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Temper : A Terror – 3

बिजली के चमकारे की तरह अमरदत्त का बचपन देखते ही देखते पूरा हो गया ।
“अमर ! आज से तुम्हे विद्याभ्यास करने के लिए गुरुकुल में जाना है । और वहाँ जाने के बाद तु दूसरे बालकों के साथ मिलकर कुछ तोड़-फोड़ मत करना !” श्रेष्ठी-पत्नी अपने पुत्र को समझा रही थी किन्तु अमर हाथ में जो तलवार थी उसे गोल-गोल घुमाने में मुग्ध हो गया था ।
“चलो अमर ! समय निकला जा रहा है । तेरी शिक्षा प्रारम्भ के लिए आज शुभमुहूर्त्त है, आज प्रवेश हो गया, तो हो गया नहीं तो फिर सीधा देढ़ वर्ष बाद का मुहूर्त्त है । तेरे लिए भडवीर हाथी भी तैयार है । चलो अब शीघ्रता करो !” श्रेष्ठी के यह बात सुनकर अमर अपनी तलवार को म्यान कर अपने कमरबंध में लटका देता है । जिस दिन से अमर ने गुरुकुल जाने की बात सुनी थी उस दिन से वह अपने शरीर को शस्त्र एवं शास्त्र विद्या सीखने हेतु तैयार कर रहा था । अमर के ज्येष्ठ भ्राता ने अलग-अलग गुरुकुलों में शस्त्र अध्ययन किया था और वही दाँवपेच उसने अमर को सीखाए थे ।
ये सब कुछ सीखते ही अमर के लिए शस्त्रविद्या जैसे बाएँ हाथ के खेल के समान हो गई थी । सभी दाँवपेचों में वह पारंगत हो गया था । उसकी प्रतिभा देख श्रेष्ठी का ज्येष्ठ पुत्र आचंबित होकर सब बातें अपने पिता को कहता था । और उन्हें सुनकर श्रेष्ठी भूतकाल की उन यादों में खोकर केवल मन्द स्मित करता था ।
श्रेष्ठी की आवाज सुनकर अमर हवेली बाहर के उद्यान में जाकर खड़ा हो गया । उसके हाथ में माँ ने बनाई हुई सुखडी थी । शगुन के लिए आज मुँह मीठा कराकर मुहूर्त्त करने की सुचना श्रेष्ठीने पहले ही पत्नी को दियी थी । अमर मुँह में बची हुई शेष सुखडी का आनन्द से स्वाद ले रहा था ।
अमर को मिठाई को इस तरह से स्वाद लेते देखकर ज्येष्ठ कहता है, “पता नहीं तुम्हें मीठी चीजें कैसी पसन्द आती हैं ? मुझे तो बिल्कुल भी पसन्द नहीं हैं ।” अपने बड़े भाई का चेहरा देखकर अमर को हँसी आ रही थी ।
“आपको मिठाई पसंद नहीं है तो आपकी मुझे क्युँ नहीं दे देते ?” बड़ी भाई ने आँखे बड़ी करके अमर के प्रस्ताव को ठुकरा दिया । अमर आगे कुछ बोलने जा ही रहा था इतने में सामने से उसने पिताजी को आते हुए देखा ।
“आहाहा ! अमर ! क्या दिख रहे हो तुम ! सच में तुम आज क्षत्रियपुत्र लग रहे हो ।” श्रेष्ठी ने अमर की पीठ थपथपाते हुए कहा । अमर ने पिताजी के चरण स्पर्श किए । अमर को अपने पिताजी के लिए विशेष स्नेह एवं आदर था । और क्युँ नहीं होगा ? उन्होंने कभी भी अमर को किसी वस्तु के लिए आज तक मना जो नहीं किया था ।
“आह ! यह देखो आ गया तुम्हारा हाथी ।” एक विशालकाय हाथी को दिखाते हुए श्रेष्ठी ने अमर से कहा । अमर हाथी को देखकर अतिशय प्रसन्न हुआ । वास्तव में ही वह हाथी महाकाय था ।
हाथी के पास जाकर अमर ने स्नेह से उसकी सुँड थपथपाई । हाथी ने भी सुँड ऊपर करके अमर का अभिवादन किया ।
