगवंतो को है।
और ‘मानव सेवा यही प्रभु सेवा’ आदि नारे लगाने वालों को कहना चाहिए कि जिन गरीब, दुःखी और अनाथ मानवों को आप प्रभु की कक्षा में बिठाते हो; तो प्रभु को जिस तरह साष्टांग दंडवत प्रणाम करते हो, वैसे ही इन मानवों को भी करो। वास्तविकता यह होती है, कि ऐसे नारे लगाने वालों को और मंदिर के पैसों को इन सभी की सेवा में लगा देने की बड़ी-बड़ी सलाह देने वालों को सिर्फ इसके द्वारा ‘हम गरीबों के बेली हैं’, ऐसी मिथ्या क्रेडिट पाने के सिवा इन दुःखियों में कोई रुचि नहीं होती है। ऐसे लोग ना तो अपनी गाँठ का एक पैसा गरीबों को देते हैं, ना ही अपना टाइम देते हैं, ना ही गरीबों की मुश्किलों को सुनने समझने की भावना दर्शाते हैं। कभी-कभी दुत्कार-ते हो, या तिरस्कार करते हो तो हैरत नहीं है।
दूसरी समझने जैसी बात यह है कि देरासर में प्रतिमा रूप जो परमात्मा होते हैं, वे चाहे कुछ भी बोलते नहीं है, फिर भी अपनी भक्ति करने वालों को दया, दान, परोपकार आदि की प्रेरणा करते ही हैं। यह प्रभु का अचिंत्य प्रभाव है। जहाँ रोज लाखों करोड़ों का शॉपिंग होता है, ऐसे मॉल के बाहर आपको पानीपुरी वाला देखने को मिलेगा, पर भिखारी देखने को नहीं मिलेगा। देरासर के बाहर भिखारी देखने को मिलेगा, पर पानीपुरी वाला देखने को नहीं मिलेगा। खाने वाले कहाँ होते हैं, और खिलाने वाले कहाँ होते हैं, इतनी सेंस तो भिखारी को भी होती है।
यदि देवद्रव्य ही नहीं होगा तो देरासर कैसे टिकेंगे?
यदि देरासर ही नहीं होगा तो प्रभु भक्ति कैसे होगी?
यदि प्रभु भक्ति ही नहीं होगी तो दया, दान आदि की सत्प्रेरणा कैसे मिलेगी?
यह सब प्रेरणा, और गुरु भगवंतो की प्रेरणा से जैन लोग समाज सेवा के और अनुकंपा के करोड़ों रूपये के कार्य करते ही हैं। इसके कुछ उदाहरण देखते हैं:
भगवान महावीर ने दीक्षा लेने से पहले 12 महीने तक लाखों गरीबों को अरबों रूपयों का वर्षीदान देकर प्रजा का उद्धार किया था।
पू. श्री सिद्धसेनदिवाकरसूरिजी के उपदेश से विक्रम नृपति ने हजारों कर्जदारों का कर्ज चुका -कर पृथ्वी को ऋणमुक्त किया था। इसीलिए तो उनके नाम से विक्रम संवत् की प्रवर्तना हुई थी।
पू. श्री हेमचंद्रसूरिजी महाराजा के उपदेश से राजा कुमारपाल ने बिना पुत्र वाली विधवाओं की वार्षिक 72 लाख रूपयों की आवक को उदारतापूर्वक माफ कर दिया था।
पू. श्री धर्मघोषसूरिजी महाराज के उपदेश से जगड़ूशा ने 3 वर्ष के भारी आकाल में भारत में जगह-जगह अन्न के भरे हुए गोदामों में से लाखों टन अनाज का उदारता से दान करके देश की प्रजा का उद्धार किया था।
पू. जैनाचार्य के आशीर्वाद पाकर भामाशाह ने 12 वर्ष तक हर महीने (या साल) में 25000 सैनिकों की सेना को स्वर्ण मुद्राओं का वेतन चुका सके, उतना धन चित्तौड़ दीपक राणा प्रताप को अर्पण कर के आखिर में देश को बचा लिया था।