“पिताजी ! अब मैं जा रहा हूँ ? आप मुझे लेने के लिए समय से आ जाएँगे ना ?” अमर ने पिताजी की तरफ देखते हुए कहा । श्रेष्ठी भाव-विभोर हो गए थे, उनकी आँखे भर गई थी । ऐसी अवस्था में उनके मुख से केवल “हाँ” इतना ही शब्द उच्चारित हुआ ।
अमर किसी सहारे के बिना ही छलाँग लगाकर हाथी के पीठ पर चढ़ गया । यह देखकर श्रेष्ठी भी आश्चर्यचकित हो गए ।
“यशस्वी भव ! खुब आगे बढ़ना !” अमर को जाते हुए देखकर श्रेष्ठी के मुँह से आशीर्वचन निकले ।
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यौवनावस्था की कगार पर अमर खड़ा था । उसकी शारीरिक सौन्दर्यता के आगे कामदेव भी फीके पड़ जाएँ । शरीर से सुकुमार ऐसे अमर की बुद्धि शास्त्रों के सखोल अभ्यास से अत्यन्त तेजस्वी और चाणाक्ष हो गई थी और शस्त्राभ्यास से उसके हाथ लोहे जैसे मजबूत और प्रखर हो गए थे । उसकी इन्हीं बातों से पूरे गुरुकुल में उसके प्रति सभी को विशिष्ट आकर्षण एवं स्नेह था ।
“अमर ! क्या तुम जानते हो कि आज हमारे गुरुकुल में किसी दूसरे राज्य के गुरुकुल से एक विद्यार्थी आनेवाला है । और मैंने ऐसा सुना है कि उसकी वाक्-छटा तो अत्यन्त प्रभावी है ही किन्तु उसकी बुद्धि की तो…”
“अरे रे !” राम ने घनश्याम को बीच में ही रोकते हुए कहा, “तु किसके सामने बोल रहा है ? मेरे मतानुसार अमर से अधिक रूपवान और बुद्धिमान इस संसार में दूसरा कोई है ही नहीं ।”
“बस… बस…! चलो अब ! जब वह आएगा तब देख लेंगे ! अभी आप झगड़ना बंद करो !” अमर ने अधिकार पूर्वक भाषा में कहते ही सभी शान्त हो गए ।
सभी वहाँ से चलते-चलते गुरुकुल के प्रांगण में आ गए । वहाँ विद्याचार्य किसी की राह देखते हुए खड़े थे ।
“गुरुवर्य ! आप किस की राह देख रहे हैं ?” अमर ने अत्यन्त विनम्रता के साथ मधुर वाणी में आचार्य से पूछा ।
“आज मेरे मित्र के गुरुकुल से एक विद्यार्थी आनेवाला था । अब तक तो उसे आ जाना चाहिए था । दो घटिका बीत गई लेकिन पता नहीं अभी तक वह क्युँ नहीं आया ?” गुरुवर्य के मुख पर चिन्ता स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही थी ।
“गुरुवर्य ! क्या हम थोड़ा आगे जाकर देख आएँ ?” आँखो के इशारों से ही अमर ने आचार्य को प्रश्न किया ।
आचार्य ने सिर हिलाकर अमर के विचार से अपना समर्थन प्रकट किया । अपने पाँच मित्रों के साथ गुरुकुल के वेगवान एवं उत्कृष्ट घोडों को लेकर अमर ने कूच किया ।
अमर और उसके साथी गाँव के बाहर दो कोस तक पहुँचे ही होंगे तो वहाँ पे उन्होंने एक अजब दृश्य देखा । एक घुड़स्वार अपने घोड़े पर अपना सामान लादे स्वयं पैदल चलते हुए आ रहा था । उसके पेहराव एवं रंगरूप से तो वह कोई आर्य पुरुष ही लग रहा था । उसे देखते ही उसके साथ मित्रता करें ऐसी इच्छा होती थी, ऐसा प्रभावशाली व्यक्तित्व था उसका ।
अपना घोड़ा उसके पास ले जाकर अमर ने उसे पूछा, “अरे महोदय ! यह स्वारी कहाँ जा रही है ?”
प्रत्युत्तर में युवक ने कहा, “नगरी में…”
“श्रीमान् ! आपका नाम क्या है ?” जिज्ञासावश अमर ने पुनः प्रश्न किया ।
एक रमणीय स्मित हास्य के साथ उसने जवाब दिया, “जिसे मित्रों को देखकर आनन्द हो, मैं वही मित्रानन्द !”