अहमदाबाद को लूटने आए हुए मराठा सरदारों को अपना खुद का अखूट धन अर्पण करके अहमदाबाद को लुटने से बचाने वाले वखत-चंद जैन नगर सेठ की कीर्ति पताका आज भी आसमान में लहरा रही है।
16वीं शताब्दी में धोलका के पास के हडाला गांव के खेमो देदरानी ने महमूद बेगड़ा की विनती से भयंकर दुकाल में 12 महीने तक पूरे गुजरात को अनाज पहुँचा कर प्रजा को बचा लिया था।
18वीं सदी में अहमदाबाद के मनिया दोशी ने दुकाल में 18 महीने तक अन्न, वस्त्र, गुड़ आदि का वितरण करके प्रजा को मरने से बचाया था।
जैन इतिहास में तो ऐसे हजारों उदाहरण देखने को मिल सकते हैं। अभी विस्तार नहीं करना है।
ऐसे तो वर्तमान में भी ढेरों उदाहरण हैं। अभी कुछ ही सालों पहले अहमदाबाद के एक श्रावक ने थोड़े ही महीनों में गुजरात के गाँव-गाँव में जरूरत-मंद परिवारों को कुल मिलाकर 50 करोड़ (रिपीट 50 करोड़ रूपयों) का दान किया था।
उनसे प्रेरणा लेकर दूसरे भी अनेक सेवकों ने अपनी अपनी शक्ति अनुसार 2-5-10 करोड़ का दान अन्य जरूरतमंद परिवारों को किया था।
सूरत गोपीपुरा में ‘श्री महावीर अन्नक्षेत्र’ हर रोज 2500 से ज्यादा गरीबों को बिना मूल्य भोजन कितने सालों से करा रहा है।
मुंबई का एक परिवार टाटा हॉस्पिटल में गरीब कैंसर पेशेंट को दैनिक हजारों रूपयों की दवाइयाँ बिना मूल्य के देता है।
उस हॉस्पिटल के करीब का एक जैन संघ कैंसर के पेशेंट को और गाँव से आए हुए उनके स्वजनों को सात्विक भोजन देता है; ये सब कार्य भी कई सालों से चल रहे हैं।
पूरे देश में सैकड़ों खिचड़ी घर चल रहे हैं, जो भूखों को बिना मूल्य भोजन देते हैं। गर्मियों में सिर्फ पानी की प्याऊ ही नहीं, छाछ केंद्र भी गाँव-गाँव में जैनियों द्वारा खोले जाते हैं। वह अमृत समान छाछ गर्मी की आग को तो ठंडा करती ही है, साथ में शरीर को सुंदर पोषण भी देती है।
गुजरात और राजस्थान की सैकड़ों पांजरा -पोल ज्यादातर जैनों के दान पर ही चलती है। दुष्काल के वर्षों में मालधारी लोग अपने पशुओं को पांजरापोल में छोड़ जाते हैं। पांजरा-पोल 8-10 महीने बिना मूल्य सभी पशुओं को संभालती है।
फिर बरसात होने पर मालधारी अपने अपने पशुओं को वापस ले जाते हैं। और उनके द्वारा अपना जीवन निर्वाह करते हैं।
जहाँ हमारा तीर्थ होता है, वहाँ के गाँव को और गाँव की जनता को तीर्थ की ओर से बहुत सारी सुविधाएँ प्राप्त होती हैं। बहुत से स्थलों पर सार्व-जनिक दवाखाने में सिर्फ दो-पाँच रूपयों की फीस लेकर गरीब रोगियों की ट्रीटमेंट की जाती है, जिसका लाभ सैकड़ों मरीज लेते हैं।