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नदी की किनारे पर वटवृक्षों का राज था, एक विशालकाय साँप की केंचुलीओं की तरह सर्वत्र वटवृक्षों की शाखाएँ फैली हुई थी । नदी का गम्भीर किन्तु प्रशान्त जलप्रवाह किनारों पर रेत के अनेकानेक आकर्षक पटलों का निर्माण कर रहा था । जलप्रवाह के उस गम्भीर किन्तु स्वरबद्ध मोहक नाद में वायु के आह्लाददायी स्पर्श से वटवृक्षों का कर्-कर् आवाज जिस तरह से सम्मिलित हो रहा था, उससे पूरा वातावरण प्रफुल्लित एवं संगीतमय हो गया था ।
“अरे ओ अमर ! यदि तुझमें शक्ति है तो मेरी इस गिल्ली को ऊस वटवृक्ष के ऊपर से मारकर दिखाओ !” मित्रानन्द ने अमर को ललकारा था ।
अपने दैनंदिन कार्यों से समय मिलते ही अमर और मित्रानन्द गुरुकुल से निकलकर सीधे इस नदी के तट पर अपना प्रिय खेल ‘गिल्ली-ड़ंड़ा’ खेलने के लिए आ जाते थे । पीछले २-३ वर्षों में मित्रानन्द और अमर की मित्रता अभेद्य और गहरी हो गई थी । उनकी मित्रता की प्रसिद्धि इतनी विख्यात हो गई थी कि मित्रानन्द और अमर दोनों पर्यायवाची बन गए थे ।
असाध्य में असाध्य लगने वाले नगर के ऐसे कई कार्य मित्रानन्द की कुशाग्र बुद्धि और अमरदत्त के बल कौशल्य से अत्यन्त सहजता से सिद्ध हो गए थे । उन दोनों के लिए नगरजनों के मुखों से केवल एक ही प्रवाद निकलता था, कि “यह बलदेव और वासुदेव के अवतार हैं ।”
“तुझे खबर भी है कि तु किसे ललकार रहा है ?” अमर ने झूठ-मूठ की स्फूर्ति दिखाते हुए मित्रा को कहा ।
“हा… हा… हा…! आया बड़ा पहलवान…! अब बोलना बंद कर और ड़ंड़ा ऊठाकर गिल्ली को मार, नहीं तो वह तेरे ही किसी छेद में घुस जाएगी !”
यह सुनकर अमर अब सच में ही गुस्से से लाल-पीला हो गया था ।
मित्रानन्द ने अपनी पूरी ताकत लगाकर गिल्ली को अचानक से अमर की तरफ फेंका । गुस्से से लाल हुई अमर की आँखे गिल्ली के ऊपर ही जड़ी थी । गिल्ली थोड़ी नज़दीक ही पहुँची होगी की अमर ने जोर से ड़ंड़ा घुमाया । “खटाक्” करके एक जोर से आवाज आई और मित्रानन्द के ऊपर से जाकर गिल्ली कहीं पे खो गई । मित्रानन्द उस गिल्ली को ही देख रहा था ।
“हा… हा… हा… हा…!” पागल के जैसे मित्रानन्द हँसने लगा । ड़ंड़े को घुमाते हुए अमरदत्त उसके के नज़दीक आया ।
“क्या हुआ ? मेरा प्रहार देखकर पागल हो गए हो क्या ?” उसकी हँसी रोकने के लिए अमर ने पूछा । लेकिन फिर भी मित्रानन्द हँसे ही जा रहा था ।
“क्या हुआ है भाई ?” अमर अब और क्रोधित हो गया था । अमर ने जहाँ पर गिल्ली मारी थी उस तरफ हाथ से इशारा करते हुए मित्रानन्द ने कहा, “यह देख, यह देख…! तुने क्या फटका मारा है । यह देख…!”
मित्रानन्द ने जहाँ इशारा किया था वहाँ जाकर अमर ने देखा ।
“क्युँ, नहीं दिखाई दे रहा है क्या ? यह देख… यह देख…! जिस चोर को ऊपर लटका दिया है ना ! उसके मुँह में देख तेरी गिल्ली पहुँच गई है । हा… हा… हा… हा…!” वह देखकर अमर भी जोर-जोर से हँसने लगा ।
“ओऽय… ओऽय… एऽऽ… एऽऽ…!” कहीँ से हृदय में हडकम्प मचाने वाली भयानक आवाज आई । उसे सुनकर दोनों की हँसी अपने आप बन्द हो गई ।
“क्युँ ! बहुत हँसी आ रही है, मित्रानन्द !” अब मित्रानन्द के मुख पर स्पष्ट रूप से भय दिखाई दे रहा था । उसकी आँखे अपने आप आवाज की ओर ऊपर देखने लगी । उसने देखा कि वृक्ष पर लटकाये हुए चोर के शव के मुख में से वह आवाज आ रही थी ।
“याद रख ! मित्रानन्द ! बहुत हँसी आ रही है ना तुझे ! लेकिन एक दिन तु भी मेरे जैसे ही यहाँ पे लटकता होगा । हाँ…! और तेरे भी… हाँ…! तेरे भी मुँह में इसी तरह से गिल्ली फँसी होगी । हा… हा… हा…! हा… हा… हा…!”
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( क्रमशः)

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साहित्य जगत के सभी रसों से परिपूर्ण, और युवा दिनों की धड़कन बने इस प्रकार की वर्तमान Life Style बताने वाली इस नवलकथा के लेखक मुनिवर ने तो वास्तव में कमाल किया है।प्रभु-वचन रूपी बादाम को चॉकलेट के रैपर में डालकर सबको शील, सदाचार और संस्कृति की ओर ढालने हेतु प्रेरित करने वाली यह नवल कथा, कथा-जगत में एक Mile Stone साबित होगी, ऐसा विश्वास है।

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