भारत देश के अनेक शहरों में अनेक बड़ी-बड़ी हॉस्पिटल हैं, जैसे अहमदाबाद में वी.एस. हॉस्पिटल जैनों ने बनाई है, उसी तरह सैकड़ों बड़ी स्कूल कॉलेज भी जैनों की है।
दुष्काल, बाढ़, भूकंप आदि आपदाएँ तकरीबन हर वर्ष में भारत में कहीं ना कहीं होती रहती है। हर साल उसमें जैनों के मात्र करोड़ों रूपए ही नहीं, पर युवा कार्यकर्ता भी अपना काम-धंधा बंद करके 15 दिन, एक महीना या अनेक महीनों तक पीड़ितों की सेवा करते रहते हैं।
ऐसे कार्यों के लिस्ट की कोई सीमा नहीं है, हम सिर्फ कोरोना लॉकडाउन के बारे में देखते हैं:
कमाई बंद हो जाने पर भी जिन्होंने सादर में भक्ति जीव दया अनुकंपा में लाखों करोड़ों की दान की नदियां बहायी… छोटे लोगों को साथ लेकर सहारा दिया…
अनेक संघों और श्रावकों ने 60 बेड, 80 बेड, 100 बेड, 200 बेड के कोविड-19 सेंटरों को खोल कर हॉस्पिटलों से 5-7 गुना कम खर्चे में अच्छे से अच्छी ट्रीटमेंट दी, और उससे भी अच्छा बेहतर प्रफुल्लित वातावरण देकर कोरोना पेशेंट को शीघ्र अच्छा किया।
बेंगलुरु में जैन संघ ने एक विशाल मैदान में रसोईघर खोलकर कोरोना से संबंधित सारी सावधानी रखते हुए रोज 50,000 (फिर से पढ़िए रोज 50,000) लोगों की अनुकंपा हो उतनी रसोई बनवायी और अलग-अलग विस्तार में जरूरतमंदों के पेट की आग बुझाई।
अन्यत्र कहीं पर 10000, कहीं पर 6000, कहीं पर 5000 लोगों को हर रोज खाना खिलाया गया।
इन सब बातों को प्रशासन ने नोटिस किया और न्यूज़ चैनल में भी इन बातों को प्रसारित किया गया है।
अरे! अनेक 8-10 घर के छोटे-छोटे संघों ने भी 200-250-300 लोगों को रोज फूड पैकेट्स दिए हैं। (मेरा युवक मंडल को आह्वान है कि किसी को साथ में लेकर भारत भर के जैन संघों ने अनुकंपा के ऐसे जो-जो कार्य किए हो, उसकी जानकारी इकट्ठा करके लोगों के समक्ष पेश करें। यह भी शासन प्रभावना का एक बहुत बड़ा अनुष्ठान बन जाएगा।) इनमें से अनेक संघ तो ऐसे है कि जहाँ महात्माओं का विचरण, जिनवाणी श्रवण, प्रेरणा आदि बिल्कुल ना के बराबर है, पर देरासर-प्रभुभक्ति के प्रभाव से जीवदया, अनुकंपा, परो-पकार और उदारता सहज ही देखने को मिली।
हम फिर से याद कर लेते हैं। देवद्रव्य है तो देरासर है, प्रभुभक्ति है, प्रभु की सत्प्रेरणा है, और ये सारे सत्कार्य हैं।
और एक बार यदि देवद्रव्य समाजसेवा आदि के नाम से, शास्त्र विरुद्ध जाकर भी खर्च कर डाला, तो फिर उस खर्च किये गए देवद्रव्य से भी 10-20 या 50 गुना के खर्च से हो रहे यह सब सत्कार्य रुक नही जायेंगे? यह सुज्ञ जनों को सोचने वाली बात है।
(17वें और 18वें लेख में लोक कल्याण तथा धार्मिक थापण और विचारों की दीवादांडी… इन दो पुस्तकों का सहारा लिया गया है, धन्यवाद)
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